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पेट्रोल-डीजल और LPG की कीमतों में फिर बढ़ोतरी का खतरा! सरकार ने तेल कंपनियों को और मदद देने से किया इनकार, महंगाई की नई मार की आशंका

देश में पेट्रोल, डीजल और घरेलू एलपीजी (LPG) की कीमतों को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है। केंद्र सरकार द्वारा सरकारी तेल विपणन कंपनियों को आगे वित्तीय सहायता न देने के फैसले के बाद ईंधन और रसोई गैस के दामों में नई बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। वित्त मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, सरकार अब तक इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल जैसी सरकारी तेल कंपनियों को करीब 1.23 लाख करोड़ रुपये की राहत दे चुकी है, लेकिन अब इस सहायता को आगे जारी रखने की संभावना नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और एलपीजी की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तथा सरकार अतिरिक्त सहायता नहीं देती है, तो तेल कंपनियां अपने बढ़ते घाटे की भरपाई के लिए उपभोक्ताओं पर बोझ डाल सकती हैं। हालांकि, फिलहाल तेल कंपनियों की ओर से कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

आम जनता को राहत देने के लिए सरकार ने उठाया था बड़ा कदम

मध्यपूर्व में जारी तनाव और वैश्विक ऊर्जा संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला है। इसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ा है। आम लोगों को महंगाई से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने पिछले 78 दिनों के दौरान तेल कंपनियों को लगभग 1.23 लाख करोड़ रुपये की आर्थिक राहत प्रदान की।

इस राहत पैकेज में पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) में कटौती भी शामिल थी। सरकार ने अपने राजस्व का बड़ा हिस्सा छोड़कर तेल कंपनियों के घाटे को कम करने की कोशिश की ताकि उपभोक्ताओं पर कीमतों का पूरा बोझ न पड़े। इस कदम से कुछ समय तक पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिली।

78 दिन बाद सरकार ने क्यों खींचे हाथ?

वित्त मंत्रालय का मानना है कि किसी एक क्षेत्र को लगातार बड़ी मात्रा में वित्तीय सहायता देना लंबे समय तक संभव नहीं है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, 78 दिनों तक सहायता देने के बाद मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि अब तेल कंपनियों को अतिरिक्त वित्तीय पैकेज उपलब्ध नहीं कराया जाएगा।

सरकार का तर्क है कि लगातार बढ़ते वैश्विक संकट के बीच किसी एक सेक्टर को अनिश्चितकाल तक सब्सिडी या वित्तीय सहायता देना वित्तीय अनुशासन के लिहाज से उचित नहीं होगा। यही कारण है कि अब तेल कंपनियों को अपने घाटे का प्रबंधन स्वयं करना होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के इस फैसले के बाद तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है और वे कीमतों में संशोधन करने पर विचार कर सकती हैं।

हर दिन 652 करोड़ रुपये का नुकसान झेल रही हैं कंपनियां

सरकारी सूत्रों के अनुसार, हाल के हफ्तों में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद सरकारी तेल कंपनियां अभी भी भारी नुकसान झेल रही हैं। अनुमान है कि वर्तमान समय में इन कंपनियों को प्रतिदिन लगभग 652 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है।

पेट्रोलियम मंत्रालय के अधीन कार्यरत पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) की रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2026 में भारतीय बास्केट के लिए कच्चे तेल की औसत कीमत 114.48 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि मई 2026 में यह 106.23 डॉलर प्रति बैरल दर्ज की गई। वर्तमान में भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 93 से 94 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है।

इसके साथ ही वैश्विक बाजार में एलपीजी की कीमतों में 46 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे तेल कंपनियों की लागत में भारी इजाफा हुआ है।

एलपीजी पर बढ़ता दबाव, हर सिलेंडर पर भारी अंडर-रिकवरी

रसोई गैस के क्षेत्र में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। घरेलू एलपीजी के लिए उपयोग किए जाने वाले सऊदी सीपी बेंचमार्क में जनवरी से अब तक लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। इसके परिणामस्वरूप एक घरेलू गैस सिलेंडर की आपूर्ति लागत बढ़कर 1,600 से 1,700 रुपये तक पहुंच गई है।

हाल ही में तेल कंपनियों ने घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 29 रुपये की बढ़ोतरी की थी, लेकिन इसके बावजूद कंपनियों को प्रत्येक सिलेंडर पर 600 से 700 रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

सरकारी अनुमानों के मुताबिक, घरेलू एलपीजी पर कुल अंडर-रिकवरी एक वर्ष के भीतर बढ़कर लगभग 60,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। पिछले वर्ष यह आंकड़ा 41,338 करोड़ रुपये था। यह स्थिति तेल कंपनियों के लिए गंभीर वित्तीय चुनौती बनती जा रही है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट ने बढ़ाई मुश्किलें

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। देश अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत और एलपीजी की जरूरत का करीब 60 प्रतिशत विदेशों से खरीदता है।

मध्यपूर्व में तनाव बढ़ने से पहले भारत के तेल आयात का लगभग 40 प्रतिशत और एलपीजी आयात का 90 प्रतिशत हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज मार्ग से होकर आता था। लेकिन क्षेत्रीय संघर्ष और सुरक्षा जोखिमों के कारण इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर आपूर्ति प्रभावित हुई है।

इस चुनौती से निपटने के लिए भारत ने वैकल्पिक देशों और नए बाजारों से एलपीजी और कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई है। हालांकि, नए स्रोतों और लंबी दूरी के कारण परिवहन लागत में काफी बढ़ोतरी हुई है, जिसका असर तेल कंपनियों के खर्च पर पड़ रहा है।

यही कारण है कि 15 मई 2026 के बाद से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चार बार वृद्धि की जा चुकी है।

महंगाई और विकास दर पर भी असर

ऊर्जा संकट का असर केवल पेट्रोलियम उत्पादों तक सीमित नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी इस स्थिति को लेकर चिंता जताई है। हाल ही में जारी मौद्रिक नीति बयान में आरबीआई गवर्नर ने कहा कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और ऊर्जा की बढ़ती कीमतें देश की आर्थिक वृद्धि तथा महंगाई दोनों को प्रभावित कर सकती हैं।

आरबीआई के अनुसार, पिछले दो महीनों के दौरान भारतीय बास्केट में कच्चे तेल की औसत कीमत लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल रही है। इसका असर खुदरा बाजार में दिखाई देना शुरू हो चुका है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए आरबीआई ने चालू वित्त वर्ष के लिए भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है। वहीं खुदरा महंगाई दर (सीपीआई) का अनुमान भी बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया गया है।

आगे क्या बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल और LPG के दाम?

फिलहाल सरकार या तेल कंपनियों की ओर से कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी का कोई आधिकारिक ऐलान नहीं किया गया है। लेकिन सरकार द्वारा अतिरिक्त सहायता रोकने, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, एलपीजी पर बढ़ती अंडर-रिकवरी और प्रतिदिन हो रहे भारी नुकसान को देखते हुए बाजार में आशंका बढ़ गई है कि आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस के दामों में फिर वृद्धि हो सकती है।

यदि ऐसा होता है तो इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों सहित कई जरूरी वस्तुओं के दाम भी बढ़ सकते हैं, जिससे महंगाई का दबाव और अधिक बढ़ने की संभावना है।

कुल मिलाकर, वैश्विक ऊर्जा संकट, मध्यपूर्व में जारी तनाव और सरकार द्वारा वित्तीय सहायता रोकने के फैसले ने तेल कंपनियों और उपभोक्ताओं दोनों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। आने वाले सप्ताहों में अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति और सरकार की आगे की रणनीति यह तय करेगी कि देशवासियों को पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के मोर्चे पर कितनी राहत मिलती है या फिर महंगाई की एक नई लहर का सामना करना पड़ता है।

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