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उत्तराखंड में कमर्शियल गैस सिलेंडर की सप्लाई में दिक्कत, होटल-रेस्टोरेंट में मचा हाहाकार

देहरादून/नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के बादलों का असर अब सीधे तौर पर भारतीय रसोई और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर दिखने लगा है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) बुरी तरह प्रभावित हुई है। भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें और उपलब्धता फिलहाल स्थिर बनी हुई है, लेकिन लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) की आपूर्ति पर इसका बड़ा प्रहार हुआ है। इसी संकट के मद्देनजर केंद्र सरकार ने देश भर में व्यावसायिक यानी कमर्शियल गैस सिलेंडर की बुकिंग और सप्लाई पर अस्थाई तौर पर रोक लगा दी है।

उत्तराखंड, जो एक प्रमुख पर्यटन राज्य है, वहां इस फैसले का असर सबसे व्यापक रूप से देखा जा रहा है। देहरादून सहित राज्य के तमाम शहरों में होटल, रेस्टोरेंट और ढाबा मालिकों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है।

होटल उद्योग पर ‘तालाबंदी’ का खतरा

कमर्शियल गैस सिलेंडर की सप्लाई रुकने से देहरादून होटल एसोसिएशन और रेस्टोरेंट कारोबारियों में हड़कंप मचा है। 3 मार्च से व्यावसायिक गैस की आपूर्ति पूरी तरह बंद है, जिसके कारण कई छोटे रेस्टोरेंट बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं। देहरादून होटल एसोसिएशन के प्रेसिडेंट मनु कोचर के अनुसार, “होटल और रेस्टोरेंट व्यवसाय पूरी तरह गैस पर निर्भर है। सरकार का एक भी सिलेंडर न देने का फैसला छोटे कारोबारियों की कमर तोड़ देगा। अगर यह स्थिति कुछ और दिन रही, तो कर्मचारियों की छंटनी और प्रतिष्ठानों को बंद करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।”

राजधानी देहरादून में लगभग 19,000 कमर्शियल गैस कनेक्शन धारक हैं, जो इस समय गैस की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। कई रेस्टोरेंट संचालकों ने कोयले और बिजली के विकल्पों की ओर रुख किया है, लेकिन बड़े पैमाने पर खाना बनाने के लिए ये विकल्प नाकाफी साबित हो रहे हैं।

घरेलू गैस बुकिंग के नियमों में बड़ा बदलाव

आम उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात यह है कि घरेलू गैस सिलेंडर (Domestic LPG) की सप्लाई रोकी नहीं गई है, हालांकि इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने नियमों में कड़ाई की है।

  • नया नियम: पहले उपभोक्ता 21 दिन के अंतराल पर दूसरा गैस सिलेंडर बुक कर सकते थे, लेकिन अब इस अवधि को बढ़ाकर 25 दिन कर दिया गया है।

  • प्रायोरिटी सेक्टर: सरकार ने स्पष्ट किया है कि कमर्शियल गैस की सीमित सप्लाई अब केवल अस्पतालों, हॉस्टलों और आपातकालीन सेवाओं से जुड़ी जगहों को ही प्राथमिकता के आधार पर दी जाएगी।

मेन्यू में कटौती और ‘डीजल भट्टी’ का सहारा

गैस संकट से निपटने के लिए कारोबारियों ने अब अपने कामकाज के तरीके बदलने शुरू कर दिए हैं।

  1. मेन्यू में 25% तक की कटौती: कई कैफे और बेकरी मालिकों ने उन डिशेज को हटा दिया है जिन्हें बनाने में ज्यादा गैस खर्च होती है।

  2. इलेक्ट्रिक उपकरणों का प्रयोग: रेस्टोरेंट संचालक अब इंडक्शन कुकर और ओवन पर निर्भर हो गए हैं, लेकिन डोसा जैसे व्यंजनों के लिए, जिनके लिए बड़े गैस तवों की जरूरत होती है, कोई विकल्प नहीं मिल रहा है।

  3. डीजल भट्टी: कुछ बड़े रेस्टोरेंट मालिकों ने डीजल से चलने वाली भट्टियों का ऑर्डर दिया है, क्योंकि उन्हें अंदेशा है कि आने वाले समय में ऊर्जा संकट और गहरा सकता है।

क्या कह रही है सरकार?

उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने वर्तमान स्थिति पर बयान देते हुए आम जनता से धैर्य रखने की अपील की है। उन्होंने कहा, “घरेलू गैस सिलेंडरों की आपूर्ति पूरी तरह सामान्य है और प्रदेश में इसका पर्याप्त स्टॉक है। आम उपभोक्ताओं को घबराने की आवश्यकता नहीं है।”

मंत्री ने आगे स्पष्ट किया कि पश्चिम एशिया (ईरान-इजरायल) में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन की आपूर्ति बाधित हुई है। उन्होंने कहा, “यह एक अस्थाई समस्या है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी के नेतृत्व में राज्य सरकार पूरी स्थिति पर नजर रखे हुए है और केंद्र सरकार की कमेटी इस पर जल्द ही ठोस फैसला लेगी।”

विशेषज्ञ की राय: क्यों गहराया संकट?

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। लाल सागर (Red Sea) और फारस की खाड़ी में युद्ध जैसी स्थिति होने के कारण जहाजों के आवागमन में देरी हो रही है और इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ गया है। यही कारण है कि घरेलू जरूरतों को सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने व्यावसायिक उपयोग पर लगाम लगाई है।

उत्तराखंड के पर्यटन और होटल उद्योग के लिए यह समय किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। एक ओर जहां अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां प्रतिकूल हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की कमी खल रही है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है, तो आने वाले दिनों में पर्यटन सीजन पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ना तय है।

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