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सोनम वांगचुक मामला: सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की दलील- ‘हम और वे’ जैसी भाषा देश बांटने की कोशिश, युवाओं को भड़काया

नई दिल्ली: लद्दाख की संवैधानिक सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण की मांग को लेकर आंदोलनरत प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में इस हाई-प्रोफाइल मामले पर तीखी बहस हुई। केंद्र सरकार ने वांगचुक की हिरासत को जायज ठहराते हुए उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाने के पीछे गंभीर कारण गिनाए। सरकार का आरोप है कि वांगचुक न केवल युवाओं को भड़का रहे हैं, बल्कि उनकी भाषा देश की अखंडता के लिए खतरा पैदा कर रही है।

सॉलिसिटर जनरल की दलील: ‘हम और वे’ की भाषा अलगाववाद का बीज

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में वांगचुक के भाषणों का हवाला देते हुए कड़ी आपत्ति जताई। मेहता ने कहा कि वांगचुक अपने भाषणों में केंद्र सरकार को ‘वे’ (They) कहकर संबोधित कर रहे थे। सरकार का तर्क है कि लोकतंत्र में जब कोई नेता या कार्यकर्ता ‘हम’ और ‘वे’ के बीच रेखा खींचता है, तो यह देश को वैचारिक रूप से बांटने की कोशिश होती है। तुषार मेहता ने जोर देकर कहा कि इस तरह की अलगाववादी भाषा का प्रयोग ही NSA लगाने के लिए पर्याप्त आधार है।

GenZ को भड़काने और हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सोनम वांगचुक के निशाने पर देश की युवा पीढ़ी, विशेषकर GenZ (जेनरेशन जेड) है।

सरकार द्वारा लगाए गए गंभीर आरोप:

  • हिंसा के लिए उकसाना: सरकार का दावा है कि वांगचुक ने लद्दाख में ‘नेपाल और बांग्लादेश’ जैसे हालात (तख्तापलट या उग्र आंदोलन) पैदा करने की बात कही है।

  • आत्मदाह का जिक्र: दलीलों में कहा गया कि वांगचुक ने अपने भाषणों में आत्मदाह जैसी चरमपंथी बातों का उल्लेख किया, जो युवाओं में हिंसा और अस्थिरता को बढ़ावा दे सकता है।

  • जनमत संग्रह की मांग: सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वांगचुक ने कुछ मौकों पर ‘जनमत संग्रह’ (Referendum) जैसे शब्दों का प्रयोग किया, जो सीधे तौर पर देश की संप्रभुता को चुनौती देने जैसा है।


लद्दाख की रणनीतिक अहमियत और सुरक्षा का सवाल

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि लद्दाख कोई सामान्य केंद्र शासित प्रदेश नहीं है। तुषार मेहता ने कहा, “लद्दाख देश की सुरक्षा के लिए सामरिक रूप से अत्यंत संवेदनशील इलाका है। यहाँ से भारतीय सेना को रसद और रसद की महत्वपूर्ण सप्लाई जाती है। ऐसे सीमावर्ती इलाके में अलगाववाद की बातें करना या असंतोष फैलाना राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है।” सरकार का मानना है कि वांगचुक की गतिविधियों से सीमा पर तैनात सेना के मनोबल और रसद तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।


गितांजलि अंगमो का पलटवार: ‘आलोचना करना अधिकार है, अपराध नहीं’

सोनम वांगचुक की पत्नी गितांजलि अंगमो की ओर से पैरवी कर रहे वकीलों ने सरकार के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कोर्ट में दलील दी कि वांगचुक ने हमेशा शांतिपूर्ण विरोध और गांधीवादी तरीकों का पालन किया है।

गितांजलि अंगमो की ओर से कहा गया:

  1. अभिव्यक्ति की आजादी: सरकार की नीतियों की आलोचना करना प्रत्येक भारतीय नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।

  2. गलत व्याख्या: सरकार वांगचुक के बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रही है ताकि उनकी आवाज को दबाया जा सके।

  3. शांतिपूर्ण मांग: लद्दाख को छठी अनुसूची (6th Schedule) में शामिल करने की मांग पूरी तरह संवैधानिक है और इसके लिए जेल में डालना लोकतंत्र की हत्या है।

आगे क्या? मंगलवार को फिर होगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुना और मामले की गंभीरता को देखते हुए मंगलवार (03 फरवरी, 2026) को भी सुनवाई जारी रखने का निर्णय लिया है। अदालत यह तय करेगी कि क्या वांगचुक पर NSA लगाना कानूनी रूप से वैध है या यह उनकी निजी स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

सोनम वांगचुक का मामला अब केवल लद्दाख की मांगों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता की एक बड़ी कानूनी लड़ाई में तब्दील हो चुका है। पूरे देश की नजरें कल होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि लद्दाख का ‘आइकन’ जेल में रहेगा या फिर उसे अपनी लड़ाई जारी रखने की आजादी मिलेगी।

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