हरिद्वार के ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज में धूम्रपान की लत छुड़ाने के लिए एक अनोखी पहल पर काम किया जा रहा है। यहां तंबाकू और निकोटीन से मुक्त औषधीय ‘धूमपान दंडिका’ यानी हर्बल स्मोकिंग स्टिक का चिकित्सकीय निगरानी में इस्तेमाल कराया जा रहा है। इसमें तेंदु के पत्ते के भीतर करीब 15 आयुर्वेदिक औषधीय द्रव्यों का मिश्रण तैयार किया गया है। शुरुआती स्तर पर कुछ लोगों में धूम्रपान की इच्छा कम होने की बात सामने आई है। हालांकि, इसे सामान्य बीड़ी या सिगरेट का सुरक्षित विकल्प नहीं माना जाना चाहिए और इसका इस्तेमाल केवल चिकित्सकीय सलाह एवं निगरानी में ही किया जा रहा है।
हरिद्वार: धूम्रपान की लत छोड़ना उन लोगों के लिए बेहद मुश्किल चुनौती हो सकती है, जो लंबे समय से बीड़ी या सिगरेट का सेवन कर रहे हैं। कई लोग बार-बार कोशिश करने के बावजूद तंबाकू की आदत से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाते। ऐसे लोगों के लिए उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज में एक अलग तरह के उपचार और शोध पर काम किया जा रहा है।
ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज के अंगदतंत्र विभाग से जुड़े विशेषज्ञ और शोधार्थी तंबाकू तथा निकोटीन से मुक्त औषधीय धूमपान दंडिका तैयार कर उसके प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं। इसे सामान्य भाषा में हर्बल बीड़ी या हर्बल स्मोकिंग स्टिक कहा जा रहा है। इसका उद्देश्य धूम्रपान करने वाले व्यक्ति की आदत और उससे जुड़ी मनोवैज्ञानिक तलब को धीरे-धीरे कम करने में मदद करना बताया गया है।
खास बात यह है कि इस पहल में व्यक्ति को सीधे बीड़ी या सिगरेट छोड़ने के लिए कहने के बजाय उसकी धूम्रपान की आदत को ध्यान में रखते हुए एक वैकल्पिक औषधीय प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे तंबाकू और निकोटीन से दूरी बनाने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन यह प्रक्रिया सभी के लिए अपने आप करने वाली घरेलू विधि नहीं है। कॉलेज में इसका इस्तेमाल चिकित्सकों की निगरानी में कराया जा रहा है।
आखिर क्या है यह हर्बल बीड़ी?
ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज में तैयार की जा रही इस औषधीय दंडिका में तंबाकू और निकोटीन का इस्तेमाल नहीं किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, तेंदु के पत्ते के भीतर शलकी, लाक्षा, मधुयेष्ठी सहित करीब 15 आयुर्वेदिक औषधीय द्रव्यों का मिश्रण रखा जाता है।
आयुर्वेद में औषधीय धूमपान की अवधारणा का उल्लेख मिलता है। कॉलेज के विशेषज्ञ इसी पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शोध पद्धति के साथ जोड़कर धूम्रपान की लत से परेशान लोगों के लिए एक चिकित्सकीय प्रयोग के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं।
हालांकि यहां एक बात समझना बेहद जरूरी है कि हर्बल होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी पदार्थ के धुएं को फेफड़ों के लिए पूरी तरह सुरक्षित माना जा सकता है। इसीलिए कॉलेज में तैयार की गई दंडिका का इस्तेमाल चिकित्सकीय देखरेख में कराया जा रहा है और इसे बाजार में मिलने वाली सामान्य बीड़ी की तरह इस्तेमाल करने की सलाह नहीं दी गई है।
धूम्रपान छोड़ना क्यों है इतना मुश्किल?
धूम्रपान की आदत केवल एक सामान्य आदत नहीं होती। लंबे समय तक निकोटीन लेने वाले व्यक्ति के शरीर और मस्तिष्क में निकोटीन पर निर्भरता विकसित हो सकती है। ऐसे में अचानक धूम्रपान बंद करने पर बेचैनी, चिड़चिड़ापन, ध्यान लगाने में परेशानी और बार-बार धूम्रपान करने की इच्छा जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
कई लोग इसी वजह से धूम्रपान छोड़ने के कुछ दिनों या हफ्तों बाद दोबारा बीड़ी या सिगरेट शुरू कर देते हैं। यही कारण है कि धूम्रपान छोड़ने के लिए केवल इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि सही चिकित्सकीय सलाह, परामर्श और जरूरत के अनुसार उपचार की भी आवश्यकता पड़ सकती है।
ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज में इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए धूम्रपान की आदत से जुड़े व्यवहार और मनोवैज्ञानिक तलब को कम करने पर काम किया जा रहा है।
डॉक्टरों की निगरानी में होता है पूरा उपचार
कॉलेज की ओर से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, हर्बल दंडिका का इस्तेमाल सीधे किसी व्यक्ति को नहीं दिया जाता। पहले उसकी स्थिति का आकलन किया जाता है और उसके बाद चिकित्सक तय करते हैं कि उसे इस शोध एवं उपचार प्रक्रिया में शामिल किया जाना है या नहीं।
अंगदतंत्र विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. भावना मित्तल के अनुसार, लंबे समय से धूम्रपान करने वाले लोगों के लिए इसे तैयार किया गया है और इसका इस्तेमाल चिकित्सकीय निगरानी में कराया जा रहा है।
उनके अनुसार, धूम्रपान की आदत में केवल निकोटीन ही नहीं, बल्कि धुएं और धूम्रपान की पूरी प्रक्रिया से जुड़ी मनोवैज्ञानिक आदत भी महत्वपूर्ण होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए व्यक्ति की आदत को धीरे-धीरे कम करने का प्रयास किया जा रहा है।
शोधार्थी कर रहे हैं वैज्ञानिक अध्ययन
इस पहल को केवल सामान्य उपचार के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। कॉलेज के शोधार्थी इस पूरी प्रक्रिया का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन भी कर रहे हैं।
शोधार्थी डॉ. प्रगति नेगी के अनुसार, शमन धूमपान को लेकर शोध किया जा रहा है और इस कार्य में कॉलेज प्रशासन का सहयोग मिल रहा है। प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों द्वारा बताए गए शमन धूमपान और आयुर्वेद धूमपान की अवधारणाओं को वैज्ञानिक तरीके से आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
बताया गया है कि इस शोध को सेंट्रल क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया में पंजीकृत कराया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि इस प्रयोग के प्रभाव और परिणामों का व्यवस्थित अध्ययन करने की कोशिश की जा रही है।
शुरुआती परिणामों में क्या सामने आया?
कॉलेज की जानकारी के अनुसार, पिछले कुछ समय से धूम्रपान छोड़ने के इच्छुक लोगों को चिकित्सकों की निगरानी में हर्बल स्मोकिंग स्टिक का इस्तेमाल कराया जा रहा है।
शुरुआती चरण में कुछ लोगों ने धूम्रपान की इच्छा में कमी महसूस होने की बात कही है। कॉलेज से मिली जानकारी के अनुसार, करीब 15 लोगों ने धूम्रपान की लत छोड़ने के लिए पंजीकरण कराया है।
हालांकि, इन शुरुआती परिणामों को अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। किसी भी उपचार या चिकित्सकीय पद्धति की प्रभावशीलता साबित करने के लिए पर्याप्त संख्या में प्रतिभागियों पर व्यवस्थित अध्ययन, लंबे समय तक निगरानी और वैज्ञानिक मूल्यांकन जरूरी होता है।
इसलिए फिलहाल इसे एक शोध एवं चिकित्सकीय पहल के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
40 साल की धूम्रपान की आदत वाले व्यक्ति ने क्या बताया?
इस उपचार प्रक्रिया से जुड़े एक व्यक्ति रामकुमार ने बताया कि वह करीब 40 वर्षों से धूम्रपान की आदत से परेशान थे। उन्होंने पहले भी कई बार धूम्रपान छोड़ने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली।
उनके अनुसार, हर्बल दंडिका का इस्तेमाल करने के बाद उन्हें धूम्रपान की इच्छा में कमी महसूस हुई है और उन्हें उम्मीद है कि धीरे-धीरे वह तंबाकू की आदत से पूरी तरह छुटकारा पा सकेंगे।
ऐसे व्यक्तिगत अनुभव उत्साह बढ़ाने वाले जरूर हैं, लेकिन किसी एक व्यक्ति के अनुभव के आधार पर किसी उपचार को सभी लोगों के लिए प्रभावी या सुरक्षित घोषित नहीं किया जा सकता। इसके लिए व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन के परिणाम जरूरी होते हैं।
कैसे करा सकते हैं पंजीकरण?
अगर कोई व्यक्ति धूम्रपान की लत छोड़ना चाहता है और ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज की इस चिकित्सकीय प्रक्रिया के बारे में जानकारी लेना चाहता है, तो वह कॉलेज की ओपीडी में संपर्क कर सकता है।
बताई गई प्रक्रिया के अनुसार, सबसे पहले ओपीडी के काउंटर पर जाकर ₹10 की सरकारी फीस देकर पर्ची बनवानी होती है। इसके बाद चिकित्सक व्यक्ति की स्थिति समझने के लिए काउंसलिंग करते हैं।
इस दौरान डॉक्टर व्यक्ति से उसकी उम्र, कितने वर्षों से धूम्रपान कर रहा है, रोजाना कितनी मात्रा में धूम्रपान करता है और पहले छोड़ने की कोशिश की या नहीं, जैसी जानकारी ले सकते हैं।
इसके साथ ही स्वास्थ्य की स्थिति का आकलन करने के लिए ब्रीथ टेस्ट, वजन, रक्तचाप, रक्त शर्करा और थायरॉयड जैसी स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों की जांच की जा सकती है। व्यक्ति की पूरी स्थिति देखने के बाद ही चिकित्सक यह तय करते हैं कि उसे आगे की प्रक्रिया में शामिल किया जाना है या नहीं।
बिना डॉक्टर की सलाह के इस्तेमाल न करें
हर्बल बीड़ी को लेकर सबसे जरूरी सावधानी यही है कि इसे बाजार में मिलने वाली सामान्य बीड़ी के विकल्प के रूप में खुद से खरीदकर इस्तेमाल न किया जाए।
धुआं अंदर लेने वाली किसी भी प्रक्रिया के स्वास्थ्य प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं। किसी पदार्थ में तंबाकू या निकोटीन न होने मात्र से यह साबित नहीं होता कि उसका धुआं फेफड़ों के लिए पूरी तरह सुरक्षित है।
इसीलिए ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज में भी इसका इस्तेमाल चिकित्सकों की निगरानी में कराया जा रहा है। जो व्यक्ति धूम्रपान छोड़ना चाहता है, उसे अपने स्तर पर प्रयोग करने के बजाय योग्य चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए।
क्या यह सामान्य बीड़ी-सिगरेट का स्थायी विकल्प है?
नहीं। इस पहल का उद्देश्य सामान्य बीड़ी या सिगरेट को किसी दूसरी धूम्रपान वाली वस्तु से स्थायी रूप से बदलना नहीं बताया गया है। इसका उद्देश्य धूम्रपान की आदत और उससे जुड़ी तलब को कम करते हुए व्यक्ति को तंबाकू और निकोटीन से दूर करने में मदद करना है।
इसलिए इसे धूम्रपान छोड़ने की प्रक्रिया के एक चिकित्सकीय अध्ययन या सहायता पद्धति के रूप में समझना चाहिए, न कि नियमित धूम्रपान के सुरक्षित विकल्प के तौर पर।
आयुर्वेद और आधुनिक शोध का मेल
इस पूरी पहल की एक खास बात यह है कि इसमें आयुर्वेद के पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक शोध पद्धति को साथ लेकर आगे बढ़ने का प्रयास किया जा रहा है।
चरक, सुश्रुत और वाग्भट्ट जैसे आयुर्वेदाचार्यों के ग्रंथों में धूमपान से संबंधित अवधारणाओं का उल्लेख मिलता है। ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज के विशेषज्ञ इन्हीं सिद्धांतों को वर्तमान समय की आवश्यकता और वैज्ञानिक अध्ययन के अनुरूप समझने का प्रयास कर रहे हैं।
यदि आगे चलकर बड़े स्तर पर किए गए शोध में इस पद्धति की प्रभावशीलता और सुरक्षा के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं, तो धूम्रपान छोड़ने के क्षेत्र में यह एक उपयोगी अतिरिक्त विकल्प के रूप में विकसित हो सकती है। फिलहाल इसके परिणामों को लेकर और शोध की आवश्यकता है।
धूम्रपान छोड़ने की इच्छा रखने वालों के लिए संदेश
धूम्रपान छोड़ना कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। कई लोगों को एक से अधिक प्रयासों की जरूरत पड़ती है। यदि कोई व्यक्ति अकेले धूम्रपान छोड़ने में सफल नहीं हो पा रहा है, तो उसे शर्मिंदा होने के बजाय चिकित्सकीय मदद और परामर्श लेना चाहिए।
ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज की यह पहल ऐसे लोगों को एक नए उपचार एवं शोध विकल्प के बारे में जानकारी दे रही है। कॉलेज की ओपीडी में उपलब्ध प्रक्रिया के अनुसार, इच्छुक व्यक्ति पंजीकरण कराकर चिकित्सकीय परामर्श प्राप्त कर सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि धूम्रपान छोड़ने के लिए किसी भी उपचार को डॉक्टर की सलाह और निगरानी में ही अपनाया जाए। हर्बल दंडिका को भी अपने स्तर पर सामान्य बीड़ी समझकर इस्तेमाल करना उचित नहीं है।
धूम्रपान से छुटकारा पाने की दिशा में यह पहल फिलहाल शुरुआती चरण में है। इसके प्रारंभिक परिणाम उत्साहजनक बताए जा रहे हैं, लेकिन इसके प्रभाव और सुरक्षा को लेकर ठोस निष्कर्ष के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है। आने वाले समय में शोध के परिणाम यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे कि यह पद्धति धूम्रपान की लत से जूझ रहे लोगों के लिए कितनी प्रभावी साबित होती है।
