उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में एक बड़ा प्रशासनिक फैसला इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। मुजफ्फरनगर में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की फास्ट ट्रैक कोर्ट से करीब 100 हत्या और गंभीर आपराधिक मामलों को प्रशासनिक आदेश के तहत दूसरी अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया है। इन मामलों की सुनवाई अब जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में होने की बात सामने आई है। यह फैसला इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि पिछले लगभग चार महीनों के दौरान जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने 10 अलग-अलग मामलों में फैसला सुनाते हुए 22 दोषियों को मृत्युदंड की सजा दी थी।
लगातार बड़ी संख्या में आए मृत्युदंड के फैसलों के बाद रवि कुमार दिवाकर का नाम एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया है। इससे पहले वह वर्ष 2022 में वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर के वीडियोग्राफी सर्वे से जुड़े आदेश के कारण देशभर में सुर्खियों में रहे थे। अब मुजफ्फरनगर में उनके द्वारा सुनाए गए फैसलों और उनकी अदालत से बड़ी संख्या में हत्या के मामलों के ट्रांसफर ने कानूनी और सामाजिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।
प्रशासनिक आदेश के बाद करीब 100 हत्या के मामले ट्रांसफर
जानकारी के अनुसार, अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की फास्ट ट्रैक कोर्ट में लंबित करीब 100 हत्या के मामलों को प्रशासनिक आदेश के जरिए जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में स्थानांतरित किया गया है। इन मामलों में ऐसे गंभीर अपराध भी शामिल बताए गए हैं, जिनमें दोष सिद्ध होने पर मृत्युदंड या आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है।
सरकारी पक्ष से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, यह एक प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत लिया गया फैसला है। हालांकि, इस फैसले के पीछे के कारणों को लेकर अलग-अलग स्तर पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। क्योंकि यह निर्णय ऐसे समय में सामने आया है, जब रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने कुछ ही महीनों के भीतर बड़ी संख्या में आरोपियों को मृत्युदंड सुनाया है।
मामलों के ट्रांसफर के बाद अब इनकी आगे की सुनवाई जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में होगी। प्रशासनिक आदेश के बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट से संबंधित मामलों की फाइलें स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू होने की बात भी सामने आई है।
चार महीनों में 10 मामलों का निपटारा, 22 दोषियों को मौत की सजा
रवि कुमार दिवाकर की अदालत पिछले कुछ महीनों से लगातार अपने फैसलों को लेकर चर्चा में रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पिछले लगभग चार महीनों में उनकी अदालत ने 10 अलग-अलग आपराधिक मामलों में फैसला सुनाया। इन मामलों में कुल 22 दोषियों को मृत्युदंड की सजा दी गई।
इतनी कम अवधि में बड़ी संख्या में मृत्युदंड के फैसलों ने कानूनी जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा। हर मामला अलग-अलग परिस्थितियों और अपराधों से जुड़ा था। इनमें हत्या, अपहरण के बाद हत्या, पुरानी रंजिश में हत्या, डबल मर्डर और अन्य गंभीर अपराध शामिल बताए गए।
भारतीय कानून में मृत्युदंड को सबसे कठोर सजा माना जाता है। अदालतें आमतौर पर ऐसे मामलों में सभी परिस्थितियों, अपराध की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद फैसला देती हैं। कई मामलों में अदालत द्वारा अपराध को दुर्लभतम श्रेणी यानी “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” की श्रेणी में रखे जाने के बाद मृत्युदंड की सजा सुनाई जाती है।
रवि कुमार दिवाकर की अदालत द्वारा लगातार आए इन फैसलों के बाद उनका नाम एक बार फिर देशभर में चर्चा का विषय बन गया।
12 साल पुराने हत्या मामले में चार दोषियों को फांसी
13 अगस्त को रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने वर्ष 2014 के एक हत्या मामले में चार आरोपियों को दोषी मानते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई। दोषियों के नाम रामवीर, राजीव, राहुल और हरेंद्र कुमार बताए गए।
मामले के अनुसार, पुरानी रंजिश के चलते आरोपियों ने शामली जिले में पवन कुमार के घर में घुसकर गोलीबारी की थी। इस हमले में पवन कुमार की मौत हो गई थी, जबकि उनके भाई अशोक कुमार घायल हो गए थे।
अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद चारों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड सुनाया। इसके साथ ही दोषियों पर आर्थिक जुर्माना भी लगाया गया।
फिरौती के लिए अपहरण और हत्या मामले में मृत्युदंड
12 अगस्त को एक पुराने अपहरण और हत्या मामले में भी रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने कठोर फैसला सुनाया। करीब 27 साल पुराने इस मामले में शाहनवाज नाम के दोषी को मृत्युदंड दिया गया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, वर्ष 1999 में सलीम नाम के व्यक्ति का फिरौती के लिए अपहरण किया गया था। उसके बदले पांच लाख रुपये की फिरौती मांगे जाने का आरोप था। बाद में सलीम की हत्या कर दी गई और उसका शव छपार क्षेत्र के जंगल में मिलने की बात सामने आई।
लंबे समय तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर फैसला सुनाया। यह मामला भी उन फैसलों में शामिल रहा, जिन्होंने जज दिवाकर की अदालत को चर्चा के केंद्र में ला दिया।
किसान की हत्या मामले में चार को सुनाई गई फांसी
17 जुलाई को वर्ष 2011 के एक हत्या मामले में चार आरोपियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। मामला एक किसान राज सिंह की हत्या से जुड़ा था।
जानकारी के अनुसार, 20 अगस्त 2011 को राज सिंह अपने मित्र बिजेंद्र के साथ मोटरसाइकिल से अपनी बहन के घर जा रहे थे। रास्ते में बदमाशों द्वारा लूट की कोशिश किए जाने का आरोप था। विरोध करने पर राज सिंह को गोली मार दी गई, जिससे उनकी मौत हो गई।
वहीं, उनके साथ मौजूद बिजेंद्र को कथित तौर पर बांधकर गन्ने के खेत में फेंक दिया गया था। मामले की लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने चार आरोपियों को दोषी ठहराया और उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई।
पूर्व ग्राम प्रधान और उसके सहयोगी को मौत की सजा
6 जुलाई को वर्ष 2010 के एक हत्या मामले में पूर्व ग्राम प्रधान प्रमोद और उसके सहयोगी साहदेव को मृत्युदंड दिया गया। यह मामला पंचायत चुनाव की रंजिश से जुड़ा बताया गया था।
अभियोजन के अनुसार, 24 अगस्त 2010 को 60 वर्षीय राजबीर सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे दुर्लभतम श्रेणी के अपराधों में शामिल माना और दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
इस फैसले के बाद भी रवि कुमार दिवाकर की अदालत की कार्यशैली और फैसलों को लेकर कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई।
ड्यूटी पर तैनात होमगार्ड की हत्या पर सुनाया गया बड़ा फैसला
2 जुलाई को एक अन्य गंभीर मामले में अदालत ने होमगार्ड रतिराम की हत्या के दोषी दीपक को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
घटना 4 जून 2020 की बताई गई। आरोप था कि दीपक अपनी मां के साथ मारपीट कर रहा था। इस दौरान बीच-बचाव करने पहुंचे ड्यूटी पर तैनात होमगार्ड रतिराम पर हमला किया गया और उनकी चाकू मारकर हत्या कर दी गई।
अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए इसे भी “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” श्रेणी का अपराध माना और दोषी को फांसी की सजा सुनाई।
राजेंद्र सैनी हत्याकांड में दो को फांसी
20 जून को राजेंद्र सैनी हत्याकांड में भी रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने गजेंद्र और रामकिरण को मृत्युदंड की सजा सुनाई। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और अपराध की प्रकृति पर विचार करते हुए माना कि यह मामला दुर्लभतम श्रेणी में आता है।
इस फैसले ने एक बार फिर यह दिखाया कि पिछले कुछ महीनों के दौरान जज दिवाकर की अदालत लगातार गंभीर आपराधिक मामलों का निपटारा कर रही थी और कई मामलों में सबसे कठोर सजा सुनाई गई।
15 साल पुराने डबल मर्डर केस में भी फांसी
30 मई को फास्ट ट्रैक कोर्ट ने करीब 15 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में 50 वर्षीय रहीस को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
मामले के अनुसार, वर्ष 2011 में राजेश देवी और उनके छह वर्षीय बेटे हिमांशु की हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि दोनों को गन्ने के खेत में ले जाकर ईंटों से हमला किया गया। बाद में दोनों के शव बरामद हुए थे।
लंबी सुनवाई और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई। पुराने मामलों में तेजी से फैसला आने के कारण भी रवि कुमार दिवाकर की अदालत चर्चा में रही।
महिला और उसके तीन बेटों को भी सुनाई गई मौत की सजा
28 अप्रैल को वर्ष 2019 के एक हत्या मामले में एक महिला और उसके तीन बेटों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। इस फैसले के बाद चार आरोपियों को एक साथ फांसी की सजा दिए जाने का मामला काफी चर्चा में रहा।
इसी तरह 6 अप्रैल को वर्ष 2019 में अधिवक्ता मोहम्मद समीर के अपहरण और हत्या से जुड़े मामले में तीन दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, करीब 45 लाख रुपये के लेनदेन विवाद को लेकर समीर का अपहरण किया गया था। बाद में उनकी हत्या कर शव को दूसरी जगह फेंक दिया गया। जांच के दौरान शव सिकरी गांव के जंगल क्षेत्र से बरामद होने की बात सामने आई थी।
इन सभी मामलों को मिलाकर पिछले चार महीनों में जज दिवाकर की अदालत ने कुल 22 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
कौन हैं रवि कुमार दिवाकर?
रवि कुमार दिवाकर उत्तर प्रदेश की न्यायिक सेवा के चर्चित न्यायिक अधिकारियों में शामिल हैं। वह अपने कुछ महत्वपूर्ण और चर्चित फैसलों के कारण लंबे समय से सुर्खियों में रहे हैं।
लखनऊ निवासी रवि कुमार दिवाकर ने उच्च शिक्षा के दौरान बीकॉम और एलएलएम की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने न्यायिक सेवा में प्रवेश किया और वर्ष 2009 में आजमगढ़ में अतिरिक्त सिविल जज के रूप में अपने न्यायिक करियर की शुरुआत की।
न्यायिक सेवा में काम करते हुए उन्होंने अलग-अलग पदों पर जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2015 में उन्हें सुल्तानपुर में सिविल जज के पद पर पदोन्नति मिली। इसके कुछ समय बाद उन्होंने न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली।
बाद के वर्षों में अलग-अलग स्थानों पर न्यायिक जिम्मेदारियां निभाने के बाद नवंबर 2025 से वह मुजफ्फरनगर में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश यानी एडीजे के पद पर कार्यरत बताए गए।
उनकी कार्यशैली और फैसलों की वजह से उनका नाम न्यायिक जगत के चर्चित अधिकारियों में लिया जाने लगा।
ज्ञानवापी मामले से मिली थी राष्ट्रीय पहचान
रवि कुमार दिवाकर वर्ष 2022 में उस समय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए थे, जब उन्होंने वाराणसी स्थित ज्ञानवापी परिसर से जुड़े मामले में वीडियोग्राफी सर्वे का आदेश दिया था।
यह मामला देशभर में व्यापक रूप से चर्चा का विषय बना था। अदालत के आदेश के बाद ज्ञानवापी परिसर का सर्वे हुआ और इसके बाद रवि कुमार दिवाकर का नाम राष्ट्रीय मीडिया और कानूनी जगत में व्यापक रूप से चर्चा में आया।
ज्ञानवापी मामले के बाद उनके कई अन्य फैसले भी चर्चा में रहे। अब मुजफ्फरनगर में बड़ी संख्या में हत्या के मामलों में फैसले और 22 दोषियों को मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद वह एक बार फिर सुर्खियों में हैं।
बार एसोसिएशन ने जताई आशंकाएं
मामलों के ट्रांसफर को लेकर बार एसोसिएशन के कुछ पदाधिकारियों की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। जिला बार एसोसिएशन से जुड़े पदाधिकारियों का कहना है कि लगातार मृत्युदंड के फैसले आने के बाद कुछ वकीलों और मुकदमों से जुड़े पक्षकारों के बीच अलग-अलग तरह की आशंकाएं पैदा हो रही थीं।
बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी के अनुसार, कुछ लोगों के बीच यह धारणा बनने लगी थी कि हत्या और गंभीर मामलों में दोष सिद्ध होने पर अदालत द्वारा कठोरतम सजा सुनाए जाने की संभावना अधिक हो सकती है।
हालांकि, किसी भी न्यायिक फैसले के बारे में अंतिम निष्कर्ष अदालत के रिकॉर्ड, साक्ष्यों, कानून और फैसले में दर्ज कारणों के आधार पर ही निकाला जा सकता है। किसी अदालत या न्यायाधीश के बारे में केवल परिणामों के आधार पर व्यापक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं माना जाता।
मामलों के ट्रांसफर को एक प्रशासनिक निर्णय बताया गया है और इस पर न्यायपालिका की ओर से सार्वजनिक रूप से विस्तृत टिप्पणी सामने नहीं आई है।
अब जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में होगी सुनवाई
प्रशासनिक आदेश के बाद अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की अदालत में लंबित हत्या और अन्य गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई अब जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में होगी।
करीब 100 मामलों के एक साथ ट्रांसफर ने इस फैसले को खास बना दिया है। इन मामलों में आगे की सुनवाई, गवाहों की पेशी, साक्ष्यों की जांच और अंतिम निर्णय अब संबंधित अदालत की प्रक्रिया के अनुसार होंगे।
इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में एक नई बहस को जन्म दिया है। एक तरफ रवि कुमार दिवाकर की अदालत द्वारा गंभीर अपराधों में तेजी से फैसले और कठोर सजाएं चर्चा का विषय हैं, वहीं दूसरी तरफ बड़ी संख्या में मामलों के प्रशासनिक ट्रांसफर ने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया है।
रवि कुमार दिवाकर पहले ही ज्ञानवापी मामले से राष्ट्रीय पहचान हासिल कर चुके हैं। अब पिछले चार महीनों में 10 मामलों में 22 दोषियों को मृत्युदंड सुनाने और उनकी अदालत से करीब 100 हत्या के मामलों के ट्रांसफर के बाद उनका नाम फिर से सुर्खियों में है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इन मामलों की सुनवाई जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में किस तरह आगे बढ़ती है और इस प्रशासनिक निर्णय को लेकर न्यायिक तथा कानूनी स्तर पर क्या और स्पष्टीकरण सामने आता है। फिलहाल इतना तय है कि मुजफ्फरनगर की अदालतों से जुड़ा यह घटनाक्रम न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे देश के कानूनी और सामाजिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
