
नैनीताल: उत्तराखंड में चीन सीमा से सटी सामरिक रूप से अति-संवेदनशील नेलांग घाटी में ग्रामीणों की भूमि के ‘अवैध’ कब्जे और पुनर्वास का मामला अब कानूनी गलियारों में गर्मा गया है। नैनीताल हाईकोर्ट ने इस गंभीर विषय पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय और उत्तराखंड सरकार के विभिन्न विभागों से विस्तृत जवाब तलब किया है। मामला 1962 के युद्ध के बाद से ग्रामीणों की भूमि पर बिना किसी औपचारिक अधिग्रहण प्रक्रिया के सेना और सुरक्षा बलों के काबिज होने से जुड़ा है।
न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ में हुई सुनवाई
न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकल पीठ ने ‘जाड़ भोटिया जनकल्याण समिति’ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता समिति ने अदालत के समक्ष साक्ष्यों के साथ यह दलील रखी कि दशकों से सीमांत क्षेत्र के निवासी अपनी ही पैतृक भूमि से बेदखल हैं और उन्हें न तो मुआवजा मिला है और न ही सही ढंग से पुनर्वासित किया गया है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय गृह सचिव, रक्षा सचिव, उत्तराखंड के गृह सचिव, वन सचिव और जनजातीय कल्याण निदेशालय को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
1962 युद्ध और ‘निर्वासन’ की अनकही कहानी
याचिका में उल्लेख किया गया है कि साल 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान सुरक्षा कारणों से भारतीय सेना ने नेलांग घाटी का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया था। उस समय सुरक्षा के मद्देनजर ग्रामीणों को वहां से हटा दिया गया और पूरी घाटी में आम नागरिकों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया।
समिति का कहना है कि साल 1990 में भारत सरकार ने नेलांग गांव की 278 नाली निजी भूमि (भूमिधरी) और 18 नाली सरकारी भूमि के हस्तांतरण की सैद्धांतिक मंजूरी तो दी थी, लेकिन विडंबना यह रही कि अधिग्रहण की कानूनी प्रक्रिया कभी पूरी ही नहीं की गई। बिना मुआवजा दिए और बिना किसी औपचारिक कागजी कार्रवाई के सेना ने इस जमीन पर कब्जा कर लिया, जो आज भी जारी है।
सर्वे रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा: हेलीपैड और भवन भी बने
मामले में नया मोड़ तब आया जब साल 2020 में उत्तरकाशी के जिलाधिकारी द्वारा गठित 13 सदस्यीय संयुक्त समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई। इस समिति में सेना और सशस्त्र बलों के प्रतिनिधि भी शामिल थे। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से पुष्टि की गई कि:
-
नेलांग गांव: यहाँ की 6.173 हेक्टेयर भूमिधरी जमीन पर सेना का पूर्ण कब्जा है, जहाँ वर्तमान में सेना के भवन और हेलीपैड संचालित हो रहे हैं।
-
जादूंग गांव: यहाँ की 2.807 हेक्टेयर भूमि पर भारत तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP), सेना और वन विभाग काबिज हैं।
जाड़ भोटिया समुदाय का आरोप है कि 2014 से 2019 के बीच सरकार को अनगिनत प्रत्यावेदन दिए गए, लेकिन प्रशासन की ओर से केवल आश्वासन ही मिले, धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
‘वाइब्रेंट विलेज’ योजना और ग्रामीणों का अधिकार
हाल के वर्षों में केंद्र सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास के लिए ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ (Vibrant Village Program) शुरू किया है। इसके तहत जादूंग गांव को एक मॉडल विलेज के रूप में विकसित किया जा रहा है और वहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए 23 होमस्टे बनाने की योजना है।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांग यह है कि यदि सरकार इन गांवों का विकास कर रही है, तो वहां के मूल निवासियों (जाड़ भोटिया समुदाय) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने मांग की है कि:
-
उन्हें वाइब्रेंट विलेज योजना का सीधा लाभ मिले।
-
उनकी भूमि का उचित मुआवजा दिया जाए या उन्हें मालिकाना हक के साथ पुनर्वासित किया जाए।
-
घाटी में उनके धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों को बहाल किया जाए।
सामरिक महत्व बनाम नागरिक अधिकार
नेलांग और जादूंग गांव सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यह क्षेत्र नीले भेड़ (Bharal) और हिम तेंदुओं के लिए भी जाना जाता है और गंगोत्री नेशनल पार्क का हिस्सा है। लेकिन ग्रामीणों का तर्क है कि देश की सुरक्षा सर्वोपरि है, पर इसके लिए नागरिकों के मौलिक अधिकारों और उनकी संपत्ति का बिना मुआवजे के उपभोग करना संवैधानिक रूप से गलत है।
भविष्य की राह:
हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब केंद्र और राज्य सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि आखिर छह दशकों तक अधिग्रहण की प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में क्यों रखा गया? यदि सरकार जादूंग को पर्यटन के लिए खोल रही है, तो वहां के पुराने बाशिंदों को उनके हक से वंचित रखना कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण होगा।
अदालत की अगली सुनवाई इस मामले में निर्णायक साबित हो सकती है, जो न केवल उत्तरकाशी के इन सीमांत गांवों का भाग्य तय करेगी, बल्कि सीमा सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच एक नया संतुलन भी स्थापित करेगी।


