देहरादून। उत्तराखंड में NEET-UG के जरिए MBBS दाखिले के लिए कथित तौर पर फर्जी स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण पत्र तैयार कराने के मामले ने अब गंभीर और बड़े नेटवर्क का रूप लेना शुरू कर दिया है। फर्जी प्रमाण पत्रों के जरिए मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की जांच कर रही देहरादून पुलिस की विशेष जांच टीम (SIT) ने 22 सितंबर को पहली बड़ी कार्रवाई करते हुए दो आरोपियों रूपेश पंडित और अरविंद कुमार को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, जांच में प्रत्येक MBBS सीट के लिए 45 लाख रुपये तक की कथित डील किए जाने की बात सामने आई है।
दो आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद अब SIT की जांच केवल फर्जी प्रमाण पत्र बनवाने और मेडिकल कॉलेज में दाखिले तक सीमित नहीं रही है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि आखिर इस पूरे खेल में फर्जी प्रमाण पत्र तैयार करने से लेकर सरकारी रिकॉर्ड में उसे इस्तेमाल कराने, काउंसलिंग प्रक्रिया तक पहुंचाने और मेडिकल सीट हासिल कराने तक कितने लोग शामिल थे। पुलिस के अनुसार, फिलहाल कई संदिग्ध जांच के रडार पर हैं और आने वाले दिनों में जांच का दायरा और बढ़ सकता है।
45 लाख रुपये में MBBS सीट की कथित डील ने खोली जांच की नई कड़ी
SIT की अब तक की जांच में जो सबसे अहम बात सामने आई है, वह है MBBS दाखिले के लिए 45 लाख रुपये की कथित डील। पुलिस के अनुसार, मेरठ में एजुकेशन कंसल्टेंसी चलाने वाले रूपेश पंडित पर आरोप है कि उसने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के माध्यम से मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलाने के लिए प्रति अभ्यर्थी 45 लाख रुपये लेने की बात कही थी।
जांच के अनुसार, तीन अभ्यर्थियों के परिजनों से कथित तौर पर एडवांस राशि ली गई। पुलिस के सामने आए विवरण में प्रत्येक अभ्यर्थी के लिए करीब 20 लाख रुपये एडवांस दिए जाने की बात सामने आई है। शेष रकम दाखिले की प्रक्रिया पूरी होने के बाद देने की बात बताई गई थी।
अब SIT यह पता लगाने में जुटी है कि यह रकम किसके पास पहुंची, किस माध्यम से लेनदेन हुआ और फर्जी प्रमाण पत्र तैयार करने वाले लोगों तक पैसे किस तरह पहुंचाए गए। इसीलिए बैंक खातों, मोबाइल फोन, कॉल डिटेल, चैट और डिजिटल दस्तावेजों की जांच को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कथित मास्टरमाइंड रूपेश पंडित की भूमिका पर सबसे ज्यादा नजर
गिरफ्तार आरोपियों में बिहार निवासी रूपेश पंडित को पुलिस ने इस मामले का कथित मास्टरमाइंड बताया है। पुलिस के अनुसार, वह पिछले करीब पांच वर्षों से मेरठ में एजुकेशन कंसल्टेंसी का काम कर रहा था। उसकी कंसल्टेंसी के जरिए मेडिकल के साथ-साथ अन्य प्रोफेशनल कोर्सों में दाखिले से संबंधित काम भी किए जाने की बात जांच में सामने आई है।
पुलिस अब इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या फर्जी प्रमाण पत्रों का इस्तेमाल केवल उत्तराखंड में मेडिकल दाखिलों के लिए किया गया या इस नेटवर्क की गतिविधियां दूसरे राज्यों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों तक भी फैली हुई थीं।
SIT की जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर पुलिस का मानना है कि मामले में केवल एक-दो लोगों की भूमिका नहीं हो सकती। यही वजह है कि गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के साथ-साथ उनके संपर्क में रहे लोगों, अभ्यर्थियों, परिजनों, बिचौलियों और दस्तावेज तैयार करने वालों की भूमिका भी खंगाली जा रही है।
एक ही स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर चार प्रमाण पत्र!
इस मामले की जांच में सबसे चौंकाने वाले तथ्यों में से एक यह भी सामने आया कि एक ही स्वतंत्रता सेनानी के नाम का इस्तेमाल कर चार अभ्यर्थियों के लिए कथित फर्जी स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण पत्र तैयार किए गए।
जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इन प्रमाण पत्रों में संबंधित अभ्यर्थियों का स्वतंत्रता सेनानी से संबंध कैसे दिखाया गया और सरकारी रिकॉर्ड में इस संबंध को सत्यापित करने की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई।
रिपोर्टों के मुताबिक, चार अलग-अलग अभ्यर्थियों के प्रमाण पत्रों में देहरादून के स्वतंत्रता सेनानी धर्मवीर के नाम का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। एक रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कुछ फर्जी प्रमाण पत्रों में स्वतंत्रता सेनानी की तस्वीर तक कृत्रिम तरीके से तैयार किए जाने की आशंका सामने आई है।
इस खुलासे ने जांच का एक और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है—अगर मूल रिकॉर्ड में किसी अभ्यर्थी का वास्तविक पारिवारिक संबंध नहीं था तो संबंधित प्रमाण पत्र सरकारी प्रक्रिया से जारी कैसे हो गए?
यही सवाल अब SIT और प्रशासनिक जांच के केंद्र में है।
फर्जी प्रमाण पत्र से कम अंक वालों को MBBS सीट मिलने का आरोप
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि जिन अभ्यर्थियों के दाखिलों की जांच हुई, उनके NEET अंकों और कथित तौर पर हासिल की गई सीटों को लेकर भी सवाल उठे हैं।
जांच के दौरान सामने आए मामलों में अलग-अलग अभ्यर्थियों के अंक 301, 338 और 400 बताए गए हैं। वहीं एक अन्य अभ्यर्थी के 234 अंक होने की जानकारी सामने आई, जिसका प्रमाण पत्र फर्जी पाए जाने की बात कही गई है।
इनमें तीन मामलों में मेडिकल कॉलेजों में हुए दाखिलों को निरस्त किए जाने की जानकारी सामने आई है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी विशेष अंक वाले अभ्यर्थी के लिए सामान्य या आरक्षित श्रेणी में सीट पाने की संभावना कई कारकों पर निर्भर करती है। इसलिए केवल अंक देखकर किसी अभ्यर्थी की पात्रता पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। हालांकि, यदि किसी सीट के लिए गलत दस्तावेज का इस्तेमाल साबित होता है, तो दस्तावेजों की सत्यता और प्रवेश प्रक्रिया दोनों जांच के दायरे में आना स्वाभाविक है।
उत्तराखंड में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे की सीटें भी जांच के केंद्र में
उत्तराखंड के मेडिकल कॉलेजों में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के तहत MBBS दाखिलों को लेकर उठे सवालों ने इस पूरी व्यवस्था की दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया पर भी ध्यान केंद्रित कर दिया है।
जांच एजेंसियां अब यह देख रही हैं कि अभ्यर्थियों ने आवेदन के दौरान कौन-कौन से दस्तावेज लगाए, उनके सत्यापन की जिम्मेदारी किस स्तर पर थी और प्रमाण पत्र जारी करने से पहले संबंधित रिकॉर्ड का मिलान किस तरह किया गया।
इसी क्रम में प्रशासनिक स्तर पर जारी किए गए प्रमाण पत्रों की फाइलें भी जांची जा रही हैं। SDM कार्यालय, तहसील, राजस्व विभाग और संबंधित प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड SIT के लिए महत्वपूर्ण हो गए हैं।
दो लेखपाल निलंबित, अब राजस्व विभाग की भूमिका भी जांच के घेरे में
मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने जांच की और दो लेखपालों को निलंबित किया गया है। अब जांच की आंच राजस्व विभाग की उस प्रक्रिया तक पहुंच रही है, जहां से संबंधित प्रमाण पत्रों की जांच और सत्यापन की प्रक्रिया जुड़ी होती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन दस्तावेजों के आधार पर प्रमाण पत्र तैयार हुए, उनके सत्यापन के दौरान जमीनी स्तर पर क्या जांच की गई थी।
सामने आए आरोपों के अनुसार, जांच के घेरे में आए एक लेखपाल द्वारा संबंधित व्यक्ति के घर का निरीक्षण किए बिना ही कम समय में दस्तावेज तैयार किए जाने की बात कही जा रही है। दूसरे मामले में भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत वास्तविक स्थल निरीक्षण किए जाने को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
हालांकि, इन आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट के बाद ही होगी। फिलहाल लेखपालों की भूमिका भी जांच का हिस्सा है।
लेखपालों के पुराने रिकॉर्ड की भी पड़ताल
इस मामले ने केवल मौजूदा दस्तावेजों की जांच ही नहीं, बल्कि जांच के घेरे में आए कर्मचारियों के पुराने रिकॉर्ड को भी चर्चा में ला दिया है।
बताया जा रहा है कि दोनों लेखपालों के खिलाफ पहले भी शिकायतें अधिकारियों और मुख्यमंत्री पोर्टल तक पहुंच चुकी थीं। अब जांच एजेंसियां यह भी देख सकती हैं कि पूर्व में मिली शिकायतों का स्वरूप क्या था, उन पर क्या कार्रवाई हुई और संबंधित मामलों में दस्तावेजी प्रक्रिया किस प्रकार पूरी की गई थी।
यह जांच इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि किसी कर्मचारी की भूमिका केवल मौजूदा मामले तक सीमित नहीं पाई जाती और पुराने मामलों में भी अनियमितता सामने आती है, तो जांच का दायरा और विस्तृत हो सकता है।
हालांकि, किसी कर्मचारी के खिलाफ पुरानी शिकायत होना अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करता। इन शिकायतों की वास्तविकता और उनमें किसी प्रकार की अनियमितता थी या नहीं, यह संबंधित जांच में ही स्पष्ट होगा।
गिरोह के काम करने का तरीका भी जांच में आया सामने
SIT की जांच से जो तस्वीर सामने आ रही है, उसके मुताबिक कथित नेटवर्क में अलग-अलग लोगों की अलग-अलग भूमिकाएं हो सकती थीं।
एक स्तर पर ऐसे अभ्यर्थियों या उनके परिजनों की तलाश किए जाने की बात सामने आई है, जिन्हें मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए किसी वैकल्पिक रास्ते की तलाश थी।
इसके बाद अभ्यर्थी की स्थिति, उसकी श्रेणी और उपलब्ध अवसरों के आधार पर दस्तावेज तैयार कराने की व्यवस्था की जाती थी। कथित नेटवर्क में कुछ लोग दस्तावेजों की व्यवस्था, कुछ लोग दाखिले की प्रक्रिया और कुछ लोग अभ्यर्थियों या उनके परिजनों से आर्थिक लेनदेन से जुड़े हो सकते हैं।
अब पुलिस का मुख्य उद्देश्य इन सभी कड़ियों को जोड़ना है।
पहले ग्राहक की तलाश, फिर तैयार होती थी कथित योजना
जांच में सामने आए विवरण के मुताबिक, कथित तौर पर ऐसे परिवारों से संपर्क किया जाता था जिनके बच्चे NEET में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाए थे या मनचाहे मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं पा रहे थे।
ऐसे अभ्यर्थियों के परिजनों को कथित तौर पर आरक्षित या विशेष कोटे के जरिए मेडिकल सीट दिलाने का भरोसा दिया जाता था।
इसके बाद दस्तावेजों की व्यवस्था, प्रमाण पत्र बनवाने और काउंसलिंग में उनका इस्तेमाल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती थी।
अब SIT इस बात की जांच कर रही है कि क्या यह पूरी प्रक्रिया पहले से तय तरीके से चलती थी और इसमें प्रत्येक व्यक्ति को कोई निश्चित भूमिका दी गई थी।
मोबाइल फोन और डिजिटल चैट से खुल सकता है नेटवर्क
दोनों आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने उनके मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल सामग्री को जांच के लिए फोरेंसिक लैब भेजा है।
मोबाइल फोन से मिलने वाली जानकारी इस मामले में बेहद अहम साबित हो सकती है। पुलिस कॉल डिटेल रिकॉर्ड, व्हाट्सऐप या अन्य मैसेजिंग ऐप की बातचीत, दस्तावेजों की तस्वीरें, भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड और आरोपियों के संपर्कों की जांच कर सकती है।
अगर इन डिजिटल साक्ष्यों में अन्य लोगों के साथ लगातार संपर्क, पैसे के लेनदेन या फर्जी दस्तावेज तैयार कराने से संबंधित सामग्री मिलती है, तो SIT को नेटवर्क की अगली कड़ी तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।
इसी आधार पर पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि गिरफ्तार आरोपियों के संपर्क में कौन-कौन से अभ्यर्थी, उनके परिजन, बिचौलिए या सरकारी प्रक्रिया से जुड़े लोग थे।
12 संदिग्ध पुलिस के रडार पर
देहरादून के SSP प्रमेंद्र डोबाल ने बताया है कि जांच लगातार आगे बढ़ रही है और कई संदिग्ध पुलिस के रडार पर हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, SIT की जांच में करीब 12 संदिग्धों की भूमिका की पड़ताल की जा रही है।
इसका मतलब यह है कि दो गिरफ्तारियों के साथ मामला समाप्त नहीं हुआ है। बल्कि पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि कथित नेटवर्क की वास्तविक पहुंच कितनी थी और इसमें कौन-कौन लोग शामिल थे।
पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि जांच में किसी सरकारी कर्मचारी या निजी व्यक्ति की भूमिका सामने आती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
370 संदिग्ध प्रमाण पत्रों तक पहुंची जांच
मामले की शुरुआत स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण पत्रों से हुई थी, लेकिन अब जांच का दायरा अन्य श्रेणियों के प्रमाण पत्रों तक भी बढ़ाया जा रहा है।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 350 से 370 संदिग्ध डोमिसाइल और आरक्षित श्रेणी के प्रमाण पत्रों की जांच की बात सामने आई है। इसमें SC, ST, OBC, EWS और अन्य श्रेणियों से संबंधित दस्तावेजों को भी जांच के दायरे में लाए जाने की जानकारी है।
यदि इस व्यापक जांच में और फर्जी प्रमाण पत्र सामने आते हैं, तो यह मामला केवल स्वतंत्रता सेनानी कोटे तक सीमित नहीं रहेगा।
कब-कब क्या हुआ?
3 सितंबर: शिकायतकर्ता प्रदीप बहुगुणा ने फर्जी प्रमाण पत्रों को लेकर मंत्री और जिलाधिकारी के समक्ष शिकायत की।
5 सितंबर: चिकित्सा शिक्षा विभाग की ओर से मामले की जांच के निर्देश दिए गए।
9 सितंबर: जिलाधिकारी स्तर से जांच कमेटी गठित की गई।
10 सितंबर: कुछ अभ्यर्थियों के नाम पर जारी स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण पत्र निरस्त किए गए।
13 सितंबर: रायपुर और क्लेमेंटटाउन थानों में अलग-अलग मुकदमे दर्ज किए गए।
16 सितंबर: राज्य कोटे के तहत MBBS सीट पाने वाले अभ्यर्थियों के स्थायी प्रमाण पत्रों की भी जांच की मांग उठी।
18 सितंबर: देहरादून पुलिस ने SP ग्रामीण जया बलूनी के नेतृत्व में SIT गठित की।
20 सितंबर: SIT ने मामले से जुड़े मेडिकल कॉलेज के दस्तावेज जब्त किए और पूछताछ की।
22 सितंबर: SIT ने कथित मास्टरमाइंड रूपेश पंडित और अरविंद कुमार को गिरफ्तार किया।
अब सबसे बड़ा सवाल—कहां तक पहुंचती है जांच?
NEET UG MBBS फर्जी प्रमाण पत्र मामले में अब जांच एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां दो गिरफ्तारियां आगे की कार्रवाई का आधार बन सकती हैं। पुलिस के सामने अब कई महत्वपूर्ण सवाल हैं।
फर्जी प्रमाण पत्र किसने तैयार किए?
इनके लिए सरकारी रिकॉर्ड का इस्तेमाल कैसे हुआ?
सत्यापन प्रक्रिया में किन-किन स्तरों पर लापरवाही या कथित मिलीभगत हुई?
अभ्यर्थियों और उनके परिजनों से रकम किसने ली?
45 लाख रुपये की कथित डील में कितने लोगों की हिस्सेदारी थी?
क्या दूसरे मेडिकल कॉलेजों में भी इसी तरह के प्रमाण पत्र इस्तेमाल किए गए?
क्या अन्य आरक्षित श्रेणियों में भी ऐसा ही कोई नेटवर्क सक्रिय था?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या इस पूरे मामले के पीछे केवल बिचौलियों का नेटवर्क था या सरकारी तंत्र के भीतर भी किसी स्तर पर मिलीभगत की भूमिका सामने आएगी?
इन सवालों के जवाब अब SIT की जांच, फोरेंसिक रिपोर्ट, बैंक लेनदेन, मोबाइल डेटा और सरकारी रिकॉर्ड की पड़ताल से सामने आने हैं।
फिलहाल दो आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं, दो लेखपाल निलंबित किए जा चुके हैं और कई संदिग्ध जांच के दायरे में हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियां, नए नाम और नए दस्तावेज सामने आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, जिन लोगों के खिलाफ अभी केवल आरोप या संदेह की जांच चल रही है, उनकी भूमिका अंतिम रूप से जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय होगी।
