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खुद को प्रधानमंत्री मोदी का करीबी बताकर ठगी करने वाले मोहम्मद कासिफ को सुप्रीम कोर्ट से जमानत, 1.10 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग केस में राहत

The Hill India News
Last updated: May 18, 2026 9:56 am
The Hill India News
Published: May 18, 2026
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मोहम्मद कासिफ से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी को जमानत दे दी है। आरोपी पर आरोप था कि वह खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य केंद्रीय मंत्रियों का करीबी बताकर लोगों से ठगी करता था और सरकारी नौकरी, ठेके और अन्य प्रभावशाली काम दिलाने के नाम पर मोटी रकम वसूलता था। यह मामला करीब 1.10 करोड़ रुपये के कथित “प्रोसीड्स ऑफ क्राइम” से जुड़ा हुआ है।

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने सुनाया। अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले की परिस्थितियों, लंबी हिरासत और ट्रायल की स्थिति को देखते हुए आरोपी को जमानत दी जा सकती है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी माना कि आरोपी लगभग तीन साल से जेल में बंद है। इस दौरान मामले में जांच और ट्रायल दोनों चल रहे हैं, लेकिन ट्रायल की गति धीमी रही है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि इतनी लंबी हिरासत में रखने का औचित्य नहीं बनता, खासकर तब जब मामला आर्थिक अपराध से जुड़ा हो और आरोपी पहले से ही लंबे समय से न्यायिक हिरासत में हो।

ईडी के अनुसार, आरोपी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य वरिष्ठ मंत्रियों के साथ मॉर्फ्ड और एडिटेड तस्वीरें पोस्ट की थीं। इन तस्वीरों के जरिए वह यह दिखाने की कोशिश करता था कि उसके उच्चस्तरीय राजनीतिक संपर्क हैं। इसी कथित प्रभाव का इस्तेमाल कर वह लोगों को सरकारी नौकरी दिलाने, सरकारी ठेकों में काम दिलाने और मंत्रालयों में पहुंच दिलाने का झांसा देकर पैसे वसूलता था।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने यह भी दावा किया कि आरोपी के ठिकानों से 1.10 करोड़ रुपये से अधिक की नकदी और संपत्ति से जुड़ी रकम बरामद हुई है, जिसे कथित रूप से अपराध की आय माना जा रहा है। एजेंसी ने अप्रैल 2023 में इस मामले में ECIR दर्ज की थी और इसके बाद जांच शुरू की गई थी।

यह मामला गौतम बुद्ध नगर के सूरजपुर थाने में दर्ज एक FIR पर आधारित है, जिसमें धोखाधड़ी, जालसाजी और आईटी एक्ट से जुड़े गंभीर आरोप लगाए गए थे। जांच में सामने आया कि आरोपी ने लोगों को प्रभावशाली संपर्कों का झांसा देकर लगातार पैसे ऐंठे।

 प्रवर्तन निदेशालय ने अदालत को बताया कि आरोपी एक संगठित तरीके से लोगों को भ्रमित करता था और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर अपनी छवि एक प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में पेश करता था। एजेंसी का कहना था कि यह केवल साधारण धोखाधड़ी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक अपराध का मामला है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देते समय यह भी स्पष्ट किया कि यदि आरोपी जमानत की शर्तों का उल्लंघन करता है या जांच एवं ट्रायल में सहयोग नहीं करता है, तो प्रवर्तन निदेशालय ट्रायल कोर्ट में उसकी जमानत रद्द कराने की अर्जी दाखिल कर सकता है।

हाई कोर्ट ने पहले यह कहा था कि मामले में ट्रायल की प्रक्रिया लगातार आगे बढ़ रही है और अभियोजन पक्ष की ओर से अनावश्यक देरी नहीं की गई है। कुछ देरी आरोपी द्वारा दाखिल याचिकाओं और कानूनी प्रक्रियाओं के कारण भी हुई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने लंबी हिरासत को ध्यान में रखते हुए राहत देने का निर्णय लिया।

यह मामला एक बार फिर उन मामलों की ओर ध्यान खींचता है, जहां आरोपी सोशल मीडिया और फर्जी पहचान के जरिए खुद को प्रभावशाली व्यक्ति बताकर लोगों को ठगते हैं। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में जांच और ट्रायल जारी रहना जरूरी है, लेकिन लंबे समय तक बिना दोष सिद्ध हुए जेल में रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ हो सकता है।

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