
नई दिल्ली: देश के उच्च शिक्षा ढांचे में बदलाव के लिए लाए गए UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नए नियमों ने देशभर में एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक भूचाल को जन्म दे दिया है। सवर्ण समाज इन नियमों को अपने हितों पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ मान रहा है। विरोध की आग उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक फैल चुकी है। अब यह मामला देश की शीर्ष अदालत की चौखट पर है। सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को यूजीसी के इन विवादास्पद रेगुलेशन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा।
इस संवेदनशील मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच करेगी। अदालत के फैसले पर न केवल लाखों छात्रों का भविष्य टिका है, बल्कि केंद्र सरकार की राजनीतिक साख भी दांव पर लगी है।
सवर्णों का आक्रोश: खून से चिट्ठी और मशाल जुलूस
यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ सामान्य वर्ग का गुस्सा सातवें आसमान पर है। देश के अलग-अलग हिस्सों से आ रही तस्वीरें 1990 के मंडल कमीशन विरोधी आंदोलनों की याद ताजा कर रही हैं। सवर्ण समाज के युवा कहीं खून से प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख रहे हैं, तो कहीं मशाल जुलूस निकाल रहे हैं।
विरोध प्रदर्शनों का आलम यह है कि कई शहरों में आगजनी और तोड़फोड़ की खबरें भी सामने आई हैं। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट आरोप है कि UGC नए नियमों के जरिए सामान्य वर्ग के बच्चों के शैक्षणिक भविष्य को अंधकार में धकेला जा रहा है। उत्तर प्रदेश में इस मुद्दे की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक वरिष्ठ अधिकारी ने इन नियमों के विरोध में अपने पद से इस्तीफा तक दे दिया।
“रोलेट एक्ट” से तुलना: ब्राह्मण और क्षत्रिय संगठनों की चेतावनी
सवर्ण समाज के विभिन्न संगठनों, विशेषकर ब्राह्मण और क्षत्रिय सभाओं ने यूजीसी की नई गाइडलाइन की तुलना 1919 के काले कानून ‘रोलेट एक्ट’ से की है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि ये नियम बिना किसी व्यापक चर्चा के थोपे गए हैं और इनमें सामान्य वर्ग के मेधावी छात्रों के लिए अवसर सीमित कर दिए गए हैं।
राजनीतिक गलियारों में भी इसकी तपिश महसूस की जा रही है। प्रदर्शनकारी संगठनों ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार और बीजेपी को निशाने पर लेते हुए कहा है:
“सवर्ण समाज दशकों से भाजपा का अटूट वोट बैंक रहा है, लेकिन अगर इन गाइडलाइन्स को तत्काल वापस (Roll Back) नहीं लिया गया, तो आगामी चुनावों में समाज पूर्ण बहिष्कार का रास्ता अपनाएगा। आरक्षित वर्ग को साधने की राजनीति में हमारे हितों की बलि नहीं दी जा सकती।”
क्या है विवाद की जड़? (1990 बनाम 2026)
आज के माहौल की तुलना अक्सर 1990 के आरक्षण विरोधी आंदोलन से की जा रही है। हालांकि, दोनों आंदोलनों में एक बुनियादी फर्क है। 1990 का आंदोलन मंडल आयोग की सिफारिशों और नौकरियों में आरक्षण को लेकर था। वहीं, 2026 का यह विरोध यूजीसी की उन गाइडलाइन्स को लेकर है जिनमें शैक्षणिक नियुक्तियों, पीएचडी प्रवेश और प्रमोशन की प्रक्रियाओं में बदलाव के दावे किए जा रहे हैं। सवर्णों का दावा है कि इन नियमों में ‘छिपे हुए एजेंडे’ के तहत सामान्य वर्ग की सीटों को कम करने या उनके मूल्यांकन के मानकों में भेदभाव करने की कोशिश की गई है।
राजनीतिक समीकरण और सरकार की चुनौती
यूजीसी के नए नियमों ने बीजेपी के लिए एक बड़ी दुविधा पैदा कर दी है। एक तरफ सरकार सामाजिक न्याय के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहती है, तो दूसरी तरफ उसका सबसे विश्वसनीय ‘कोर वोटर’ यानी सवर्ण समाज सड़कों पर है। विपक्षी दल भी इस आग में घी डालने का काम कर रहे हैं, जिससे मामला और अधिक जटिल हो गया है।
उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में, जहां जातीय समीकरण सत्ता की चाबी होते हैं, वहां यह आंदोलन सरकार की रातों की नींद उड़ाने के लिए काफी है। ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज की मुखरता ने स्थानीय नेतृत्व को बैकफुट पर धकेल दिया है।
सुप्रीम कोर्ट से क्या है उम्मीदें?
कल यानी गुरुवार को होने वाली सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से मांग की है कि:
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यूजीसी रेगुलेशन 2026 पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए।
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नियमों की समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र न्यायिक कमेटी का गठन हो।
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यह सुनिश्चित किया जाए कि ‘मेरिट’ के साथ किसी भी स्तर पर समझौता न हो।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट इस मामले में यूजीसी और केंद्र सरकार से विस्तृत हलफनामा मांग सकता है।
क्या थम पाएगा बवाल?
जाति एक ऐसी सच्चाई है जो भारतीय समाज से ‘जाती नहीं’। यूजीसी के नए नियमों ने इसी संवेदनशील नस को फिर से दबा दिया है। क्या केंद्र सरकार सवर्णों की नाराजगी मोल लेकर इन नियमों को लागू रख पाएगी? या फिर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से कोई बीच का रास्ता निकलेगा? फिलहाल, सबकी नजरें गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर टिकी हैं। सवर्णों की चेतावनी साफ है—अगर इंसाफ नहीं मिला, तो आंदोलन और उग्र होगा।



