
कोटद्वार (पौड़ी गढ़वाल): उत्तराखंड के शांत कहे जाने वाले पौड़ी जिले का कोटद्वार शहर इन दिनों एक ऐसी वैचारिक और सांप्रदायिक जंग का केंद्र बन गया है, जिसने मानवीय संवेदनाओं और नागरिक सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। 26 जनवरी को शुरू हुआ ‘बाबा दुकान’ के नाम का विवाद अब एक गली-मोहल्ले की बहस से निकलकर राष्ट्रीय सुर्खियों में है। लेकिन इस पूरे विवाद के बीच सबसे अधिक प्रभावित वह परिवार है, जिसने नफरत के बीच इंसानियत का हाथ थामने की कोशिश की थी।
घटनाक्रम: 26 जनवरी से शुरू हुआ विवाद का सिलसिला
विवाद की शुरुआत गणतंत्र दिवस के दिन हुई, जब कोटद्वार स्थित एक पुरानी दुकान ‘बाबा शॉप’ के नाम को लेकर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई। पिछले 35 वर्षों से बिना किसी विवाद के चल रही इस दुकान पर अचानक दबाव बनाया जाने लगा कि इसका नाम बदला जाए। स्थानीय निवासी दीपक, जो पेशे से एक जिम संचालक हैं, ने जब देखा कि कुछ लोग एक बुजुर्ग दुकानदार पर मानसिक दबाव बना रहे हैं, तो वे एक जागरूक नागरिक के नाते बीच-बचाव करने पहुंचे।
दीपक का कहना है कि उन्होंने किसी धर्म या विचारधारा के खिलाफ स्टैंड नहीं लिया, बल्कि केवल एक बुजुर्ग व्यक्ति को भीड़ के कोपभाजन से बचाने का प्रयास किया। लेकिन उनका यही ‘मानवीय धर्म’ आज उनके लिए अभिशाप बन गया है।
बजरंग दल का विरोध और बढ़ता सामाजिक तनाव
31 जनवरी को इस मामले ने उस समय उग्र रूप ले लिया जब बजरंग दल से जुड़े भारी संख्या में कार्यकर्ताओं ने कोटद्वार पहुंचकर दीपक के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि दीपक ने उनके अभियान में बाधा डाली। हालांकि, शहर के बुद्धिजीवियों का मानना है कि बाहरी लोगों के हस्तक्षेप ने कोटद्वार की गंगा-जमुनी तहजीब को नुकसान पहुंचाया है।
इस नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन के बाद से शहर का माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है। स्थानीय निवासियों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि जो मुद्दा बातचीत से सुलझ सकता था, उसे शक्ति प्रदर्शन का जरिया क्यों बनाया जा रहा है?
डर के साए में बचपन: स्कूल जाना हुआ बंद
इस विवाद की सबसे दुखद तस्वीर दीपक के घर के भीतर की है। दीपक ने भरे मन से बताया कि पिछले कुछ दिनों से उनका पूरा परिवार खौफ के साए में जी रहा है। हालात इस कदर बिगड़ गए हैं कि उनकी मासूम बेटी का स्कूल जाना बंद कर दिया गया है। परिवार को अंदेशा है कि कहीं बाहर से आए तत्व किसी अनहोनी को अंजाम न दे दें।
दीपक बताते हैं, “एक नागरिक के तौर पर मैंने अपनी जिम्मेदारी निभाई थी, लेकिन अब मुझे ही अपने शहर में असुरक्षित महसूस कराया जा रहा है। मेरा जिम, जो मेरी आजीविका का एकमात्र साधन है, 26 जनवरी से बंद पड़ा था। लेकिन कब तक हार मानकर बैठता? इसलिए मंगलवार को मैंने फिर से जिम खोलने का साहस किया है।”
35 साल की विरासत और ‘नाम’ का संकट
दीपक ने तर्क दिया कि जिस दुकान के नाम से पिछले साढ़े तीन दशकों में कभी किसी को समस्या नहीं हुई, वह अचानक विवादित कैसे हो गई? उन्होंने सवाल उठाया:
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क्या ‘बाबा’ शब्द किसी विशिष्ट समुदाय की भावनाओं को आहत करता है?
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क्या इतने वर्षों तक कोटद्वार के लोगों ने इस नाम को स्वीकार नहीं किया था?
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क्या बाहरी लोग अब स्थानीय व्यापारियों का नाम तय करेंगे?
दीपक का स्पष्ट कहना है कि वे न तो डरे हैं और न ही अपने सिद्धांतों से पीछे हटेंगे। वे कोटद्वार के पुराने निवासी हैं और हमेशा सामाजिक कार्यों में अग्रणी रहे हैं, लेकिन वर्तमान स्थिति ने उन्हें प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सोचने को मजबूर कर दिया है।
प्रशासन की भूमिका और नागरिक सुरक्षा
मामला गरमाता देख स्थानीय पुलिस और प्रशासन पर भी दबाव बढ़ गया है। दीपक ने सार्वजनिक रूप से प्रशासन से मांग की है कि उनके परिवार को सुरक्षा प्रदान की जाए। यह विवाद अब महज एक दुकान के नाम का नहीं रहा, बल्कि यह एक मिसाल बन गया है कि क्या भविष्य में कोई व्यक्ति किसी की मदद करने के लिए आगे आएगा? यदि सच और इंसानियत के साथ खड़े होने की कीमत सामाजिक बहिष्कार और धमकियां हैं, तो यह समाज के पतन का संकेत है।
क्या खो रहा है कोटद्वार का सौहार्द?
कोटद्वार की यह घटना भारत के छोटे शहरों में बढ़ती असहिष्णुता की ओर इशारा करती है। जब बाहरी तत्व स्थानीय मुद्दों को हवा देते हैं, तो नुकसान केवल वहां की शांति और अर्थव्यवस्था का होता है। दीपक जैसे युवाओं का हौसला टूटना एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में कितनी तत्परता दिखाता है और क्या कोटद्वार फिर से अपनी उसी पुरानी पहचान के साथ लौट पाता है, जहाँ ‘बाबा’ जैसे नाम विवाद नहीं, बल्कि विश्वास के प्रतीक थे।



