
ओडिशा के कालाहांडी जिले से सामने आई एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। जिला मुख्यालय के नजदीक स्थित परमानंदपुर क्षेत्र में संचालित रेड क्रॉस स्कूल फॉर द ब्लाइंड, डेफ एंड म्यूट (दृष्टिहीन एवं मूक-बधिर विद्यालय) में नाबालिग बच्चों के साथ कथित तौर पर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न किए जाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं। यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल खड़े करता है, बल्कि समाज की संवेदनशीलता और संस्थागत निगरानी व्यवस्था पर भी गहरी चोट करता है।
इशारों और लिखित शिकायतों से सामने आया भयावह सच
मूक-बधिर बच्चों ने, जिनकी आवाज़ शब्दों में नहीं निकल सकती, अपने हाथों से लिखे नोट्स और संकेतों के माध्यम से उस पीड़ा को उजागर किया है, जिसे वे लंबे समय से झेलते आ रहे थे। बच्चों द्वारा प्रस्तुत की गई लिखित शिकायतों और इशारों से यह स्पष्ट हुआ कि विद्यालय के भीतर कथित तौर पर ऐसा वातावरण बना दिया गया था, जहां डर और यातना आम बात थी।
बच्चों का कहना है कि वे कई बार इस अमानवीय व्यवहार के खिलाफ बोलना चाहते थे, लेकिन संवाद की सीमाओं और भय के कारण वे चुप रहने को मजबूर थे। यह तथ्य इस मामले को और अधिक संवेदनशील बना देता है, क्योंकि पीड़ित ऐसे बच्चे हैं जो अपनी बात सामान्य तरीकों से सामने रखने में असमर्थ हैं।
वार्डन पर गंभीर आरोप, बच्चियों से छेड़छाड़ का दावा
मामले में विद्यालय के पुरुष वार्डन संध्या दर्शन महापात्रा पर सबसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतों के अनुसार, वार्डन पर नाबालिग बच्चियों को गलत नीयत से छूने और आपत्तिजनक व्यवहार करने का आरोप है। बच्चों का यह भी कहना है कि जब किसी बच्ची ने विरोध किया या डर के मारे पीछे हटने की कोशिश की, तो उसके साथ कथित तौर पर बल प्रयोग किया गया।
इतना ही नहीं, नाबालिग लड़कों ने भी खुलासा किया है कि जो भी छात्र इस कथित उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने या शिकायत करने की कोशिश करता था, उसे शारीरिक दंड और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता था। यह आरोप सामने आने के बाद मामला केवल यौन उत्पीड़न तक सीमित न रहकर एक संगठित संस्थागत उत्पीड़न की ओर इशारा करता है।
प्रशासनिक निगरानी पर उठे सवाल
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह विद्यालय जिला कलेक्टर कार्यालय से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके बावजूद, इतने लंबे समय तक इस प्रकार की कथित घटनाओं का सामने न आना प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करता है।
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते निरीक्षण और संवाद की प्रभावी व्यवस्था होती, तो इन मासूम बच्चों को इस कथित नरक से गुजरना नहीं पड़ता। यह सवाल भी उठ रहा है कि विद्यालय प्रबंधन और संबंधित विभागों द्वारा नियमित ऑडिट और बाल संरक्षण नियमों का पालन आखिर क्यों नहीं किया गया।
मामले ने पकड़ा तूल, जांच कमेटी गठित
मामला सामने आने के बाद जिला प्रशासन में हड़कंप मच गया है। जिला बाल संरक्षण अधिकारी शैलेंदु महापात्रा ने मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए बताया कि प्रशासन ने तत्काल कदम उठाए हैं। उनके अनुसार, अपर जिलाधिकारी (ADM-जनरल) की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की गई है।
उन्होंने कहा कि प्रारंभिक जांच पूरी कर ली गई है और विस्तृत रिपोर्ट जल्द ही जिला कलेक्टर को सौंपी जाएगी। प्रशासन का दावा है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
बाल संरक्षण व्यवस्था पर राष्ट्रीय बहस
यह मामला केवल एक जिले या एक विद्यालय तक सीमित नहीं है। इसने देशभर में विशेष जरूरतों वाले बच्चों की सुरक्षा और उनके लिए संचालित आवासीय संस्थानों की निगरानी व्यवस्था पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि मूक-बधिर और दिव्यांग बच्चों के संस्थानों में अतिरिक्त संवेदनशीलता, प्रशिक्षित स्टाफ और स्वतंत्र निगरानी तंत्र की आवश्यकता होती है।
बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे संस्थानों में शिकायत तंत्र को बच्चों की विशेष जरूरतों के अनुरूप बनाया जाना चाहिए, ताकि वे बिना डर अपनी बात सामने रख सकें।
कालाहांडी का यह मामला समाज और प्रशासन दोनों के लिए एक कड़ा संदेश है। जिन संस्थानों का उद्देश्य सबसे कमजोर वर्ग की सुरक्षा और देखभाल होना चाहिए, यदि वहीं कथित तौर पर उत्पीड़न हो, तो यह पूरे सिस्टम की विफलता को दर्शाता है। अब सभी की निगाहें जांच रिपोर्ट और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। देश यह देखना चाहता है कि क्या इस बार दोषियों को वास्तव में न्याय के कठघरे तक पहुंचाया जाएगा या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।



