
श्रीनगर (गढ़वाल), 21 फरवरी। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के शैक्षणिक क्रियाकलाप केंद्र में एमएमटीटीसी (मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र) के तत्वावधान में “पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा का एकीकरण” विषय पर 16 से 21 फरवरी 2026 तक आयोजित छह दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम का सफलतापूर्वक समापन हो गया।
समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में University of Delhi के प्रो. पवन सिन्हा ‘गुरूजी’ तथा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश सिंह ने दीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। एमएमटीटीसी के निदेशक प्रो. देवेंद्र सिंह नेगी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रो. पवन सिन्हा को स्मृति-चिह्न एवं अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया।
भारतीय ज्ञान परंपरा: भविष्य की दिशा
अपने संबोधन में प्रो. पवन सिन्हा ने कहा कि आत्मनिर्भरता, सस्टेनेबिलिटी और क्षमता निर्माण का वास्तविक आधार भारतीय स्वदेशी ज्ञान परंपरा में निहित है। उन्होंने क्रायोजेनिक तकनीक का उदाहरण देते हुए बताया कि स्वदेशी अनुसंधान और तकनीकी क्षमता ने भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई है। कोरोना काल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देशी अनुसंधान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने संकट से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की विशेषताओं—पुनः उपयोग, पर्यावरण संतुलन, पंचकोशीय विकास, स्त्री-स्वातंत्र्य, लोकतांत्रिक परंपराएं, कौटिल्य के राज्यशास्त्र तथा वेदांत और आधुनिक विज्ञान के अंतर्संबंध—पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह परंपरा केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की दिशा भी है। शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि चरित्र, विवेक और राष्ट्रीय चेतना का निर्माण करना है।
अकादमिक दृष्टि को मिली नई दिशा
अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश सिंह ने कार्यक्रम को विश्वविद्यालय की शैक्षणिक दृष्टि के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन पारंपरिक ज्ञान और समकालीन चिंतन के बीच सार्थक संवाद स्थापित करते हैं तथा प्राचीन भारतीय परिप्रेक्ष्य को समझने की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
कार्यक्रम में संकायाध्यक्ष प्रो. मोहन सिंह पंवार, चौरास परिसर निदेशक प्रो. राजेंद्र सिंह नेगी, अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. ओ.पी. गुसाईं और डॉ. अमरजीत परिहार ने भी अपने विचार रखे। यूजीसी पर्यवेक्षक प्रो. आर.एल. नारायण सिम्हा ने संस्कृत भाषा में अपना संबोधन देकर कार्यक्रम को विशिष्ट आयाम प्रदान किया।
अंत में डॉ. राहुल कुंवर ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम में 95 शिक्षक एवं शोधार्थियों ने सहभागिता की, जिन्हें समापन दिवस पर प्रमाणपत्र वितरित किए गए।
यह छह दिवसीय कार्यक्रम विश्वविद्यालय के लिए ज्ञान-विस्तार और शैक्षणिक समृद्धि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।




