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कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पत्नी की मायके वाली प्रॉपर्टी पर पति का कोई दावा नहीं, आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने करी कानून की नई व्याख्या की

The Hill India News
Last updated: March 31, 2026 4:57 am
The Hill India News
Published: March 31, 2026
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अमरावती: भारतीय समाज में संपत्ति और उत्तराधिकार को लेकर सदियों से चली आ रही धारणाओं पर आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने एक बड़ा प्रहार किया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि एक हिंदू महिला को उसके माता-पिता से विरासत में मिली संपत्ति पर उसके पति या ससुराल पक्ष का कोई कानूनी अधिकार नहीं होता है, विशेषकर तब जब महिला की मृत्यु बिना किसी संतान और बिना किसी वसीयत (Intestate) के हुई हो।

Contents
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(2)(a) का हवालाक्या था पूरा विवाद? (Case Background)संपत्ति का स्रोत तय करता है उत्तराधिकारसामाजिक और कानूनी प्रभावकानून और न्याय का संतुलन

जस्टिस तरलाडा राजशेखर राव की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की बारीकियों को रेखांकित किया। अदालत का यह फैसला उन हजारों मामलों के लिए एक नजीर साबित होगा जहाँ ‘पत्नी की संपत्ति मतलब पति की संपत्ति’ वाली धारणा के आधार पर कानूनी लड़ाइयां लड़ी जा रही हैं।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(2)(a) का हवाला

अदालत ने अपने फैसले का आधार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15(2)(a) को बनाया। जस्टिस राव ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून बहुत स्पष्ट है—यदि किसी महिला को उसके पिता या माता से कोई अचल संपत्ति उपहार या विरासत के रूप में मिली है और वह महिला निसंतान है, तो उसकी मृत्यु के पश्चात वह संपत्ति उसके पति या पति के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित नहीं होगी।

अदालत ने आदेश में साफ किया:

“कानून की मंशा पैतृक संपत्ति को उसी स्रोत (Source) की ओर वापस भेजने की है जहाँ से वह आई थी। यदि महिला के कोई बच्चे नहीं हैं, तो संपत्ति उसके पिता के कानूनी उत्तराधिकारियों के पास वापस चली जाएगी।”

क्या था पूरा विवाद? (Case Background)

यह कानूनी लड़ाई साल 2002 के एक घटनाक्रम से शुरू हुई थी। एक बुजुर्ग महिला ने अपनी पोती को स्नेहवश अपनी कुछ संपत्ति उपहार (Gift Deed) के रूप में दी थी। दुर्भाग्यवश, साल 2005 में उस पोती की मृत्यु हो गई। मृत पोती की कोई संतान नहीं थी और उसने अपनी मृत्यु से पहले कोई वसीयत भी नहीं छोड़ी थी।

पोती की मृत्यु के बाद, उसकी दादी ने वह संपत्ति अपनी दूसरी पोती (मृतक की बहन) के नाम पर स्थानांतरित कर दी। शुरुआत में राजस्व अधिकारियों ने इस हस्तांतरण को स्वीकार कर लिया, लेकिन विवाद तब पैदा हुआ जब मृतक पोती के पति ने इस पर आपत्ति जताई। पति का दावा था कि चूंकि संपत्ति उसकी पत्नी के नाम थी, इसलिए उसकी मृत्यु के बाद वह स्वतः ही उसका कानूनी मालिक बन गया है।

निचली अदालतों और राजस्व अधिकारियों के बीच विरोधाभासी फैसलों के बाद यह मामला हाई कोर्ट पहुँचा, जहाँ कोर्ट ने पति के दावों को सिरे से खारिज कर दिया।

संपत्ति का स्रोत तय करता है उत्तराधिकार

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में ‘संपत्ति के स्रोत’ (Source of Acquisition) को सबसे महत्वपूर्ण माना। अदालत ने समझाया कि सामान्य परिस्थितियों में धारा 15(1) के तहत महिला की संपत्ति उसके बच्चों और पति को जाती है। लेकिन, धारा 15(2) एक अपवाद (Exception) के रूप में कार्य करती है।

इस धारा के अनुसार, पैतृक संपत्ति के मामले में उत्तराधिकार का नियम बदल जाता है। पत्नी की पैतृक संपत्ति पर पति का अधिकार तभी हो सकता है जब महिला की अपनी संतान जीवित हो। यदि संतान नहीं है, तो ससुराल पक्ष का उस जमीन या मकान पर कोई दावा नहीं बचता।

सामाजिक और कानूनी प्रभाव

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला महिलाओं के आर्थिक अधिकारों और उनके मायके के परिवारों के हितों की रक्षा करता है। अक्सर देखा गया है कि विवाह के बाद महिलाओं को मिलने वाली पैतृक संपत्ति पर ससुराल पक्ष दबाव बनाने लगता है।

इस फैसले से तीन बातें पूरी तरह स्पष्ट हो गई हैं:

  1. स्त्रियों की स्वतंत्र मिल्कियत: महिला को मायके से मिली संपत्ति उसकी व्यक्तिगत संपत्ति है, जिसे वह अपनी मर्जी से इस्तेमाल कर सकती है।

  2. निसंतान होने की स्थिति: संतान न होने पर पति को ‘प्राथमिक उत्तराधिकारी’ की सूची से बाहर कर दिया गया है (सिर्फ पैतृक संपत्ति के मामले में)।

  3. ससुराल पक्ष का हस्तक्षेप: ससुराल पक्ष ऐसी किसी भी संपत्ति पर मालिकाना हक नहीं जता सकता जो महिला को उसके माता-पिता से मिली हो।

कानून और न्याय का संतुलन

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का यह निर्णय न केवल कानूनी स्पष्टता प्रदान करता है बल्कि पैतृक संपत्तियों के विखंडन को भी रोकता है। यह फैसला याद दिलाता है कि पत्नी की पैतृक संपत्ति पर पति का अधिकार पूर्ण नहीं है और कानून न्याय के तराजू पर ‘रक्त संबंधों’ और ‘संपत्ति के मूल स्रोत’ को प्राथमिकता देता है।

न्यायालय के इस रुख ने उन राजस्व अधिकारियों के लिए भी दिशा-निर्देश तय कर दिए हैं जो अक्सर उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी करते समय असमंजस में रहते हैं। अब, पैतृक संपत्ति के हस्तांतरण के समय ‘स्रोत’ की जांच करना अनिवार्य होगा।

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