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उत्तराखंड: नेहरू पर्वतारोहण संस्थान में कथित अनियमितताओं पर हाईकोर्ट सख्त, राज्य और केंद्र सरकार से मांगा जवाब

नैनीताल: उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (NIM) में वर्ष 2018 से 2022 के बीच हुई कथित अनियमितताओं को लेकर दायर जनहित याचिका पर नैनीताल हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों से विस्तृत जवाब तलब किया है। यह मामला अब प्रशासनिक पारदर्शिता और सरकारी संस्थानों की कार्यप्रणाली पर एक अहम सवाल खड़ा करता नजर आ रहा है।

सुनवाई में क्या हुआ?

गुरुवार, 9 अप्रैल को इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में हुई। इससे पहले भी अदालत ने राज्य और केंद्र सरकार सहित अन्य संबंधित पक्षों को अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए थे। हालांकि, तय समयसीमा के भीतर जवाब दाखिल नहीं किए जाने पर संबंधित पक्षों ने अदालत से अतिरिक्त समय की मांग की।

अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए पक्षकारों को शपथ पत्र (एफिडेविट) के माध्यम से जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय प्रदान किया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि मामले में देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और अगली सुनवाई में ठोस जवाब अपेक्षित होगा।

क्या हैं आरोप?

इस पूरे मामले की शुरुआत एक जनहित याचिका (PIL) से हुई, जिसे दिनेश चंद्र उनियाल ने हाईकोर्ट में दायर किया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नेहरू पर्वतारोहण संस्थान में 2018 से 2022 के बीच कई तरह की अनियमितताएं हुईं। विशेष रूप से रोजगार देने के नाम पर घोटाले और प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

याचिकाकर्ता का कहना है कि संस्थान में नियुक्तियों और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में नियमों की अनदेखी की गई और कुछ लोगों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। उन्होंने कोर्ट से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो।

सरकार का पक्ष

वहीं, राज्य और केंद्र सरकार की ओर से इन आरोपों का विरोध किया गया है। सरकार का कहना है कि इस मामले में किसी भी प्रकार की अनियमितता नहीं हुई है और सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुसार पूरी की गई हैं।

सरकारी पक्ष ने यह भी दलील दी कि इस मामले की जांच पहले ही भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा की जा चुकी है। CAG की रिपोर्ट में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या अनियमितता की पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए याचिका में लगाए गए आरोप निराधार और तथ्यहीन हैं।

सरकार ने अदालत से अनुरोध किया कि इस जनहित याचिका को खारिज कर दिया जाए, क्योंकि इसमें ठोस आधार नहीं है।

याचिकाकर्ता की आपत्तियां

हालांकि, याचिकाकर्ता ने सरकारी दलीलों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि जांच प्रक्रिया में कई खामियां हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि संस्थान के रजिस्ट्रार को इस मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया, जो कि एक महत्वपूर्ण चूक है।

उनका कहना है कि यदि जांच पूरी तरह निष्पक्ष और व्यापक होती, तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते थे। इसलिए वे स्वतंत्र एजेंसी से पुनः जांच कराने की मांग कर रहे हैं।

अदालत का रुख

हाईकोर्ट ने फिलहाल किसी भी पक्ष के दावों को अंतिम रूप से स्वीकार नहीं किया है, बल्कि दोनों पक्षों को अपना-अपना पक्ष स्पष्ट रूप से रखने का अवसर दिया है। अदालत का यह रुख दर्शाता है कि वह मामले की गहराई से जांच करना चाहती है और बिना पर्याप्त साक्ष्यों के कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहती।

कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वे याचिका में लगाए गए सभी आरोपों पर बिंदुवार जवाब पेश करें। इसके साथ ही यह भी संकेत दिया गया है कि यदि आवश्यक हुआ, तो मामले में आगे और कड़े निर्देश भी दिए जा सकते हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

नेहरू पर्वतारोहण संस्थान देश के प्रमुख पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थानों में से एक है, जहां से हजारों युवा प्रशिक्षण लेकर देश-विदेश में अपनी पहचान बना चुके हैं। ऐसे संस्थान में अनियमितताओं के आरोप लगना न केवल संस्थान की साख पर असर डालता है, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करता है।

इस मामले का असर केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी संस्थानों में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।

अब इस मामले की अगली सुनवाई में राज्य और केंद्र सरकार की ओर से दाखिल किए जाने वाले जवाब पर सबकी नजरें टिकी होंगी। अदालत के अगले कदम इस बात पर निर्भर करेंगे कि पेश किए गए जवाब कितने संतोषजनक और तथ्यात्मक हैं।

यदि अदालत को जवाब संतोषजनक नहीं लगे, तो वह स्वतंत्र जांच के आदेश भी दे सकती है। ऐसे में यह मामला और भी गंभीर रूप ले सकता है।

फिलहाल, यह स्पष्ट है कि हाईकोर्ट इस मामले को हल्के में नहीं ले रहा है और पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए पूरी सख्ती के साथ आगे बढ़ रहा है।

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