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उत्तराखंड में ‘फायर सीजन’ की दस्तक: वनाग्नि से निपटने को 20 विभागों का महाप्लान; फायर लाइन के लिए हटाए जाएंगे पेड़

The Hill India News
Last updated: February 9, 2026 3:17 am
The Hill India News
Published: February 9, 2026
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देहरादून | देवभूमि उत्तराखंड के बेशकीमती जंगलों को धधकने से बचाने के लिए सरकार और वन विभाग ने अपनी कमर कस ली है। हर साल की तरह इस बार भी 15 फरवरी से 15 जून तक की अवधि को ‘फॉरेस्ट फायर सीजन’ घोषित किया गया है। आगामी चार महीने राज्य की जैव विविधता और वन संपदा के लिए बेहद संवेदनशील रहने वाले हैं। इस बार विभाग की रणनीति न केवल बचाव की है, बल्कि सुरक्षा के लिए ‘आक्रामक’ कदम उठाने की भी है, जिसके तहत राज्यभर में 13 हजार किलोमीटर लंबी फायर लाइन (Fire Line) को सुव्यवस्थित किया जा रहा है।

Contents
फायर लाइन का सुदृढ़ीकरण: सुरक्षा बनाम पर्यावरण का सवाल?20 विभागों का साझा ‘कवच’: सामूहिक जिम्मेदारी की नई पहलतकनीक का ‘प्रहार’: ड्रोन और सैटेलाइट से होगी निगरानीग्राउंड फोर्स का मनोबल: बीमा और सुरक्षा उपकरणवनाग्नि: उत्तराखंड की एक पुरानी चुनौती

फायर लाइन का सुदृढ़ीकरण: सुरक्षा बनाम पर्यावरण का सवाल?

वनाग्नि को एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने से रोकने के लिए ‘फायर लाइन’ सबसे कारगर हथियार मानी जाती है। यह जंगल के भीतर एक ऐसी खाली पट्टी होती है जहाँ पेड़-पौधे और सूखी पत्तियां नहीं होतीं।

  • पेड़ों की छंटान: वन विभाग ने इस बार करीब 13,000 किलोमीटर क्षेत्र में फायर लाइन को दुरुस्त करने का लक्ष्य रखा है। विभाग का कहना है कि वर्षों से रखरखाव न होने के कारण कई पुरानी फायर लाइन झाड़ियों और पेड़ों से भर चुकी हैं।

  • चिन्हीकरण: फायर लाइन को चौड़ा करने के लिए बड़ी संख्या में हरे पेड़ों को चिन्हित किया गया है। विभाग के अनुसार, इन पेड़ों को हटाना ‘मजबूरी’ है ताकि आग लगने की स्थिति में उसे एक सीमित दायरे में रोका जा सके। हालांकि, विभाग ने स्पष्ट किया है कि केवल उन्हीं पेड़ों को काटा जाएगा जो सुरक्षा मानकों में बाधा डाल रहे हैं।

20 विभागों का साझा ‘कवच’: सामूहिक जिम्मेदारी की नई पहल

इस साल की तैयारियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वन विभाग अब अकेले इस मोर्चे पर नहीं है। सरकार ने ‘इंटर-डिपार्टमेंटल को-ऑर्डिनेशन’ यानी अंतर-विभागीय समन्वय का एक नया मॉडल तैयार किया है। इस अभियान से 20 से अधिक विभागों को जोड़ा गया है:

  1. आपदा प्रबंधन और पुलिस: त्वरित कार्रवाई और जनहानि रोकने के लिए।

  2. राजस्व और ग्रामीण विकास: स्थानीय ग्रामीणों के साथ तालमेल बिठाने के लिए।

  3. स्वास्थ्य और ऊर्जा: आपात स्थिति में उपचार और बिजली लाइनों से लगने वाली आग पर नियंत्रण हेतु।

इस रणनीति को परखने के लिए आगामी 13 फरवरी को राज्य स्तर पर एक ‘मगा मॉक ड्रिल’ का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें सभी विभागों की सक्रियता और प्रतिक्रिया समय (Response Time) को मापा जाएगा।

तकनीक का ‘प्रहार’: ड्रोन और सैटेलाइट से होगी निगरानी

पुरानी पद्धतियों के साथ-साथ इस बार आधुनिक तकनीक पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

  • रियल टाइम अलर्ट: भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के सैटेलाइट डेटा का उपयोग कर आग लगने के 15-20 मिनट के भीतर संबंधित फॉरेस्ट गार्ड को अलर्ट भेजा जाएगा।

  • ड्रोन सर्विलांस: संवेदनशील और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में ड्रोन के जरिए निगरानी की जाएगी ताकि समय रहते ‘धुएं’ का पता लगाया जा सके।

  • बजट की उपलब्धता: वनाग्नि प्रबंधन के लिए इस बार धन की कमी आड़े नहीं आएगी। राज्य सरकार ने आपदा मद और विभागीय बजट से सभी डिवीजनों को उनकी मांग के अनुरूप अग्रिम धनराशि जारी कर दी है।

[Image showing satellite thermal imaging for forest fire detection]

ग्राउंड फोर्स का मनोबल: बीमा और सुरक्षा उपकरण

जंगल की आग से सीधे जूझने वाले फील्ड स्टाफ के लिए इस बार विशेष प्रावधान किए गए हैं।

  • बीमा कवच: खतरनाक परिस्थितियों में काम करने वाले कर्मियों को स्वास्थ्य और जीवन बीमा का लाभ दिया जा रहा है।

  • सुरक्षा किट: कर्मचारियों को फायर रेजिस्टेंट सूट, आधुनिक रेक-हो (Rake-hoe) और अन्य सुरक्षा उपकरणों से लैस किया जा रहा है।

  • अस्थायी भर्ती: सीजन के दौरान संवेदनशील ‘क्रिटिकल स्पॉट्स’ पर अतिरिक्त फायर वाचर तैनात किए जा रहे हैं।

वनाग्नि: उत्तराखंड की एक पुरानी चुनौती

उत्तराखंड में लाखों हेक्टेयर वन क्षेत्र हर साल आग की चपेट में आता है। चीड़ के जंगलों में गिरने वाली सूखी पत्तियां (पिरुल) ईंधन का काम करती हैं, जो तेज हवाओं के साथ मिलकर विकराल रूप धारण कर लेती हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी उत्तराखंड के जंगलों की आग चिंता का विषय रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार विभाग की ‘आक्रामक’ तैयारी और जनसहभागिता ही इस संकट को कम कर सकती है।

15 फरवरी से शुरू हो रहा यह अग्नि-इम्तिहान न केवल वन विभाग बल्कि पूरे प्रशासन के लिए एक चुनौती है। जहाँ एक ओर फायर लाइन बनाने के लिए पेड़ों की कटाई पर कुछ सवाल उठ सकते हैं, वहीं दूसरी ओर लाखों हेक्टेयर वन को राख होने से बचाने के लिए विभाग इसे अनिवार्य कदम बता रहा है। 13 फरवरी की मॉक ड्रिल यह स्पष्ट कर देगी कि उत्तराखंड इस बार वनाग्नि से लड़ने के लिए कितना तैयार है।

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