
नोएडा। उत्तर प्रदेश का हाईटेक शहर नोएडा एक बार फिर साइबर अपराधियों की शरणस्थली के रूप में सुर्खियों में है। नोएडा की साइबर क्राइम पुलिस ने एक बड़ी सफलता हासिल करते हुए सेक्टर-16 स्थित एक फर्जी कॉल सेंटर का भंडाफोड़ किया है। यह गिरोह बेहद शातिराना तरीके से सात समंदर पार बैठे विदेशी नागरिकों को अपना शिकार बना रहा था। पुलिस ने मौके से गिरोह के मास्टरमाइंड सहित कुल 16 आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
पकड़े गए आरोपियों के पास से जो साजो-सामान बरामद हुआ है, वह किसी बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी जैसा प्रतीत होता है, लेकिन इसकी आड़ में काले कारनामे अंजाम दिए जा रहे थे। पुलिस ने मौके से 4 अत्याधुनिक लैपटॉप, 15 डेस्कटॉप, 15 मॉनिटर, 16 मोबाइल फोन, कई हाई-क्वालिटी माइक-हेडफोन, राउटर और मॉडम बरामद किए हैं।
विदेशी सरजमीं और नोएडा का कनेक्शन: कैसे बिछाया जाता था जाल?
नोएडा साइबर क्राइम पुलिस कार्रवाई के दौरान पूछताछ में जो खुलासे हुए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। यह गिरोह केवल उन लोगों को निशाना बनाता था जो भारत से बाहर, विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय देशों में रहते थे। ठगी की शुरुआत इंटरनेट और सोशल मीडिया पर चलने वाले ‘पेड विज्ञापनों’ (Paid Ads) से होती थी।
आरोपी Google और Facebook जैसे प्लेटफॉर्म्स पर आकर्षक विज्ञापन चलाते थे, जिनमें ‘एंटी-वायरस सपोर्ट’ या ‘सिस्टम सिक्योरिटी’ का झांसा दिया जाता था। इन विज्ञापनों में एक टोल-फ्री नंबर दिया जाता था। जैसे ही कोई विदेशी नागरिक सहायता के लिए इस नंबर पर डायल करता, कॉल सीधे नोएडा के इस फर्जी कॉल सेंटर के ‘कॉलिंग सॉफ्टवेयर’ पर लैंड होती थी।
डराने का मनोविज्ञान: ‘स्क्रीन ब्लैक’ कर ऐंठते थे डॉलर
जैसे ही पीड़ित की कॉल कनेक्ट होती, गिरोह के सदस्य खुद को नामी कंपनियों के ‘टेक्निकल सपोर्ट एजेंट’ के रूप में पेश करते थे। वे पीड़ित को डराते थे कि उनका कंप्यूटर या मोबाइल गंभीर रूप से हैक हो गया है या उनके सिस्टम में ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी’ जैसे अवैध कंटेंट पाए गए हैं।
पीड़ित को घबराहट में डालने के बाद, आरोपी ‘एनीडेस्क’ (AnyDesk) या ‘टीमव्यूअर’ (TeamViewer) जैसे स्क्रीन शेयरिंग सॉफ्टवेयर के जरिए सिस्टम का एक्सेस ले लेते थे। लोगों को पूरी तरह अपने जाल में फंसाने के लिए ये शातिर अपराधी रिमोट एक्सेस के जरिए पीड़ित के कंप्यूटर की स्क्रीन को ‘ब्लैक’ (काला) कर देते थे। जब पीड़ित को लगता कि उसका कीमती डेटा और सिस्टम पूरी तरह ब्लॉक हो गया है, तो वह आरोपियों की हर शर्त मानने को तैयार हो जाता था।
टियर-बेस्ड ठगी: बैलेंस देखकर तय होता था ‘रेट’
जांच में सामने आया है कि इस गैंग ने ठगी का एक कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर तैयार कर रखा था। जैसे ही उन्हें पीड़ित के सिस्टम का एक्सेस मिलता, वे सबसे पहले उसके बैंक अकाउंट का बैलेंस चेक करते थे।
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छोटा बैलेंस: यदि पीड़ित के खाते में कम पैसे होते, तो जूनियर कॉलर 100 से 500 डॉलर तक की मांग कर मामला निपटा देते थे।
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बड़ा बैलेंस: यदि खाते में भारी रकम होती, तो कॉल को तुरंत ‘सीनियर क्लोजर’ या टीम लीडर के पास ट्रांसफर कर दिया जाता था। ये सीनियर अपराधी हजारों डॉलर की डिमांड करते थे।
क्रिप्टोकरेंसी और हवाला: करोड़ों का काला खेल
साइबर पुलिस के अनुसार, इस गैंग का मनी ट्रेल बेहद पेचीदा है। विदेशी नागरिकों से ठगी गई रकम सीधे बैंक खातों में नहीं ली जाती थी। आरोपी पीड़ितों से गिफ्ट कार्ड (Apple, Amazon, Google Play) या सीधे क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से भुगतान लेते थे। इसके बाद इस डिजिटल करेंसी को ‘हवाला नेटवर्क’ के जरिए भारतीय रुपयों में बदला जाता था।
शुरुआती जांच में ही पुलिस को आरोपियों के पास से करोड़ों रुपये के संदिग्ध लेन-देन के सबूत मिले हैं। पुलिस अब उन बैंक खातों और क्रिप्टो वॉलेट्स को फ्रीज करने की प्रक्रिया में है, जिनका इस्तेमाल इस अवैध धंधे में किया जा रहा था।
नोएडा पुलिस की सतर्कता और भविष्य की चुनौतियां
नोएडा में फर्जी कॉल सेंटरों का मिलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन सेक्टर-16 जैसे प्रमुख व्यवसायिक केंद्र में इस तरह के गिरोह का सक्रिय होना सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल भी खड़े करता है। हालांकि, नोएडा पुलिस की इस त्वरित और सटीक कार्रवाई ने साइबर अपराधियों के मनोबल को बड़ा झटका दिया है।
डीसीपी (साइबर क्राइम) ने बताया कि पकड़े गए आरोपियों से गहन पूछताछ की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस नेटवर्क के तार और कहाँ-कहाँ जुड़े हैं। पुलिस को शक है कि इस गैंग के कुछ सदस्य विदेश में भी बैठे हो सकते हैं जो डेटा और तकनीकी बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने में मदद करते थे।
नोएडा साइबर क्राइम पुलिस कार्रवाई ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि तकनीक का दुरुपयोग करने वाले चाहे कितने ही शातिर क्यों न हों, कानून के हाथ उन तक पहुँच ही जाते हैं। नागरिकों को सलाह दी जाती है कि इंटरनेट पर मिलने वाले किसी भी संदिग्ध टोल-फ्री नंबर या अनचाहे तकनीकी सहायता के विज्ञापनों पर भरोसा न करें। यह मामला न केवल ठगी का है, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को धूमिल करने का एक प्रयास भी है, जिसे पुलिस ने सफलतापूर्वक विफल कर दिया है।



