
ऋषिकेश/देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के जिलाधिकारी सविन बंसल ने बुधवार को ऋषिकेश स्थित सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में औचक निरीक्षण कर भ्रष्टाचार के एक बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है। निरीक्षण के दौरान दफ्तर में जो मंजर दिखा, उसने सरकारी कार्यप्रणाली की धज्जियां उड़ाकर रख दीं। कहीं बिना अधिकारी के क्लर्क रजिस्ट्री कर रहे थे, तो कहीं ‘घोस्ट कार्मिक’ सरकारी फाइलों से खेल रहे थे। करोड़ों रुपये की स्टाम्प चोरी और जनता के मूल दस्तावेजों को अलमारियों में धूल चटाने के मामले सामने आने के बाद डीएम ने कंप्यूटर और रिकॉर्ड जब्त कर कड़े एक्शन के निर्देश दिए हैं।
बिना रजिस्ट्रार के ‘लिपिक’ बने हाकिम: अवैधानिक रजिस्ट्री का खेल
निरीक्षण के दौरान सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि कार्यालय में सब-रजिस्ट्रार मौजूद ही नहीं थे। बताया गया कि वे देहरादून में किसी बैठक में हैं, लेकिन उनकी अनुपस्थिति में नियमों को ताक पर रखकर एक लिपिक (क्लर्क) द्वारा विलेखों का निबंधन (रजिस्ट्री) किया जा रहा था। जिलाधिकारी ने जब लिपिक से संपत्ति मूल्य आकलन (Section 47-A) और स्टाम्प शुल्क के निर्धारण पर सवाल किए, तो वह बगलें झांकने लगा।
क्रोधित जिलाधिकारी ने मौके पर ही फटकार लगाते हुए कहा, “जब आपको संपत्ति मूल्यांकन का ज्ञान नहीं है, तो किसके आदेश पर आप निबंधक के अधिकारों का प्रयोग कर रहे हैं? यह सीधे तौर पर आपराधिक कृत्य है।”
करोड़ों की स्टाम्प चोरी: औद्योगिक भूखंडों को आवासीय बताकर काटा
निरीक्षण के दौरान स्टाम्प चोरी का एक बड़ा पैटर्न सामने आया है। जिलाधिकारी ने कई ऐसी रजिस्ट्री बरामद की हैं जिनमें औद्योगिक क्षेत्रों की कीमती भूमि को आवासीय दरों पर भूखंड के छोटे-छोटे टुकड़े कर बेचा गया था। इससे सरकारी राजस्व को करोड़ों रुपये का चूना लगने की प्रबल संभावना है। डीएम ने इस पर तत्काल विस्तृत आख्या (Report) तलब की है और तहसील प्रशासन को रिकॉर्ड खंगालने के निर्देश दिए हैं।
‘घोस्ट कार्मिकों’ का आतंक और धूल खाते मूल अभिलेख
सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में अव्यवस्था का आलम यह था कि वहां ऐसे व्यक्ति भी काम करते मिले जिनका विभाग में कोई आधिकारिक वजूद ही नहीं था। डीएम ने एक ऐसे ‘घोस्ट कार्मिक’ को पकड़ा जिसका न तो कोई नियुक्ति पत्र था और न ही उपस्थिति पंजिका में नाम। जिलाधिकारी ने तत्काल सभी कार्मिकों का सर्विस रिकॉर्ड तलब कर लिया है।
इसके अलावा, कार्यालय की अलमारियों में सैकड़ों मूल विलेख (Original Documents) धूल खाते पाए गए। नियमानुसार रजिस्ट्री के अधिकतम तीन दिन के भीतर मूल दस्तावेज आवेदक को लौटा देने चाहिए, लेकिन यहां महीनों और वर्षों से दस्तावेज दबाकर रखे गए थे। जिलाधिकारी ने इस पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए सभी लंबित दस्तावेजों और कंप्यूटरों को जब्त कर तहसील प्रशासन के सुपुर्द कर दिया।
फरियादियों की आपबीती: 24 घंटे का काम महीनों में भी नहीं
निरीक्षण के दौरान वहां मौजूद फरियादियों ने डीएम सविन बंसल को घेर लिया और अपनी पीड़ा सुनाई। पीड़ितों का आरोप था कि रजिस्ट्री की नकल (Certified Copy) देने के नाम पर उन्हें महीनों तक दौड़ाया जाता है।
-
नियम: अर्जेंट रजिस्ट्री नकल 24 घंटे के भीतर मिलनी चाहिए।
-
हकीकत: निरीक्षण में पाया गया कि महीनों और सालों से नकल के आवेदन लंबित हैं।
-
वसूली का संदेह: आम जनता को परेशान कर अनुचित लाभ लेने की प्रक्रियात्मक त्रुटियां स्पष्ट रूप से दिखाई दीं।
समय की बर्बादी और डेटाबेस में हेराफेरी
जिलाधिकारी ने पाया कि कार्यालय सुबह 9:30 बजे खुल जाता है, लेकिन पहली रजिस्ट्री सुबह 11:15 बजे की गई। इस विलंब का कोई तार्किक कारण कर्मचारी नहीं बता सके। साथ ही, कार्यालय में पुराना डेटाबेस संचालित पाया गया, जिससे डेटा मैन्युपुलेशन और कूटरचित विलेख (Forged Documents) तैयार करने की आशंका बढ़ गई है।
जिलाधिकारी का कड़ा रुख: “दोषियों के विरुद्ध होगी आपराधिक कार्यवाही”
निरीक्षण के बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए जिलाधिकारी सविन बंसल ने कहा:
“जनहित के कार्यों में लापरवाही और नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं होगी। ऋषिकेश सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में जो अनियमितताएं मिली हैं, वे अत्यंत गंभीर श्रेणी की हैं। हमने कंप्यूटर और रिकॉर्ड जब्त कर लिए हैं। संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा गया है और दोषी पाए जाने वाले प्रत्येक कार्मिक के विरुद्ध कठोर दंडात्मक व आपराधिक कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी।”
निरीक्षण के दौरान उप जिलाधिकारी (SDM) ऋषिकेश योगेश मेहर और तहसीलदार चमन सिंह समेत अन्य प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद रहे। इस औचक कार्रवाई से पूरे निबंधन विभाग में हड़कंप मचा हुआ है।



