
मध्य पूर्व एक बार फिर भीषण युद्ध की आग में झुलस रहा है। ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच जारी संघर्ष ने 31 मार्च 2026 तक एक बेहद खतरनाक मोड़ ले लिया है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि दुनिया भर में चिंता बढ़ गई है और वैश्विक स्तर पर इसके व्यापक प्रभाव देखने को मिल रहे हैं।
इस जंग की शुरुआत 28 फरवरी 2026 को ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत हुई, जब अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के कई प्रमुख शहरों, खासकर तेहरान, पर 900 से ज्यादा हवाई हमले किए। इन हमलों में भारी तबाही हुई और ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई समेत कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की मौत की खबर ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। यह हमला इस पूरे संघर्ष का निर्णायक और सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
हमलों के तुरंत बाद ईरान ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए इजराइल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर सैकड़ों बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन दागे। इस जवाबी कार्रवाई से पूरे क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंच गया। मार्च का पूरा महीना लगातार हवाई हमलों, मिसाइल हमलों और समुद्री तनाव के बीच गुजरा, जिससे आम नागरिकों की जिंदगी पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई।
स्थिति को और गंभीर बनाते हुए ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद अहम होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर गहरा असर पड़ा। इस कदम के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया। लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए और मानवीय संकट तेजी से गहराने लगा।
31 मार्च 2026 तक हालात और बिगड़ चुके हैं। अमेरिका ने करीब 50 हजार सैनिकों की तैनाती के साथ ईरान की जमीनी घेराबंदी पूरी कर ली है। इस कदम को युद्ध के अगले और अधिक विनाशकारी चरण की शुरुआत माना जा रहा है। वहीं इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दावा किया है कि युद्ध अपने आधे से ज्यादा लक्ष्य हासिल कर चुका है और आगे की कार्रवाई और भी तेज होगी।
इस बीच डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सख्त चेतावनी दी है कि अगर वह जल्द ही अमेरिका की शर्तों पर समझौता नहीं करता और होर्मुज मार्ग को नहीं खोलता, तो अमेरिका ईरान के नागरिक बुनियादी ढांचे—जैसे बिजली और पानी की आपूर्ति—को निशाना बना सकता है। ट्रंप के इस बयान ने हालात को और विस्फोटक बना दिया है।
उधर ईरान ने भी साफ शब्दों में कहा है कि किसी भी हवाई हमले का जवाब पहले से ज्यादा ताकत से दिया जाएगा। हाल ही में दुबई पोर्ट के पास एक कुवैती तेल टैंकर पर हमले की खबर ने समुद्री सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं। इससे तेल रिसाव और पर्यावरणीय संकट का खतरा भी बढ़ गया है।
लगातार बढ़ते हमलों, भारी जनहानि और बुनियादी ढांचे के विनाश के बावजूद फिलहाल शांति की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार अपील कर रहा है, लेकिन दोनों पक्षों के आक्रामक रुख के चलते हालात काबू से बाहर होते जा रहे हैं। यदि जल्द ही कूटनीतिक समाधान नहीं निकला, तो यह संघर्ष पूरे विश्व को एक बड़े संकट में धकेल सकता है।



