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कल से आरंभ होगा ‘लोक एवं आस्था’ का महापर्व छठ : श्रद्धा, परंपरा और अनुशासन का अद्भुत संगम

The Hill India News
Last updated: October 24, 2025 2:15 pm
The Hill India News
Published: October 24, 2025
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पटना/वाराणसी, 24 अक्टूबर: लोक आस्था और सूर्योपासना का महापर्व छठ पूजा कल से विधिवत आरंभ हो रहा है। यह पर्व न केवल भारत के उत्तर और पूर्वी हिस्सों में बल्कि देश-विदेश के प्रवासी समाज में भी पूरे श्रद्धा, भक्ति और अनुशासन के साथ मनाया जाएगा।

Contents
चार दिनों तक चलता है यह महान पर्वअर्घ्य का शुभ मुहूर्तसूर्योपासना का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्वमहिलाओं की अगुवाई वाला सबसे अनुशासित पर्वघरों और घाटों पर तैयारियाँ चरम परछठ गीतों और लोक-संस्कृति की छटाविश्वभर में छठ की धूमआस्था और स्वच्छता का संतुलनसमापन विचार

चार दिवसीय यह पर्व नहाय-खाय से प्रारंभ होकर उषा अर्घ्य के साथ पूर्ण होता है। मान्यता है कि छठी मइया की उपासना से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं और संतान सुख, स्वास्थ्य, समृद्धि तथा परिवार की रक्षा का आशीर्वाद देते हैं।


चार दिनों तक चलता है यह महान पर्व

पहला दिन (25 अक्टूबर – नहाय-खाय):
महापर्व का आरंभ नहाय-खाय से होगा। श्रद्धालु प्रातःकाल पवित्र नदियों, तालाबों या जलाशयों में स्नान कर शुद्धता का संकल्प लेंगे। इसके बाद घर में शुद्ध भोजन (आमतौर पर चने की दाल, कद्दू की सब्जी और अरवा चावल) ग्रहण किया जाएगा। यह भोजन ही दूसरे दिन उपवासियों के लिए प्रारंभिक शुद्धता का प्रतीक होता है।

दूसरा दिन (26 अक्टूबर – खरना या लोहंडा):
दूसरे दिन छठ व्रतधारी पूरे दिन निराहार रहते हैं और संध्या के समय गंगा, यमुना या अन्य पवित्र नदी में स्नान के बाद गुड़ और दूध से बनी खीर, रोटी और फल का प्रसाद तैयार करते हैं। इसे ही “खरना प्रसाद” कहा जाता है। प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रती लगातार 36 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं।

तीसरा दिन (27 अक्टूबर – संध्या अर्घ्य):
यह दिन सबसे प्रमुख माना जाता है। व्रती संध्या के समय सूर्यास्त के ठीक पहले जलाशयों के तट पर पहुंचकर सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करती हैं। पारंपरिक गीतों, लोक वाद्यों और श्रद्धा से भरे माहौल में महिलाएँ ‘छठ मइया’ की आराधना करती हैं। परिवारजन, रिश्तेदार और श्रद्धालु मिलकर इस पवित्र क्षण के साक्षी बनते हैं।

चौथा दिन (28 अक्टूबर – उषा अर्घ्य):
पर्व का समापन प्रातःकालीन अर्घ्य से होता है। इस दिन व्रती सूर्योदय के समय उदित होते सूर्य को दूध, जल और फल अर्पित करती हैं। इसके बाद व्रत का पारण किया जाता है। इस अवसर पर घरों में प्रसाद का वितरण होता है और सभी एक-दूसरे को छठ की शुभकामनाएं देते हैं।


अर्घ्य का शुभ मुहूर्त

पंडितों के अनुसार, इस वर्ष संध्या अर्घ्य 27 अक्टूबर को शाम 5:32 बजे से 5:47 बजे तक अर्पित किया जाएगा, जबकि उषा अर्घ्य 28 अक्टूबर की सुबह 6:15 बजे से 6:25 बजे के बीच दिया जाएगा।
ज्योतिषाचार्य पंडित अरविंद मिश्र का कहना है कि इस बार ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति अत्यंत शुभ है — सूर्य तुला राशि में और चंद्रमा कर्क राशि में रहेगा, जो पारिवारिक सुख और आरोग्य का प्रतीक है।


सूर्योपासना का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व

छठ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, सूर्य और जल की सामूहिक पूजा है। वैज्ञानिक दृष्टि से सूर्य की आराधना शरीर को विटामिन ‘डी’ प्रदान करती है और मानसिक शांति देती है।
आध्यात्मिक रूप से यह पर्व आत्मसंयम, तप और पवित्रता का प्रतीक है। व्रती 36 घंटे तक बिना जल और भोजन ग्रहण किए आत्मनियंत्रण का अभ्यास करती हैं, जो मनुष्य के भीतर अद्भुत ऊर्जा और विश्वास भरता है।


महिलाओं की अगुवाई वाला सबसे अनुशासित पर्व

छठ पूजा की सबसे विशेष बात यह है कि इसमें किसी पुरोहित या पंडित की आवश्यकता नहीं होती। व्रतधारी महिलाएँ स्वयं पूरे विधि-विधान का पालन करती हैं।
पूरे पर्व में शुद्धता, मौन, अनुशासन और भक्ति का समन्वय देखने को मिलता है।
नदियों और घाटों पर सामूहिक रूप से लोग एकत्र होकर सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं — यह समाज में एकता और समरसता का प्रतीक है।


घरों और घाटों पर तैयारियाँ चरम पर

देहरादून, हरिद्वार, पटना, भागलपुर, बनारस, दिल्ली और मुंबई समेत देशभर के शहरों में छठ घाटों की सजावट और सफाई का काम अंतिम चरण में है।
प्रशासन ने घाटों पर रोशनी, सुरक्षा और जल की स्वच्छता के विशेष इंतजाम किए हैं।
हरिद्वार में गंगा तटों पर अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई है, जबकि पटना में कलेक्टर ऑफिस द्वारा 200 से अधिक घाटों पर निगरानी टीमों की ड्यूटी लगाई गई है।

नगर निगम के अधिकारी अमित कुमार सिंह ने बताया कि घाटों पर पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए प्लास्टिक-मुक्त क्षेत्र घोषित किया गया है। लोगों से अपील की गई है कि वे पूजा सामग्री नदी में न प्रवाहित करें और घर पर ही जैविक तरीके से विसर्जन करें।


छठ गीतों और लोक-संस्कृति की छटा

छठ पूजा के दौरान बजने वाले पारंपरिक गीत — “केलवा के पात पर उगेलन सूरज देव”, “छठी मइया हो, आइल दिनवा बड़ा सुख के” — आस्था का अद्भुत वातावरण बनाते हैं।
लोकगायक और महिलाएँ घाटों पर रातभर छठ गीत गाती हैं। यह पर्व बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों की लोक-संस्कृति का जीवंत प्रतीक है।


विश्वभर में छठ की धूम

आज छठ पूजा भारत की सीमाओं से परे भी मनाई जाती है। अमेरिका, ब्रिटेन, मॉरीशस, नेपाल, सिंगापुर और यूएई में बसे भारतीय समुदाय ने भी इस पर्व की तैयारियाँ पूरी कर ली हैं।
लंदन के थेम्स नदी किनारे और दुबई के अल-क़ुसैस पार्क में विशेष घाट बनाए गए हैं। विदेशों में रहने वाले भारतीय परिवार इसे अपनी जड़ों और संस्कृति से जुड़ाव का पर्व मानते हैं।


आस्था और स्वच्छता का संतुलन

छठ पूजा जहां सूर्योपासना का प्रतीक है, वहीं यह स्वच्छता, अनुशासन और पर्यावरण संतुलन का संदेश भी देती है। हर साल लाखों श्रद्धालु बिना किसी भव्य आयोजन या व्यय के इस पर्व को पूरी सादगी और संयम के साथ मनाते हैं।


समापन विचार

छठ केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यह संस्कार, अनुशासन और लोकविश्वास की जीवंत परंपरा है। यह पर्व सिखाता है कि प्रकृति की आराधना, पारिवारिक एकता और नारी-शक्ति के सम्मान से ही समाज का संतुलन कायम रह सकता है।
कल से आरंभ हो रहे इस महापर्व की आभा एक बार फिर घाटों से लेकर घरों तक फैलेगी — हर दीपक, हर गीत और हर अर्घ्य के साथ यह संदेश देगा कि आस्था कभी मुरझाती नहीं, वह पीढ़ियों तक प्रकाश फैलाती है।

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