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बजट 2026-27: पान मसाला पर लगा ‘स्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर’, सरकारी खजाने में आएंगे ₹14,000 करोड़

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपनी राजकोषीय रणनीति को स्पष्ट करते हुए पान मसाला विनिर्माण पर एक नया ‘स्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर’ (Health and National Security Cess) प्रभावी कर दिया है। 1 फरवरी 2026 से लागू हुए इस उपकर से सरकार को न केवल राजस्व वृद्धि की उम्मीद है, बल्कि इसके जरिए स्वास्थ्य और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए एक स्थायी फंड बनाने की योजना है। सरकारी अनुमानों के मुताबिक, केवल इस उपकर से वित्त वर्ष 2026-27 में लगभग 14,000 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होगा।

क्या है नया टैक्स ढांचा और गणना का आधार?

पान मसाला पर लगने वाला यह नया उपकर मौजूदा 40 प्रतिशत वस्तु एवं सेवा कर (GST) के अतिरिक्त होगा। इस टैक्स की सबसे खास बात इसकी गणना की पद्धति है। सरकार ने इसे खुदरा बिक्री के बजाय विनिर्माण इकाइयों की ‘उत्पादन क्षमता’ (Production Capacity) के आधार पर वसूलने का निर्णय लिया है।

अक्सर यह देखा गया है कि पान मसाला उद्योग में टैक्स चोरी एक बड़ी चुनौती रही है। उत्पादन क्षमता आधारित कर लगाने से विनिर्माताओं के लिए वास्तविक उत्पादन छिपाना कठिन होगा। बजट दस्तावेजों के अनुसार, 40 प्रतिशत जीएसटी और इस नए उपकर को मिलाकर पान मसाले पर कुल प्रभावी टैक्स भार अब 88 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा।

राजस्व का अनुमान: चालू और आगामी वित्त वर्ष

बजट 2026-27 के दस्तावेजों के अनुसार, सरकार ने इस उपकर से मिलने वाली आय का रोडमैप तैयार कर लिया है:

  • फरवरी-मार्च 2026 (चालू वित्त वर्ष): शेष दो महीनों में सरकार को 2,330 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है।

  • वित्त वर्ष 2026-27: पूरे साल के दौरान सरकार का लक्ष्य 14,000 करोड़ रुपये जुटाने का है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम राजकोषीय घाटे को कम करने और सामाजिक कल्याण की योजनाओं को वित्तीय मजबूती देने में सहायक सिद्ध होगा।

कहां खर्च होगा सेस से मिलने वाला पैसा?

आम जनता के मन में यह सवाल अक्सर रहता है कि सेस के रूप में वसूला गया अतिरिक्त पैसा आखिर जाता कहां है? वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दिसंबर 2025 में संसद में स्पष्ट किया था कि इस उपकर का उद्देश्य राष्ट्रीय महत्व के दो प्रमुख क्षेत्रों—स्वास्थ्य (Health) और राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security)—के लिए एक “समर्पित और अनुमानित संसाधन प्रवाह” सुनिश्चित करना है।

यह पैसा राज्यों के साथ साझा किया जाएगा। इसका उपयोग मुख्य रूप से:

  1. स्वास्थ्य जागरूकता: तंबाकू और पान मसाला के दुष्प्रभावों के प्रति जनता को जागरूक करने में।

  2. स्वास्थ्य अवसंरचना: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में नई स्वास्थ्य योजनाओं और गतिविधियों के संचालन में।

  3. राष्ट्रीय सुरक्षा: रक्षा बजट को अतिरिक्त वित्तीय सहायता प्रदान करने में किया जाएगा।

GST काउंसिल का ऐतिहासिक निर्णय और लोन का भुगतान

इस नए टैक्स तंत्र की नींव सितंबर 2025 में आयोजित जीएसटी काउंसिल की बैठक में रखी गई थी। काउंसिल, जिसमें केंद्र और राज्यों के वित्त मंत्री शामिल हैं, ने एक दूरगामी निर्णय लिया था।

दरअसल, कोरोना महामारी के दौरान राज्यों को हुए राजस्व नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र सरकार ने भारी कर्ज लिया था, जिसे चुकाने के लिए ‘कंपनसेशन सेस’ (मुआवजा उपकर) लगाया गया था। 31 जनवरी 2026 तक इस मद में लिया गया 2.69 लाख करोड़ रुपये का कर्ज पूरी तरह चुका दिया गया है।

कर्ज खत्म होने के बाद, जीएसटी काउंसिल ने यह तय किया कि विलासिता और अहितकर वस्तुओं (Sin Goods) पर अब कंपनसेशन सेस के बजाय ‘हेल्थ एंड नेशनल सिक्योरिटी सेस’ और एक्साइज ड्यूटी जैसे तंत्र विकसित किए जाएंगे। दिसंबर 2025 में संसद ने पान मसाला पर सेस और तंबाकू पर एक्साइज ड्यूटी लगाने के प्रस्ताव को अपनी अंतिम मंजूरी दे दी थी।

उद्योग और उपभोक्ता पर प्रभाव

टैक्स भार बढ़कर 88 प्रतिशत होने के कारण आने वाले दिनों में पान मसाला की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी होना तय है। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि जहां सरकार इसे राजस्व और स्वास्थ्य के नजरिए से देख रही है, वहीं विनिर्माताओं के लिए उत्पादन क्षमता आधारित कर का अनुपालन करना एक नई प्रशासनिक चुनौती हो सकती है।

हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है। उनका मानना है कि करों में वृद्धि से ऐसी हानिकारक वस्तुओं की खपत में कमी आएगी, जिसका सीधा लाभ सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ेगा।

संतुलित वित्तीय प्रबंधन की ओर कदम

‘स्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर’ के माध्यम से सरकार ने एक ‘विन-विन’ स्थिति पैदा करने की कोशिश की है। एक ओर जहां राज्यों को विकास कार्यों के लिए निश्चित संसाधन मिलेंगे, वहीं दूसरी ओर तंबाकू जनित उत्पादों पर नियंत्रण का संदेश भी जाएगा। यह स्पष्ट है कि 2026-27 का यह वित्तीय वर्ष भारत की कराधान प्रणाली में एक नए युग की शुरुआत है, जहां ‘कंपनसेशन सेस’ की जगह अब ‘वेलफेयर और नेशनल सिक्योरिटी’ ने ले ली है।

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