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बॉम्बे हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘विदेश में नियम मानने वाले भारतीय अपने देश में क्यों भूल जाते हैं सिविक सेंस?’

मुंबई। भारत में सड़क दुर्घटनाएं और ट्रैफिक नियमों की अनदेखी एक लाइलाज बीमारी बनती जा रही है। इस गंभीर विषय पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को एक ऐसी टिप्पणी की है, जो न केवल कानूनी हलकों में बल्कि आम जनता के बीच भी आत्ममंथन का विषय बन गई है। एक सड़क दुर्घटना मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जितेंद्र जैन की एकल पीठ ने देशवासियों को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि अब वह समय आ गया है जब भारतीयों को ‘सिविक सेंस’ (नागरिक बोध) विकसित करना होगा और विकसित देशों से सीखना होगा कि सड़क पर गाड़ी कैसे चलाई जाती है और पैदल कैसे चला जाता है।

अदालत की यह तल्ख टिप्पणी उस विरोधाभासी व्यवहार पर आधारित थी, जिसे अक्सर भारतीय नागरिकों में देखा जाता है—”जब हम सात समंदर पार किसी विकसित देश में होते हैं, तो वहां के सख्त नियमों के आगे नतमस्तक रहते हैं, लेकिन अपने ही देश की सड़कों पर आते ही हम नियमों को तोड़ना अपना अधिकार समझ लेते हैं।”

‘बिना दबाव के विकसित हो नागरिक बोध’

जस्टिस जितेंद्र जैन ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अनुशासन किसी दबाव या जुर्माने के डर से नहीं, बल्कि भीतर से आना चाहिए। उन्होंने कहा, मेरे विचार में अब समय आ गया है कि इस देश के लोग अपने अंदर सिविक सेंस विकसित करें, जिसे हमें बिना किसी दबाव के खुद ही अपनाना चाहिए।” अदालत ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि भारतीयों के पास नियमों का पालन न करने के लिए हमेशा कोई न कोई ‘बहाना’ तैयार रहता है। कोर्ट ने माता-पिता और बड़ों को भी उनके नैतिक कर्तव्यों की याद दिलाई। आदेश में कहा गया कि यदि बड़े ही नियमों की धज्जियां उड़ाएंगे, तो बच्चे उनसे अनुशासन नहीं, बल्कि नियम तोड़ना सीखेंगे। यह समाज की आने वाली पीढ़ी के लिए एक खतरनाक संकेत है।

टू-वीलर और सिग्नल जंपिंग: एक जानलेवा आदत

अदालत ने सड़क पर होने वाली अव्यवस्था के लिए विशेष रूप से दोपहिया वाहन चालकों के व्यवहार को रेखांकित किया। अक्सर देखा जाता है कि टू-वीलर चलाने वाले लोग ट्रैफिक सिग्नल की परवाह किए बिना अपनी गाड़ी निकालने की कोशिश करते हैं, जो न केवल उनके लिए बल्कि पैदल चलने वालों के लिए भी जानलेवा साबित होता है।

अदालत ने कहा, एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हमें सिग्नल का पालन करते हुए ही सड़क पार करनी चाहिए। हालांकि कोर्ट ने ट्रैफिक पुलिस के कार्यों की सराहना की, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ दिया कि पुलिस को नियम तोड़ने वालों के खिलाफ और अधिक सख्त कार्रवाई करने की आवश्यकता है, ताकि सड़कों पर अराजकता को कम किया जा सके।

केस स्टडी: एक बस दुर्घटना और 11 साल का कानूनी संघर्ष

हाईकोर्ट की यह महत्वपूर्ण टिप्पणी एक दुखद मामले की सुनवाई के दौरान आई। मामला नवंबर 2012 का है, जब ठाणे म्युनिसिपल ट्रांसपोर्ट (TMT) की एक बस ने सड़क पार कर रहे एक व्यक्ति को टक्कर मार दी थी। पीड़ित व्यक्ति पार्किंसन की बीमारी से जूझ रहा था और आंशिक रूप से लकवाग्रस्त था। दुर्घटना के कुछ महीनों बाद, मार्च 2013 में उसकी मृत्यु हो गई।

इससे पहले, अप्रैल 2016 में मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) ने मृतक के परिवार को 13 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। परिवार ने इस राशि को कम बताते हुए मुआवजे को बढ़ाने की मांग के साथ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

अदालत का फैसला: लापरवाही और जिम्मेदारी का संतुलन

सुनवाई के दौरान अदालत ने एक सूक्ष्म कानूनी और मानवीय दृष्टिकोण अपनाया। जस्टिस जैन ने माना कि मृतक आंशिक रूप से लकवाग्रस्त था, ऐसी स्थिति में उसे अकेले सड़क पार करने के बजाय किसी राहगीर की मदद लेनी चाहिए थी। कोर्ट ने माना कि कुछ हद तक लापरवाही मृतक की ओर से भी थी।

हालांकि, अदालत ने बस चालक की जिम्मेदारी को बड़ा माना। कोर्ट ने कहा कि एक सार्वजनिक परिवहन चालक होने के नाते ड्राइवर को अधिक सतर्क रहना चाहिए था। यदि कोई व्यक्ति लंगड़ाते हुए या शारीरिक अक्षमता के साथ सड़क पार कर रहा है, तो ड्राइवर का यह कर्तव्य है कि वह वाहन की गति धीमी करे और उसे सुरक्षित निकलने दे। इसी आधार पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुआवजे की राशि को 13 लाख रुपये से बढ़ाकर 15 लाख रुपये करने का आदेश दिया।

विकसित राष्ट्र की राह में ‘सिविक सेंस’ की बाधा

बॉम्बे हाईकोर्ट की यह टिप्पणी एक बड़े सामाजिक सच को उजागर करती है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन बुनियादी ‘रोड एथिक्स’ (सड़क नैतिकता) के मामले में हम अभी भी बहुत पीछे हैं।

अदालत ने सवाल उठाया कि जब भारतीय विदेश जाते हैं, तो वहां के ट्रैफिक नियमों का अक्षरशः पालन करते हैं। वहां न तो कोई सिग्नल तोड़ता है और न ही गलत दिशा में गाड़ी चलाता है। लेकिन भारत लौटते ही वही लोग अनुशासन को ‘बोझ’ समझने लगते हैं। कोर्ट का यह आदेश एक तरह से देश के हर नागरिक को यह याद दिलाने की कोशिश है कि सड़कें केवल कंक्रीट का ढांचा नहीं हैं, बल्कि वे हमारे नागरिक चरित्र का दर्पण भी हैं।

बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला केवल एक दुर्घटना के मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बदलते भारत के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। ट्रैफिक नियमों का पालन करना केवल कानूनी मजबूरी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनशीलता का परिचायक है। जैसा कि माननीय जस्टिस ने कहा—सभ्य समाज की पहचान उसके भवनों से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के ‘सिविक सेंस’ से होती है।

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