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असम के बारपेटा में दिया कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला — पत्नी और बेटी की हत्या के दोषी को सुनाई गई फांसी की सजा

The Hill India News
Last updated: October 23, 2025 2:09 am
The Hill India News
Published: October 23, 2025
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प्रतीकात्मक फ़ोटो
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गुवाहाटी | 24 अक्टूबर 2025: असम के बारपेटा जिले में न्याय के इतिहास को एक नया अध्याय जोड़ते हुए जिला एवं सत्र न्यायाधीश दीपक ठाकुरिया ने बुधवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। न्यायालय ने 2023 के चर्चित दोहरे हत्याकांड के अभियुक्त ऋषभ दास को उसकी पत्नी और बेटी की नृशंस हत्या के लिए मौत की सजा (Death Penalty) सुनाई है।

Contents
13 अक्टूबर 2023 की भयावह रातपूर्व में भी रहा है हिंसक स्वभावलगभग दो वर्ष चली सुनवाईफैसले के दौरान अदालत का टिप्पणीस्थानीय समाज में गहरा असरएक होनहार बेटी की दुखद मौतन्याय व्यवस्था के लिए मील का पत्थरअगला चरण – उच्च न्यायालय की पुष्टिबारपेटा के इस फैसले ने न केवल एक जघन्य अपराध के दोषी को उचित दंड दिया, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि भारतीय न्याय व्यवस्था अभी भी पीड़ितों को न्याय दिलाने में सक्षम और प्रतिबद्ध है।

यह फैसला बारपेटा जिला एवं सत्र न्यायालय के इतिहास में पहली बार किसी आरोपी को दी गई फांसी की सजा है। अदालत ने इसे “अत्यंत दुर्लभतम मामलों में से एक (Rarest of the Rare Case)” मानते हुए कहा कि अभियुक्त का अपराध इतना क्रूर और असंवेदनशील था कि उसके लिए किसी नरमी की कोई गुंजाइश नहीं बचती।

13 अक्टूबर 2023 की भयावह रात

यह जघन्य घटना 13 अक्टूबर 2023 की रात असम के बारपेटा शहर के गांधी नगर क्षेत्र में हुई थी। अभियुक्त ऋषभ दास ने घरेलू विवाद के दौरान अपनी पत्नी बिनीता दास और 17 वर्षीय बेटी हिया दास पर कुल्हाड़ी से हमला कर दोनों की मौके पर ही हत्या कर दी थी।

पड़ोसियों के अनुसार, घटना के समय घर से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आने पर लोग दौड़े, लेकिन जब तक दरवाजा तोड़ा गया, तब तक मां-बेटी खून से लथपथ पड़ी थीं। आरोपी मौके से भागने की कोशिश में था, लेकिन पुलिस ने उसी रात उसे गिरफ्तार कर लिया।

पूर्व में भी रहा है हिंसक स्वभाव

पुलिस रिकॉर्ड और न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्यों के अनुसार, अभियुक्त का हिंसक व्यवहार पहले से जाना जाता था। वर्ष 2015 में उसने अपनी छोटी बहन पर कुल्हाड़ी से हमला किया था, जिसमें उसकी एक उंगली कट गई थी। उस समय भी स्थानीय लोगों ने हस्तक्षेप कर मामला शांत कराया था।

अदालत ने अपने फैसले में यह उल्लेख किया कि अभियुक्त “एक हिंसक प्रवृत्ति वाला व्यक्ति” है, जिसने परिवार के भीतर ही डर और असुरक्षा का वातावरण पैदा कर रखा था।

लगभग दो वर्ष चली सुनवाई

दोहरे हत्याकांड के बाद बारपेटा पुलिस ने तेज़ी से जांच पूरी की और चार्जशीट दाखिल की। करीब दो वर्षों तक चली न्यायिक कार्यवाही के दौरान अभियोजन पक्ष ने 15 गवाहों के बयान, फॉरेंसिक रिपोर्ट और जब्त किए गए हथियार (कुल्हाड़ी) को अदालत में पेश किया।

जिला एवं सत्र न्यायाधीश दीपक ठाकुरिया ने सभी साक्ष्यों और बयानों का संज्ञान लेते हुए यह माना कि अभियुक्त ने अपराध को पूरी योजना के साथ अंजाम दिया था। अदालत ने यह भी कहा कि हत्या की यह वारदात “किसी भी सभ्य समाज के लिए अस्वीकार्य” है और इसका प्रतिकार सबसे कठोर सजा से ही संभव है।

फैसले के दौरान अदालत का टिप्पणी

फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश ठाकुरिया ने कहा —

“यह मामला न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि मानवता की भी हत्या है। एक पिता का अपनी ही बेटी और पत्नी की इस प्रकार निर्मम हत्या करना सामाजिक विश्वास और पारिवारिक मूल्यों पर गहरा प्रहार है। ऐसी क्रूरता को किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।”

न्यायालय ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय “rarest of the rare” सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि यह अपराध उसी श्रेणी में आता है और इसलिए मौत की सजा ही न्यायसंगत दंड है।

स्थानीय समाज में गहरा असर

इस फैसले के बाद बारपेटा में लोगों ने अदालत के निर्णय का स्वागत किया। गांधी नगर क्षेत्र के निवासियों ने कहा कि “हिया और बिनीता के लिए आखिरकार न्याय मिला है।” कई लोगों ने सोशल मीडिया पर भी न्यायालय की सराहना करते हुए इसे “न्याय व्यवस्था पर लोगों के विश्वास को मजबूत करने वाला फैसला” बताया।

पीड़िता की मां और परिजनों ने कहा कि दो साल तक उन्होंने हर पेशी पर न्याय की उम्मीद रखी और आज न्याय ने अपनी बात साबित कर दी।

एक होनहार बेटी की दुखद मौत

मृतका हिया दास, स्थानीय स्कूल में हायर सेकेंडरी की छात्रा थी और पढ़ाई में बेहद होनहार मानी जाती थी। उसके शिक्षकों ने बताया कि वह डॉक्टर बनने का सपना देखती थी। अदालत के फैसले में न्यायाधीश ने भी उल्लेख किया कि “एक मासूम और प्रतिभाशाली बच्ची का जीवन उसके अपने पिता के हाथों समाप्त होना न केवल कानूनी अपराध है, बल्कि नैतिक पतन की पराकाष्ठा भी है।”

न्याय व्यवस्था के लिए मील का पत्थर

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बारपेटा जिला न्यायालय का यह फैसला असम न्याय प्रणाली में एक मील का पत्थर (Landmark Judgment) है। राज्य के इतिहास में यह पहला अवसर है जब जिला स्तर की अदालत ने पारिवारिक हत्याकांड में मौत की सजा सुनाई है।

असम उच्च न्यायालय के एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि “यह फैसला यह स्पष्ट संदेश देता है कि पारिवारिक रिश्तों के भीतर किए गए अपराधों को किसी भी स्थिति में हल्के में नहीं लिया जाएगा। अदालत का यह निर्णय न्याय की साख को और मजबूत करता है।”

अगला चरण – उच्च न्यायालय की पुष्टि

असम कानून के तहत, मौत की सजा (Death Sentence) को लागू करने से पहले इसे गुवाहाटी उच्च न्यायालय की पुष्टि आवश्यक होती है। अदालत अब मामले की रिकॉर्ड फाइल हाई कोर्ट को भेजेगी, जहाँ सजा की वैधता की पुष्टि की जाएगी।

फैसले के बाद पुलिस और अभियोजन पक्ष ने कहा कि वे इस मामले को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करेंगे ताकि समाज में यह स्पष्ट संदेश जाए कि “कानून से बड़ा कोई नहीं।”


बारपेटा के इस फैसले ने न केवल एक जघन्य अपराध के दोषी को उचित दंड दिया, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि भारतीय न्याय व्यवस्था अभी भी पीड़ितों को न्याय दिलाने में सक्षम और प्रतिबद्ध है।

एक ऐसी अदालत, जिसने पहली बार फांसी की सजा सुनाई — यह केवल एक फैसला नहीं, बल्कि एक न्यायिक चेतावनी है कि समाज में अगर कोई भी व्यक्ति अपने ही परिवार के खिलाफ अमानवीय अपराध करेगा, तो कानून उसे बख्शेगा नहीं।

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