अल्मोड़ा के युवा इनोवेटर रवि टम्टा ने तैयार किया सिंगल-सीटर HAPIDA SKYNEX Prototype; ड्रोन तकनीक के उन्नत रूप पर आधारित मशीन का सफल टेस्ट फ्लाइट, सोशल मीडिया पर वीडियो ने मचाई धूम
अल्मोड़ा/उत्तराखंड: पहाड़ों में सफर करना अक्सर चुनौतीपूर्ण होता है। घुमावदार सड़कें, खड़ी चढ़ाई, संकरे रास्ते और लंबे रूट के कारण कई बार कुछ किलोमीटर की दूरी तय करने में भी घंटों लग जाते हैं। ऐसे में अगर सड़क के बजाय हवा के रास्ते सफर किया जा सके तो पहाड़ी इलाकों के लिए यह किसी क्रांति से कम नहीं होगा। इसी सोच को हकीकत में बदलने की कोशिश की है उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के युवा इनोवेटर रवि टम्टा ने।
रवि टम्टा ने एक सिंगल-सीटर फ्लाइंग व्हीकल का प्रोटोटाइप तैयार कर उसका टेस्ट फ्लाइट किया है। इस मशीन का नाम HAPIDA SKYNEX Prototype बताया गया है और इसे उनकी स्टार्टअप कंपनी Hapida Sky के तहत विकसित किया गया है। हाल ही में इसकी उड़ान का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद उत्तराखंड के इस युवा इनोवेटर की चर्चा देशभर में होने लगी है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार यह मशीन ड्रोन तकनीक के संशोधित और उन्नत रूप पर आधारित है और इसका उद्देश्य छोटी दूरी के सफर को हवाई मार्ग से आसान बनाना है।
जब जमीन पर नहीं, आसमान में दौड़ी ‘कार’
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में एक व्यक्ति नीले रंग की छोटी सिंगल-सीटर मशीन में बैठा नजर आता है। मशीन के चारों ओर लगे रोटर/प्रोपेलर इसे हवा में उठाने में मदद करते दिखाई देते हैं। टेस्ट के दौरान यह वाहन जमीन से ऊपर उठता है और कुछ ऊंचाई पर उड़ान भरते हुए वापस सुरक्षित तरीके से नीचे उतरता नजर आता है।
वीडियो ने लोगों का ध्यान इसलिए भी खींचा है क्योंकि पहली नजर में यह मशीन एक छोटी कार जैसी दिखाई देती है, लेकिन इसके पहियों की जगह उड़ान भरने के लिए रोटर सिस्टम लगाया गया है। यही वजह है कि लोग इसे सोशल मीडिया पर ‘फ्लाइंग कार’ के नाम से चर्चा में ला रहे हैं।
हालांकि, इसे अभी आम सड़कों पर चलने वाली कार या व्यावसायिक तौर पर उपलब्ध विमान मानना सही नहीं होगा। यह फिलहाल प्रोटोटाइप और टेस्टिंग के चरण में मौजूद फ्लाइंग व्हीकल है। इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में लाने से पहले सुरक्षा, नियंत्रण, प्रमाणन और विमानन नियमों से जुड़े कई चरणों को पूरा करना होगा।
40 किलोमीटर का सफर हवा में महज 10 मिनट में?
इस इनोवेशन की सबसे खास बात इसकी संभावित यात्रा क्षमता को लेकर सामने आया दावा है। रिपोर्ट के मुताबिक रवि टम्टा के अनुसार उनके गांव से घर तक करीब 40 किलोमीटर की दूरी सड़क से तय करने में लगभग 90 मिनट लगते हैं, जबकि इसी दूरी को हवाई मार्ग से लगभग 10 मिनट में पूरा करने की संभावना हो सकती है।
अगर भविष्य में इस तरह की तकनीक को पूरी तरह सुरक्षित और व्यावहारिक बनाया जाता है, तो पहाड़ी क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां कई गांव सड़क नेटवर्क से दूर हैं या जहां सड़क मार्ग बेहद घुमावदार है, वहां छोटी दूरी की हवाई मोबिलिटी लोगों के लिए बड़ा बदलाव ला सकती है।
आपातकालीन सेवाओं, मेडिकल इमरजेंसी, दुर्गम क्षेत्रों में सामान पहुंचाने और आपदा के समय राहत सामग्री पहुंचाने जैसे क्षेत्रों में भी ऐसी तकनीक के संभावित उपयोग पर भविष्य में विचार किया जा सकता है।
रवि टम्टा का सपना सिर्फ उड़ने तक सीमित नहीं
रवि टम्टा के लिए यह प्रयोग अचानक शुरू हुआ कोई प्रोजेक्ट नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक वह पिछले कई वर्षों से अलग-अलग तकनीकी प्रयोग करते रहे हैं। उनका उद्देश्य ऐसी तकनीक विकसित करना है जो आधुनिक होने के साथ-साथ उपयोगी भी हो।
उनका मानना है कि आने वाले समय में परिवहन का स्वरूप तेजी से बदल सकता है। सड़क के साथ-साथ छोटी दूरी के लिए हवाई परिवहन के विकल्प विकसित किए जा सकते हैं। खासकर पहाड़ी इलाकों में जहां सड़क बनाने और उसका रखरखाव करना चुनौतीपूर्ण होता है, वहां छोटे फ्लाइंग व्हीकल भविष्य में परिवहन का वैकल्पिक माध्यम बन सकते हैं।
हालांकि, इस सपने को जमीन पर उतारने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। किसी भी मानव-सवार उड़ने वाले वाहन को बड़े स्तर पर इस्तेमाल में लाने से पहले उसकी सुरक्षा, बैटरी क्षमता, उड़ान नियंत्रण, आपातकालीन सिस्टम, संरचनात्मक मजबूती और नियामकीय मंजूरी बेहद महत्वपूर्ण होगी।
ड्रोन तकनीक को दिया नया रूप
रिपोर्ट में HAPIDA SKYNEX Prototype को ड्रोन तकनीक के संशोधित और उन्नत रूप से तैयार मशीन बताया गया है। ड्रोन तकनीक पिछले कुछ वर्षों में तेजी से विकसित हुई है और अब इसका इस्तेमाल कैमरा, सर्वेक्षण, कृषि, डिलीवरी और कई अन्य क्षेत्रों में किया जा रहा है।
इसी तकनीक को मानव परिवहन के लिए इस्तेमाल करने की दिशा में दुनिया के कई हिस्सों में प्रयोग हो रहे हैं। ऐसे में अल्मोड़ा के युवा इनोवेटर द्वारा तैयार किया गया यह प्रोटोटाइप उत्तराखंड की स्थानीय प्रतिभा और तकनीकी सोच का एक दिलचस्प उदाहरण बनकर सामने आया है।
पहाड़ों के लिए क्यों खास हो सकती है यह तकनीक?
उत्तराखंड में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां सड़क मार्ग से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने में काफी समय लगता है। कई गांव पहाड़ों की ऊंचाई पर बसे हैं और बारिश या भूस्खलन के दौरान सड़कें बंद होने से संपर्क भी प्रभावित हो जाता है।
ऐसे में अगर भविष्य में छोटे और सुरक्षित फ्लाइंग व्हीकल विकसित किए जाते हैं, तो उनका इस्तेमाल केवल सामान्य यात्रा के लिए ही नहीं बल्कि आपदा प्रबंधन और राहत कार्यों में भी किया जा सकता है।
मान लीजिए किसी पहाड़ी गांव का सड़क संपर्क भूस्खलन के कारण टूट गया। ऐसी स्थिति में अगर छोटी दूरी तय करने वाले प्रमाणित फ्लाइंग व्हीकल उपलब्ध हों तो जरूरी दवाइयां, खाद्य सामग्री या अन्य आवश्यक सामान पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
इसी तरह किसी मरीज को तत्काल अस्पताल पहुंचाने के लिए भी ऐसी तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। हालांकि, ये सभी भविष्य की संभावनाएं हैं और इनके लिए आवश्यक तकनीकी एवं कानूनी मानकों को पूरा करना अनिवार्य होगा।
पहले भी कई प्रयोग कर चुके हैं रवि
रिपोर्ट के मुताबिक फ्लाइंग व्हीकल रवि टम्टा का पहला तकनीकी प्रयोग नहीं है। इससे पहले भी वह अलग-अलग तरह के इनोवेशन पर काम कर चुके हैं।
बताया गया है कि उन्होंने एक ऐसी स्टिक तैयार की थी, जिसमें मोबाइल चार्जिंग और टॉर्च जैसी सुविधाएं शामिल थीं और जिसका इस्तेमाल उत्तराखंड वन विभाग में भी किया जा रहा है। इसके अलावा उन्होंने वर्षों पहले बोतल के अंदर बैटरी बनाकर बल्ब जलाने का प्रयोग भी किया था।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि वर्ष 2019 में उन्होंने इलेक्ट्रिक वाहनों को कम समय में चार्ज करने के उद्देश्य से एक इलेक्ट्रोलाइट पंप मशीन बनाने पर काम किया था।
इन प्रयोगों से यह संकेत मिलता है कि रवि लंबे समय से स्थानीय समस्याओं को तकनीक के जरिए हल करने की कोशिश करते रहे हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो
फ्लाइंग व्हीकल के टेस्ट का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग रवि टम्टा की तारीफ कर रहे हैं। कई लोग इसे उत्तराखंड की युवा प्रतिभा का उदाहरण बता रहे हैं और सरकार से ऐसे इनोवेटर्स को तकनीकी तथा आर्थिक सहयोग देने की मांग कर रहे हैं।
हालांकि, सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर किसी प्रोटोटाइप की पूर्ण तकनीकी क्षमता या सुरक्षा का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। टेस्ट फ्लाइट और व्यावसायिक इस्तेमाल के बीच कई महत्वपूर्ण चरण होते हैं।
इसलिए फिलहाल इस उपलब्धि को एक युवा इनोवेटर के प्रोटोटाइप टेस्ट के तौर पर देखना बेहतर होगा, न कि इसे बाजार में उपलब्ध ‘फ्लाइंग कार’ मान लेना।
सरकार के सहयोग से बदल सकता है पहाड़ों का सफर
रवि टम्टा का यह प्रयोग एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठाता है—अगर उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य की प्रतिभाओं को सही तकनीकी मार्गदर्शन, परीक्षण सुविधाएं, विशेषज्ञों की मदद और आवश्यक वित्तीय सहयोग मिले, तो क्या यहां से भविष्य की नई परिवहन तकनीक विकसित हो सकती है?
उत्तराखंड में पर्यटन, आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाओं और दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंच के लिए नई परिवहन तकनीकों की बड़ी संभावनाएं हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर विकसित इनोवेशन को संस्थागत सहयोग मिलना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
अल्मोड़ा के रवि टम्टा का HAPIDA SKYNEX Prototype अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन इसने एक उम्मीद जरूर जगाई है—कि पहाड़ों का युवा सिर्फ पहाड़ों पर चलने वाली तकनीक नहीं, बल्कि आसमान में उड़ने वाली तकनीक भी बना सकता है।
अगर आने वाले परीक्षण सफल होते हैं और जरूरी सुरक्षा व नियामकीय मानकों को पूरा किया जाता है, तो यह प्रयोग भविष्य में उत्तराखंड के दुर्गम इलाकों में परिवहन की नई कहानी लिखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। फिलहाल इस उड़ान ने इतना तो साबित कर दिया है कि उत्तराखंड की प्रतिभा में कल्पना को तकनीक में बदलने का जज्बा मौजूद है।
