By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
The Hill IndiaThe Hill IndiaThe Hill India
Notification Show More
Font ResizerAa
  • होम
  • फीचर्ड
  • उत्तराखंड
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • पर्यावरण
  • क्राइम
  • पर्यटन
  • शिक्षा
  • स्वास्थय
  • सामाजिक
  • स्पोर्ट्स
  • वीडियो
  • Contact Us
Reading: उत्तराखंड के 26 साल का विकास मॉडल सवालों के घेरे में! 71.3% अर्थव्यवस्था पर तीन मैदानी जिलों का कब्जा, पहाड़ आज भी विकास की राह ताक रहे
Share
Font ResizerAa
The Hill IndiaThe Hill India
  • होम
  • फीचर्ड
  • उत्तराखंड
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • पर्यावरण
  • क्राइम
  • पर्यटन
  • शिक्षा
  • स्वास्थय
  • सामाजिक
  • स्पोर्ट्स
  • वीडियो
  • Contact Us
Search
  • होम
  • फीचर्ड
  • उत्तराखंड
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • पर्यावरण
  • क्राइम
  • पर्यटन
  • शिक्षा
  • स्वास्थय
  • सामाजिक
  • स्पोर्ट्स
  • वीडियो
  • Contact Us
Have an existing account? Sign In
Follow US
The Hill India > Blog > उत्तराखंड > उत्तराखंड के 26 साल का विकास मॉडल सवालों के घेरे में! 71.3% अर्थव्यवस्था पर तीन मैदानी जिलों का कब्जा, पहाड़ आज भी विकास की राह ताक रहे
उत्तराखंडफीचर्ड

उत्तराखंड के 26 साल का विकास मॉडल सवालों के घेरे में! 71.3% अर्थव्यवस्था पर तीन मैदानी जिलों का कब्जा, पहाड़ आज भी विकास की राह ताक रहे

The Hill India News
Last updated: November 5, 2026 4:19 am
The Hill India News
Published: November 5, 2026
Share
SHARE

राज्य गठन के 26 साल बाद भी नहीं बदली आर्थिक तस्वीर, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और देहरादून में सिमटी प्रदेश की 71.3 फीसदी जिला अर्थव्यवस्था; नौ पर्वतीय जिलों का योगदान महज 20 फीसदी

Contents
तीन जिलों में सिमटी प्रदेश की 71.3 फीसदी अर्थव्यवस्थादो मैदानी जिलों की अर्थव्यवस्था नौ पर्वतीय जिलों से 2.6 गुना बड़ीऔद्योगिक विकास में सबसे ज्यादा असमानता, तीन जिलों की 85.9 फीसदी हिस्सेदारीप्रति व्यक्ति आय में हरिद्वार सबसे आगे, रुद्रप्रयाग सबसे पीछेखेती और प्राकृतिक संसाधनों में पहाड़ आगे, लेकिन कमाई का पूरा लाभ नहींसेवा क्षेत्र में भी देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर का दबदबापहाड़ों की आर्थिक वृद्धि दर में उम्मीद की किरण, लेकिन चुनौतियां बरकरारविशेषज्ञ बोले- विकास हुआ, लेकिन नियोजित तरीके से काम नहीं किया गयाराज्य आंदोलन का सपना और आज की हकीकतपलायन की समस्या का आर्थिक असंतुलन से सीधा संबंधपहाड़ों के लिए अलग आर्थिक मॉडल की जरूरत26 साल बाद सबसे बड़ा सवाल- विकास का लाभ पहाड़ तक कब पहुंचेगा?

औद्योगिक क्षेत्र में तीन जिलों की 85.9 फीसदी हिस्सेदारी, प्रति व्यक्ति आय में हरिद्वार और रुद्रप्रयाग के बीच करीब चार गुना का अंतर; राज्य आंदोलन के दौरान जिस पहाड़ के विकास का सपना देखा गया था, वह आज भी अधूरा

देहरादून: उत्तराखंड को अलग राज्य बने 26 साल पूरे होने जा रहे हैं। नौ नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर अस्तित्व में आए इस पर्वतीय राज्य के गठन के पीछे एक बड़ी उम्मीद थी। पहाड़ों को उनकी भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप विकास मिलेगा, स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे, गांवों में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार होगा और पलायन की समस्या पर प्रभावी रोक लगेगी। राज्य आंदोलन के दौरान पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों ने जिस बेहतर भविष्य की कल्पना की थी, उसमें पहाड़ की अपनी अर्थव्यवस्था, स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार और क्षेत्रीय संतुलन सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे थे। लेकिन राज्य गठन के 26 साल बाद भी उत्तराखंड की आर्थिक तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

प्रदेश की अर्थव्यवस्था के जिला स्तर पर उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि राज्य का आर्थिक विकास सभी जिलों में समान रूप से नहीं पहुंच पाया है। आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और देहरादून जैसे तीन प्रमुख जिलों में केंद्रित है। इन तीन जिलों की हिस्सेदारी राज्य के कुल जिला घरेलू उत्पाद में करीब 71.3 फीसदी है। इसके विपरीत शेष दस जिलों का योगदान लगभग 28.7 फीसदी ही रह जाता है। सबसे चिंताजनक तस्वीर नौ पर्वतीय जिलों की है, जिनकी संयुक्त हिस्सेदारी राज्य की कुल जिला अर्थव्यवस्था में महज 20 फीसदी के आसपास है।

अर्थशास्त्र एवं सांख्यिकी निदेशालय के जिला घरेलू उत्पाद के वर्ष 2021-22 के आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि राज्य गठन के बाद आर्थिक गतिविधियों का विस्तार तो हुआ, लेकिन उसका लाभ भौगोलिक रूप से समान तरीके से वितरित नहीं हो सका। उद्योग, बड़े कारोबार, विनिर्माण और सेवाओं के मामले में मैदानी जिले लगातार मजबूत होते गए, जबकि पर्वतीय जिले अपनी प्राकृतिक संपदा और संभावनाओं के बावजूद आर्थिक उत्पादन की दौड़ में पीछे रह गए। सवाल यह है कि जिस राज्य की पहचान पहाड़ों से है, उसकी अर्थव्यवस्था में पहाड़ों की हिस्सेदारी इतनी कम क्यों है?

तीन जिलों में सिमटी प्रदेश की 71.3 फीसदी अर्थव्यवस्था

उत्तराखंड की आर्थिक संरचना को समझने के लिए जिला घरेलू उत्पाद के आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है। वर्ष 2021-22 में हरिद्वार का जिला घरेलू उत्पाद 85,636.20 करोड़ रुपये दर्ज किया गया। ऊधमसिंह नगर का जिला घरेलू उत्पाद 57,579.20 करोड़ रुपये रहा, जबकि देहरादून में यह आंकड़ा 50,686.80 करोड़ रुपये तक पहुंचा।

इन तीनों जिलों का संयुक्त जिला घरेलू उत्पाद 1,93,902.20 करोड़ रुपये बैठता है। प्रदेश के सभी 13 जिलों के कुल जिला घरेलू उत्पाद करीब 2,71,797 करोड़ रुपये के मुकाबले यह हिस्सेदारी लगभग 71.3 फीसदी है। यानी उत्तराखंड की कुल जिला अर्थव्यवस्था का सातवें हिस्से से भी अधिक योगदान केवल तीन जिले दे रहे हैं।

इसके उलट प्रदेश के बाकी दस जिलों का संयुक्त योगदान लगभग 28.7 फीसदी है। इनमें नौ पर्वतीय जिले और नैनीताल शामिल हैं। अकेले नौ पर्वतीय जिलों की हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी के आसपास सिमट जाती है। यह आंकड़ा बताता है कि राज्य के भीतर आर्थिक गतिविधियों का भौगोलिक वितरण कितना असंतुलित है।

देहरादून में प्रशासनिक गतिविधियों, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, रियल एस्टेट और सेवा क्षेत्र का बड़ा आधार है। हरिद्वार में औद्योगिक इकाइयों, विनिर्माण और कारोबार का विस्तार हुआ है। वहीं ऊधमसिंह नगर में औद्योगिक क्षेत्रों और विनिर्माण इकाइयों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। इन परिस्थितियों ने तीनों जिलों को आर्थिक रूप से प्रदेश के अन्य जिलों से काफी आगे पहुंचा दिया है।

दो मैदानी जिलों की अर्थव्यवस्था नौ पर्वतीय जिलों से 2.6 गुना बड़ी

उत्तराखंड में आर्थिक असमानता की सबसे स्पष्ट तस्वीर तब सामने आती है, जब हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर की संयुक्त अर्थव्यवस्था की तुलना नौ पर्वतीय जिलों से की जाती है।

वर्ष 2021-22 के आंकड़ों के अनुसार हरिद्वार का जिला घरेलू उत्पाद 85,636.20 करोड़ रुपये और ऊधमसिंह नगर का 57,579.20 करोड़ रुपये था। दोनों जिलों का संयुक्त जिला घरेलू उत्पाद 1,43,215.40 करोड़ रुपये पहुंचता है।

इसके मुकाबले उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा और चंपावत जैसे नौ पर्वतीय जिलों का कुल जिला घरेलू उत्पाद केवल 54,431.16 करोड़ रुपये रहा।

इस तरह केवल दो मैदानी जिलों की अर्थव्यवस्था नौ पर्वतीय जिलों की संयुक्त अर्थव्यवस्था से करीब 2.6 गुना बड़ी है। यह अंतर केवल दो क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति की तुलना नहीं है, बल्कि प्रदेश में विकास के असमान वितरण की एक बड़ी तस्वीर भी प्रस्तुत करता है।

पर्वतीय जिलों में कृषि, बागवानी, पशुपालन, पर्यटन, वन संपदा और जल संसाधनों के रूप में आर्थिक संभावनाओं की कोई कमी नहीं है। इसके बावजूद इन संसाधनों को बड़े स्तर पर रोजगार और आय के अवसरों में बदलने के लिए जरूरी व्यवस्थाओं का पर्याप्त विस्तार नहीं हो पाया है।

औद्योगिक विकास में सबसे ज्यादा असमानता, तीन जिलों की 85.9 फीसदी हिस्सेदारी

प्रदेश की आर्थिक असमानता का सबसे बड़ा अंतर औद्योगिक क्षेत्र में देखने को मिलता है। उद्योग किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने, रोजगार पैदा करने और स्थानीय बाजार को विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन उत्तराखंड में औद्योगिक गतिविधियां भी कुछ चुनिंदा जिलों तक ही अधिक सीमित दिखाई देती हैं।

अर्थशास्त्र एवं सांख्यिकी निदेशालय के वर्ष 2021-22 के आंकड़ों के मुताबिक हरिद्वार का औद्योगिक क्षेत्र का सकल मूल्य संवर्धन 57,968 करोड़ रुपये रहा। ऊधमसिंह नगर में यह आंकड़ा 30,028 करोड़ रुपये और देहरादून में 19,467 करोड़ रुपये दर्ज किया गया।

इन तीनों जिलों का संयुक्त औद्योगिक सकल मूल्य संवर्धन 1,07,463 करोड़ रुपये बैठता है। प्रदेश के सभी जिलों के औद्योगिक क्षेत्र के कुल 1,25,170 करोड़ रुपये के सकल मूल्य संवर्धन में इनकी हिस्सेदारी करीब 85.9 फीसदी है।

यानी प्रदेश के औद्योगिक उत्पादन में लगभग 86 फीसदी योगदान केवल तीन जिले दे रहे हैं। दूसरी ओर नौ पर्वतीय जिलों का औद्योगिक क्षेत्र का सकल मूल्य संवर्धन करीब 10,782 करोड़ रुपये रहा, जो प्रदेश के कुल औद्योगिक सकल मूल्य संवर्धन का महज 8.6 फीसदी है।

इस अंतर के पीछे कई व्यावहारिक कारण हैं। मैदानी क्षेत्रों में परिवहन की बेहतर सुविधा, औद्योगिक भूमि की उपलब्धता, बड़े बाजारों तक पहुंच और कच्चे माल की आपूर्ति अपेक्षाकृत आसान है। इसके अलावा उद्योगों को आवश्यक आधारभूत सुविधाएं और श्रमिकों की उपलब्धता भी औद्योगिक विस्तार में मदद करती है।

इसके विपरीत पर्वतीय क्षेत्रों में उद्योग स्थापित करना कई चुनौतियों से जुड़ा है। यहां सड़क और परिवहन की लागत अधिक है। बाजार तक उत्पाद पहुंचाने में समय और खर्च दोनों बढ़ जाते हैं। कई क्षेत्रों में पर्याप्त औद्योगिक भूमि उपलब्ध नहीं है। इसके साथ ही कुशल श्रमिकों की कमी और कच्चे माल की नियमित आपूर्ति भी बड़ी चुनौती है।

इन परिस्थितियों में पहाड़ों में छोटे और मध्यम उद्योगों का अपेक्षित विस्तार नहीं हो पाया। हालांकि औद्योगिक क्षेत्र के आंकड़ों में खनन गतिविधियां भी शामिल हैं, लेकिन इसके बावजूद मैदानी और पर्वतीय जिलों के बीच अंतर काफी बड़ा है।

प्रति व्यक्ति आय में हरिद्वार सबसे आगे, रुद्रप्रयाग सबसे पीछे

आर्थिक विकास को केवल जिला घरेलू उत्पाद के आधार पर नहीं समझा जा सकता। यह भी देखना जरूरी है कि किसी जिले में रहने वाले लोगों की औसत आय कितनी है। इस लिहाज से प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े भी उत्तराखंड में क्षेत्रीय असमानता को सामने रखते हैं।

वर्ष 2021-22 में हरिद्वार की प्रति व्यक्ति आय 3,62,688 रुपये दर्ज की गई। ऊधमसिंह नगर में यह 2,69,070 रुपये और देहरादून में 2,35,707 रुपये रही। ये आंकड़े बताते हैं कि औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में मजबूत स्थिति रखने वाले जिलों में प्रति व्यक्ति आय भी अपेक्षाकृत अधिक है।

इसके मुकाबले पर्वतीय जिलों की स्थिति काफी अलग है। चमोली में प्रति व्यक्ति आय 1,27,330 रुपये रही, जो पर्वतीय जिलों में सबसे अधिक थी। पिथौरागढ़ में यह 1,18,678 रुपये, चंपावत में 1,16,136 रुपये और पौड़ी में 1,08,640 रुपये दर्ज की गई।

उत्तरकाशी में प्रति व्यक्ति आय 1,07,281 रुपये, टिहरी में 1,03,345 रुपये, अल्मोड़ा में 1,00,844 रुपये और बागेश्वर में 98,755 रुपये रही। सबसे कम प्रति व्यक्ति आय रुद्रप्रयाग में 93,160 रुपये दर्ज की गई।

अगर हरिद्वार और रुद्रप्रयाग की तुलना की जाए तो दोनों जिलों की प्रति व्यक्ति आय के बीच करीब 3.9 गुना का अंतर है। यानी हरिद्वार की प्रति व्यक्ति आय रुद्रप्रयाग से लगभग चार गुना अधिक है।

यह अंतर बताता है कि प्रदेश में आर्थिक अवसरों की उपलब्धता सभी क्षेत्रों में एक जैसी नहीं है। जहां मैदानी जिलों में उद्योग, कारोबार और सेवाओं के माध्यम से आय के कई स्रोत विकसित हुए हैं, वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में लोग सीमित आर्थिक गतिविधियों पर निर्भर हैं।

खेती और प्राकृतिक संसाधनों में पहाड़ आगे, लेकिन कमाई का पूरा लाभ नहीं

उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों की सबसे बड़ी ताकत उनकी प्राकृतिक संपदा है। यहां कृषि, बागवानी, पशुपालन, वानिकी, मत्स्य पालन और अन्य प्राथमिक गतिविधियों की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। राज्य की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियां अलग-अलग प्रकार की फसलों, फलों और पारंपरिक उत्पादों के लिए अनुकूल हैं।

वर्ष 2021-22 के आंकड़ों के मुताबिक नौ पर्वतीय जिलों का प्राथमिक क्षेत्र का सकल मूल्य संवर्धन 11,765 करोड़ रुपये रहा। वहीं हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर का संयुक्त आंकड़ा 10,746 करोड़ रुपये था। देहरादून और नैनीताल को जोड़ने पर प्राथमिक क्षेत्र का योगदान 6,577 करोड़ रुपये रहा।

ये आंकड़े एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखते हैं। औद्योगिक क्षेत्र में भले ही पर्वतीय जिले काफी पीछे हों, लेकिन प्राथमिक क्षेत्र में उनकी आर्थिक भूमिका मजबूत है। इसका अर्थ है कि पहाड़ों में उत्पादन की संभावनाएं मौजूद हैं। समस्या इन उत्पादों को बड़े बाजार और अधिक मूल्य दिलाने वाली व्यवस्था से जोड़ने की है।

पर्वतीय क्षेत्रों में पैदा होने वाले फल, सब्जियां, मोटे अनाज, दालें, मसाले और अन्य स्थानीय उत्पादों की बाजार में मांग हो सकती है। लेकिन कई जगहों पर पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और परिवहन सुविधाओं का अभाव है।

कई बार किसानों को अपनी उपज स्थानीय बाजार में कम कीमत पर बेचनी पड़ती है। यदि उसी उत्पाद की प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग किसी बड़े शहर में होती है तो उसका बाजार मूल्य बढ़ जाता है। इसका आर्थिक लाभ भी अक्सर उत्पादन करने वाले क्षेत्र के बजाय प्रसंस्करण और विपणन करने वाले क्षेत्रों को अधिक मिलता है।

यही वजह है कि पहाड़ों में उत्पादन होने के बावजूद उससे मिलने वाला पूरा आर्थिक लाभ स्थानीय लोगों तक नहीं पहुंच पाता। यदि पर्वतीय जिलों में स्थानीय स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण, फल संरक्षण, दुग्ध उत्पाद, जैविक उत्पाद और वन आधारित उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए तो रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

सेवा क्षेत्र में भी देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर का दबदबा

किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ रही है। व्यापार, परिवहन, होटल, रेस्तरां, वित्तीय सेवाएं, रियल एस्टेट, शिक्षा, स्वास्थ्य और सार्वजनिक प्रशासन जैसी गतिविधियां इसी क्षेत्र में आती हैं।

उत्तराखंड में सेवा क्षेत्र के आंकड़े भी आर्थिक गतिविधियों के कुछ प्रमुख जिलों में केंद्रित होने की तस्वीर पेश करते हैं।

वर्ष 2021-22 में देहरादून का सेवा क्षेत्र का सकल मूल्य संवर्धन 26,328 करोड़ रुपये रहा। ऊधमसिंह नगर में यह 19,136 करोड़ रुपये, हरिद्वार में 17,802 करोड़ रुपये और नैनीताल में 12,848 करोड़ रुपये दर्ज किया गया।

इन चार जिलों का संयुक्त योगदान 76,114 करोड़ रुपये रहा। प्रदेश के सेवा क्षेत्र के कुल 1,05,233 करोड़ रुपये के सकल मूल्य संवर्धन में इनकी हिस्सेदारी करीब 72.3 फीसदी है।

देहरादून में राज्य मुख्यालय होने के कारण सरकारी और प्रशासनिक गतिविधियों का बड़ा आधार मौजूद है। इसके अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य, निजी संस्थानों, व्यापार और रियल एस्टेट का भी यहां विस्तार हुआ है।

हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में औद्योगिक गतिविधियों के साथ परिवहन, व्यापार और अन्य व्यावसायिक सेवाओं का विस्तार हुआ है। नैनीताल में पर्यटन, होटल और आतिथ्य क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है।

इसके विपरीत पर्वतीय जिलों में पर्यटन और धार्मिक गतिविधियों के माध्यम से रोजगार के अवसर तो पैदा होते हैं, लेकिन उनका विस्तार और आर्थिक लाभ सभी क्षेत्रों तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा है।

कई पर्वतीय पर्यटन स्थलों पर होटल, होमस्टे, परिवहन, स्थानीय गाइड और खानपान जैसी सेवाओं की संभावनाएं हैं। इसके बावजूद पर्यटन का लाभ कुछ प्रमुख स्थलों और सीमित व्यावसायिक केंद्रों तक सिमट जाता है। जरूरत इस बात की है कि पर्यटन को गांवों, स्थानीय उत्पादों और छोटे कारोबार से जोड़ा जाए।

पहाड़ों की आर्थिक वृद्धि दर में उम्मीद की किरण, लेकिन चुनौतियां बरकरार

आर्थिक असमानता के इन आंकड़ों के बीच एक सकारात्मक पहलू भी सामने आता है। वर्ष 2021-22 में स्थिर कीमतों पर आर्थिक वृद्धि दर के मामले में कुछ पर्वतीय जिलों ने बेहतर प्रदर्शन किया।

चमोली की आर्थिक वृद्धि दर 11.5 फीसदी दर्ज की गई। पिथौरागढ़ और चंपावत में यह 11.2 फीसदी रही। वहीं हरिद्वार की वृद्धि दर 10.3 फीसदी, रुद्रप्रयाग और टिहरी की 9.58 फीसदी तथा देहरादून की 8.78 फीसदी रही।

दूसरी ओर बागेश्वर की वृद्धि दर 7.92 फीसदी और ऊधमसिंह नगर की 7.65 फीसदी दर्ज की गई।

निदेशालय के आंकड़ों के मुताबिक चमोली में सेवा क्षेत्र की वृद्धि और पिथौरागढ़ तथा चंपावत में व्यापार, मरम्मत, होटल और रेस्तरां क्षेत्र की गतिविधियों में बढ़ोतरी इन जिलों की बेहतर वृद्धि दर की प्रमुख वजहों में शामिल रही।

यह स्थिति बताती है कि पर्वतीय जिलों में भी आर्थिक गतिविधियों को गति देने की क्षमता मौजूद है। लेकिन किसी जिले की एक वर्ष की बेहतर वृद्धि दर और उसकी कुल अर्थव्यवस्था का आकार दो अलग-अलग बातें हैं। छोटे आर्थिक आधार वाले जिले में वृद्धि दर अधिक होने के बावजूद कुल आर्थिक उत्पादन बड़े मैदानी जिलों से काफी कम रह सकता है।

इसलिए पर्वतीय जिलों के विकास का मूल्यांकन केवल वृद्धि दर से नहीं, बल्कि रोजगार, प्रति व्यक्ति आय, उद्योगों की संख्या, स्थानीय निवेश और पलायन जैसे मानकों के आधार पर भी किया जाना जरूरी है।

विशेषज्ञ बोले- विकास हुआ, लेकिन नियोजित तरीके से काम नहीं किया गया

उत्तराखंड में मैदानी और पर्वतीय जिलों के बीच आर्थिक अंतर को लेकर वित्तीय जानकार प्रोफेसर सुरजीत सिंह गांधी का मानना है कि प्रदेश में पिछले 26 वर्षों के दौरान विकास तो हुआ है, लेकिन जिस सुनियोजित तरीके से काम किया जाना चाहिए था, उस तरह के प्रयास नहीं हो पाए।

उनके मुताबिक राज्य के अलग-अलग जनपदों की भौगोलिक परिस्थितियों में काफी अंतर है। यही वजह है कि आर्थिक गतिविधियों और उत्पादन के आंकड़ों में भी बड़ा अंतर दिखाई देता है।

प्रोफेसर सुरजीत सिंह गांधी कहते हैं कि चिंता की बात केवल यह नहीं है कि मैदानी जिलों की अर्थव्यवस्था पर्वतीय जिलों से मजबूत है। असली चिंता यह है कि पर्वतीय जनपदों में आर्थिक गतिविधियों को मौजूदा स्थिति से कहीं अधिक गति दी जा सकती थी, लेकिन उस दिशा में अपेक्षित प्रयास नहीं हो पाए।

उनकी बात से यह सवाल भी उठता है कि क्या प्रदेश में विकास की नीतियां बनाते समय पर्वतीय क्षेत्रों की अलग-अलग भौगोलिक और आर्थिक परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व दिया गया? क्या उद्योगों और निवेश को केवल उन क्षेत्रों में बढ़ावा मिला, जहां पहले से बेहतर बुनियादी सुविधाएं मौजूद थीं? और क्या पहाड़ों के लिए अलग आर्थिक मॉडल तैयार करने की जरूरत को समय रहते समझा गया?

राज्य आंदोलन का सपना और आज की हकीकत

उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल एक अलग प्रशासनिक इकाई बनाने का आंदोलन नहीं था। इसके पीछे पहाड़ों की समस्याओं को समझने और उनके अनुरूप विकास का रास्ता तैयार करने की भावना भी जुड़ी थी।

पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार की कमी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, सड़क और संचार व्यवस्था की चुनौतियां तथा लगातार बढ़ता पलायन आंदोलन के प्रमुख मुद्दों में शामिल थे। लोगों को उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने के बाद नीतियां स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की जाएंगी।

लेकिन 26 साल बाद भी कई पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल बने हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं को स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोजगार नहीं मिल पाता। बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की तलाश में लोगों को बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है।

राज्य आंदोलनकारी प्रदीप कुकरेती का कहना है कि उत्तराखंड राज्य की मूल संकल्पना पर्वतीय जनपदों के विकास से जुड़ी हुई थी, लेकिन राज्य बनने के बाद विकास का लाभ अधिकतर मैदानी क्षेत्रों में दिखाई दिया।

उनके मुताबिक राज्य सरकारों ने समय-समय पर पर्वतीय जिलों की स्थिति सुधारने की बातें तो कीं, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसी ठोस नीतियां लागू नहीं हो पाईं, जिनसे पहाड़ों की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में व्यापक बदलाव आ सके।

वह कहते हैं कि राज्य गठन के 26 साल बाद भी पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन और बुनियादी सुविधाओं के विकास जैसे मुद्दे प्रमुख बने हुए हैं। यह स्थिति राज्य गठन के मूल उद्देश्यों पर सवाल खड़े करती है।

पलायन की समस्या का आर्थिक असंतुलन से सीधा संबंध

उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में पलायन की समस्या को केवल रोजगार की कमी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे आर्थिक अवसरों का असमान वितरण, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता, परिवहन व्यवस्था और स्थानीय बाजारों की कमजोरी जैसे कई कारण जुड़े हैं।

जब किसी गांव या क्षेत्र में पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं होता तो युवा बेहतर अवसरों की तलाश में देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार, दिल्ली और अन्य बड़े शहरों की ओर जाते हैं। धीरे-धीरे गांवों में काम करने वाले लोगों की संख्या कम होती जाती है।

इसका असर कृषि और स्थानीय उत्पादन पर भी पड़ता है। खेत खाली होने लगते हैं, पारंपरिक व्यवसाय कमजोर होते हैं और स्थानीय बाजार की मांग घटने लगती है। परिणामस्वरूप स्थानीय अर्थव्यवस्था को और नुकसान पहुंचता है।

यह एक ऐसा चक्र है, जिसमें रोजगार की कमी पलायन को बढ़ाती है और पलायन स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को कमजोर करता है। जब तक पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर आय और रोजगार के स्थायी अवसर नहीं बनेंगे, तब तक इस समस्या का प्रभावी समाधान मुश्किल रहेगा।

पहाड़ों के लिए अलग आर्थिक मॉडल की जरूरत

उत्तराखंड की आर्थिक असमानता को कम करने के लिए जरूरी है कि पर्वतीय और मैदानी जिलों को एक ही विकास मॉडल के आधार पर न देखा जाए। दोनों क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां, संसाधन, जनसंख्या का वितरण और आर्थिक जरूरतें अलग-अलग हैं।

मैदानी क्षेत्रों में बड़े उद्योग और विनिर्माण इकाइयां आर्थिक विकास का प्रमुख आधार बन सकते हैं, लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों पर आधारित छोटे और मध्यम उद्योग अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं।

पर्वतीय जिलों में फल और सब्जियों के प्रसंस्करण केंद्र, शहद उत्पादन, दुग्ध आधारित उद्योग, जड़ी-बूटी प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, ऊन आधारित उत्पाद और स्थानीय खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सकता है।

इसके लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं होगा। उत्पादन से लेकर बाजार तक पूरी व्यवस्था विकसित करनी होगी। किसानों और छोटे उत्पादकों को तकनीकी सहायता, भंडारण, परिवहन, प्रशिक्षण, वित्तीय सहयोग और बाजार उपलब्ध कराना जरूरी है।

पर्यटन के क्षेत्र में भी केवल बड़े पर्यटन स्थलों पर निर्भर रहने के बजाय गांव आधारित पर्यटन, होमस्टे, धार्मिक पर्यटन, साहसिक पर्यटन और स्थानीय संस्कृति से जुड़े कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे पर्यटन से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा स्थानीय लोगों तक पहुंच सकता है।

इसके साथ ही पर्वतीय क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, इंटरनेट और संचार सुविधाओं को मजबूत करना भी जरूरी है। बेहतर सुविधाएं उपलब्ध होने से स्थानीय युवाओं को अपने क्षेत्र में ही रोजगार और स्वरोजगार के अवसर मिल सकते हैं।

26 साल बाद सबसे बड़ा सवाल- विकास का लाभ पहाड़ तक कब पहुंचेगा?

उत्तराखंड के जिला घरेलू उत्पाद के आंकड़े एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करते हैं। राज्य गठन के 26 साल बाद भी प्रदेश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा तीन जिलों में केंद्रित क्यों है? नौ पर्वतीय जिलों की संयुक्त अर्थव्यवस्था दो मैदानी जिलों से इतनी पीछे क्यों है? उद्योगों और सेवाओं के क्षेत्र में पहाड़ों की हिस्सेदारी इतनी कम क्यों बनी हुई है?

इन सवालों का जवाब केवल आर्थिक आंकड़ों में नहीं, बल्कि उन नीतियों और फैसलों में भी छिपा है, जिनके माध्यम से प्रदेश में विकास की दिशा तय की गई।

पहाड़ों में प्राकृतिक संसाधन हैं, पर्यटन की संभावनाएं हैं, कृषि और बागवानी का आधार है और स्थानीय उत्पादों की अपनी पहचान है। इसके बावजूद इन संसाधनों को बड़े आर्थिक अवसरों में बदलने के लिए जिस स्तर पर काम होना चाहिए था, वह चुनौती आज भी बनी हुई है।

प्रदेश की आर्थिक प्रगति तभी संतुलित मानी जाएगी, जब इसका लाभ हरिद्वार, देहरादून और ऊधमसिंह नगर जैसे बड़े जिलों के साथ उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा और चंपावत तक पहुंचेगा।

उत्तराखंड के सामने अब केवल आर्थिक विकास की दर बढ़ाने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि विकास के अवसरों का वितरण भौगोलिक रूप से संतुलित हो। पहाड़ों के युवाओं को रोजगार के लिए अपना घर छोड़ने को मजबूर न होना पड़े। किसानों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य मिले। स्थानीय उद्योगों को बाजार और निवेश मिले तथा पर्यटन से होने वाली कमाई का लाभ स्थानीय समुदाय तक पहुंचे।

राज्य गठन के 26 साल बाद उत्तराखंड एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे अपने विकास मॉडल का मूल्यांकन करना होगा। 71.3 फीसदी अर्थव्यवस्था का तीन जिलों में सिमटना और नौ पर्वतीय जिलों का करीब 20 फीसदी हिस्सेदारी तक सीमित रहना केवल आंकड़ों का अंतर नहीं है। यह उस विकास के संतुलन का सवाल है, जिसके लिए अलग उत्तराखंड राज्य की मांग उठी थी।

अब देखने वाली बात यह होगी कि आने वाले वर्षों में सरकारें इन आंकड़ों को केवल रिपोर्ट तक सीमित रखती हैं या इन्हें आधार बनाकर पर्वतीय जिलों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए ठोस कदम भी उठाती हैं। क्योंकि उत्तराखंड का विकास तभी पूरा माना जाएगा, जब मैदान के साथ पहाड़ भी आर्थिक रूप से मजबूत होंगे और राज्य गठन का सपना वास्तव में धरातल पर दिखाई देगा।

You Might Also Like

नई दिल्ली : स्वास्थ्य क्षेत्र में अधिक से अधिक सार्वजनिक-निजी भागीदारी होनी चाहिए :उपराष्ट्रपति
उत्तराखण्ड: 29 नवंबर से होगा विधानसभा का शीतकालीन सत्र
सावरकर के अपमान पर उनके पोते का बड़ा बयान, ‘राहुल गांधी में हिम्मत हो तो एक दिन अंडमान जेल में बिताएं’
Uttarakhand: CM धामी ने ‘तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहस पुरस्कार-2022’ से सम्मानित, स्व0 सविता कंसवाल के परिवार से की भेंट
Uttarakhand: अल्मोड़ा में एकजुट हुए कांग्रेस के दिग्गज, कार्यकर्ताओं से किया लोकसभा चुनाव के लिए कमर कसने का आह्वान
TAGGED:Dehraduneconomic developmentHill DevelopmentUttarakhand
Share This Article
Facebook Email Print
Leave a Comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Follow US

Find US on Social Medias
FacebookLike
XFollow
YoutubeSubscribe
TelegramFollow
Popular News
उत्तराखंडफीचर्डराजनीति

2027 का चुनावी बिगुल फूंकने देहरादून आ रहे अमित शाह! परेड ग्राउंड से भाजपा कार्यकर्ताओं को देंगे जीत का मंत्र, कांग्रेस ने भी उठाए बड़े सवाल

The Hill India News
The Hill India News
November 5, 2026
उत्तराखंड के 26 साल का विकास मॉडल सवालों के घेरे में! 71.3% अर्थव्यवस्था पर तीन मैदानी जिलों का कब्जा, पहाड़ आज भी विकास की राह ताक रहे
अग्निवीरों के लिए सरकार का बड़ा फैसला! 4 नहीं अब 6 साल तक मिलेगी सेवा का मौका, 75% अग्निवीरों को 2 साल का एक्सटेंशन; नियमित सैनिक बनने का रास्ता भी खुला
गिरधारी लाल साहू को हाईकोर्ट से बड़ा झटका! रेखा आर्या की FIR रद्द करने से इनकार, रिट याचिका खारिज; गिरफ्तारी वारंट के बीच बढ़ीं मुश्किलें
बॉलीवुड में फिर रंगदारी का खौफ! आयुष्मान खुराना को लॉरेंस बिश्नोई गैंग के नाम पर करोड़ों की धमकी, ऑडियो मैसेज भेजकर मांगी मोटी रकम; तुषार कपूर भी बन चुके हैं निशाना
भूमि पेडनेकर पर मंडराया चुड़ैल का खौफ! ‘जानी दुश्मन… डर के आगे मौत है’ का पहला पोस्टर रिलीज, 2027 में बड़े पर्दे पर मचेगा डर का तांडव
विराट कोहली का वनडे क्रिकेट में ऐतिहासिक धमाका! नंबर-3 पर 13 हजार रन बनाने वाले दुनिया के पहले बल्लेबाज बने, संगकारा और पोंटिंग जैसे दिग्गजों को छोड़ा पीछे
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: राज्यों को बिक्री कर पर अतिरिक्त टैक्स, सरचार्ज और सेस लगाने का अधिकार बरकरार; 27 साल पुराने विवाद पर लगा विराम, जानिए कारोबारियों पर क्या होगा असर
पंचकूला स्कूल हमले में जिंदगी की जंग जीतकर घर लौटी 6 साल की मासूम, 8 दिन बाद PGI से मिली छुट्टी; बच्ची की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाएंगे समाजसेवी
रेखा आर्य विवाद: मंत्री के पति गिरधारी लाल साहू पर गिरफ्तारी का शिकंजा! गैर जमानती वारंट जारी, तलाश में जुटीं पुलिस की कई टीमें
© The Hill India. All Rights Reserved | Developed By: Tech Yard Labs
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?