सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के कराधिकार से जुड़े करीब 27 साल पुराने संवैधानिक विवाद पर बड़ा फैसला सुनाया है। सात जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकारें बिक्री कर (Sales Tax) की देय राशि के प्रतिशत के आधार पर अतिरिक्त बिक्री कर, सरचार्ज और सेस लगा सकती हैं। अदालत ने माना कि यदि अतिरिक्त कर की गणना मूल बिक्री कर की राशि के आधार पर की जाती है तो उसका संवैधानिक स्वरूप भी बिक्री कर का ही होगा। ऐसे में यह राज्य सरकारों की विधायी शक्तियों के अंतर्गत आता है। इस फैसले से राज्यों के कर लगाने के अधिकार को महत्वपूर्ण संवैधानिक समर्थन मिला है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कर की वैधता केवल उसके नाम से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक प्रकृति और गणना के तरीके से तय होगी।
नई दिल्ली: देश में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच कर लगाने के अधिकार को लेकर लंबे समय से कई कानूनी विवाद सामने आते रहे हैं। इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण संवैधानिक फैसला सुनाते हुए राज्यों के अतिरिक्त बिक्री कर, सरचार्ज और सेस लगाने के अधिकार को बरकरार रखा है। सात जजों की संविधान पीठ ने 27 साल से लंबित इस कानूनी विवाद पर अपना निर्णय सुनाया। इस फैसले को राज्यों की वित्तीय और विधायी शक्तियों के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है।
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या राज्य सरकारें मूल बिक्री कर के ऊपर अतिरिक्त कर या सरचार्ज लगा सकती हैं? क्या ऐसा अतिरिक्त कर बिक्री कर की ही श्रेणी में आएगा या फिर उसे एक अलग प्रकार का कर माना जाएगा? याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकारों के इस अधिकार को चुनौती देते हुए दलील दी थी कि अतिरिक्त बिक्री कर का स्वरूप वास्तव में आय पर लगाए जाने वाले कर जैसा है, जिस पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार यानी संसद के पास है।
सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय संविधान पीठ ने इस कानूनी विवाद की व्याख्या करते हुए कहा कि यदि अतिरिक्त कर की गणना बिक्री कर की देय राशि के प्रतिशत के आधार पर की जाती है तो उसे बिक्री कर से अलग नहीं माना जा सकता। उसका मूल स्वरूप बिक्री कर का ही रहता है। इसलिए ऐसा कर संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि-54 के तहत राज्यों के विधायी अधिकार क्षेत्र में आता है।
सात जजों की संविधान पीठ ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला
इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय संविधान पीठ ने की। पीठ में जस्टिस के.वी. विश्वनाथन, जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी, जस्टिस जॉयमाल्य बागची, जस्टिस एन.वी. अंजारिया, जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस वी. मोहन शामिल थे।
संविधान पीठ के सामने मुख्य रूप से यह सवाल था कि बिक्री कर के ऊपर लगाया जाने वाला अतिरिक्त कर किस संवैधानिक श्रेणी में आएगा और क्या राज्य सरकारों को ऐसा कर लगाने का अधिकार प्राप्त है?
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कर का नाम अतिरिक्त बिक्री कर, सरचार्ज या सेस रख देने से उसकी मूल प्रकृति नहीं बदल जाती। यदि उसकी गणना मूल बिक्री कर की देय राशि के प्रतिशत के आधार पर की जाती है तो वह मूल बिक्री कर का ही विस्तार माना जाएगा।
इसलिए केवल इस आधार पर राज्य सरकारों के अधिकार को सीमित नहीं किया जा सकता कि उन्होंने बिक्री कर के ऊपर एक अतिरिक्त वित्तीय बोझ लगाया है। संविधान के तहत राज्यों को बिक्री और खरीद पर कर लगाने की जो शक्ति प्राप्त है, उसके दायरे में इस प्रकार का अतिरिक्त कर भी आ सकता है।
संविधान की सातवीं अनुसूची की प्रविष्टि-54 क्या कहती है?
इस पूरे विवाद को समझने के लिए भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची को समझना जरूरी है। संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच विधायी शक्तियों का बंटवारा किया गया है। इसके तहत संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची बनाई गई हैं।
राज्य सूची की प्रविष्टि-54 राज्यों को वस्तुओं की बिक्री और खरीद पर कर लगाने का अधिकार प्रदान करती है। इसी संवैधानिक प्रावधान के आधार पर राज्य सरकारें अपने अधिकार क्षेत्र में बिक्री कर से संबंधित कानून बना सकती हैं।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी प्रविष्टि की व्याख्या करते हुए कहा कि यदि कोई अतिरिक्त कर मूल बिक्री कर की देय राशि के आधार पर लगाया जाता है तो उसे भी बिक्री कर के स्वरूप में ही देखा जाएगा।
उदाहरण के तौर पर यदि किसी कारोबारी पर बिक्री कर की देय राशि 1 लाख रुपये बनती है और राज्य सरकार उस राशि पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त बिक्री कर लगाती है, तो अतिरिक्त कर 10 हजार रुपये होगा। अदालत की व्याख्या के अनुसार इस तरह की गणना वाले अतिरिक्त कर का स्वरूप भी बिक्री कर का ही रहेगा।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्य सरकारें किसी भी नाम से मनमाना कर लगा सकती हैं। कर का वास्तविक आधार, प्रकृति और संवैधानिक अधिकार क्षेत्र महत्वपूर्ण बने रहेंगे।
क्या था 27 साल पुराना विवाद? ओडिशा के कानून से शुरू हुई थी कानूनी लड़ाई
इस मामले की जड़ ओडिशा सेल्स टैक्स एक्ट, 1947 की धारा 5A से जुड़ी हुई थी। इस प्रावधान के तहत राज्य सरकार ने कारोबारियों पर अतिरिक्त बिक्री कर लगाने का प्रावधान किया था।
इस कानून के तहत कारोबारियों के वार्षिक टर्नओवर के आधार पर अतिरिक्त कर की अलग-अलग दरें निर्धारित की गई थीं।
- 10 लाख रुपये से 1 करोड़ रुपये तक वार्षिक कारोबार करने वाले डीलरों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त बिक्री कर लगाया गया था।
- 1 करोड़ रुपये से अधिक वार्षिक कारोबार करने वाले डीलरों पर 15 प्रतिशत अतिरिक्त बिक्री कर निर्धारित किया गया था।
इस प्रावधान को कारोबारियों की ओर से चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि राज्य सरकार को वस्तुओं की बिक्री और खरीद पर कर लगाने का अधिकार तो है, लेकिन बिक्री कर के ऊपर अतिरिक्त कर लगाकर वह अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर जा रही है।
उनकी दलील थी कि इस प्रकार का अतिरिक्त कर वास्तव में कारोबारियों की आय या कमाई पर लगाए जाने वाले कर जैसा है। आयकर लगाने का अधिकार संसद के पास है, इसलिए राज्य सरकार द्वारा इस तरह का कर लगाना संवैधानिक रूप से उचित नहीं है।
इसी कानूनी विवाद के कारण मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और वर्ष 1999 में इसे व्यापक संवैधानिक व्याख्या के लिए सात जजों की पीठ के पास भेज दिया गया। इसके बाद लगभग 27 वर्षों तक यह मामला कानूनी चर्चा और सुनवाई का विषय बना रहा।
S. Kodar केस में पहले ही अतिरिक्त बिक्री कर को मिल चुकी थी वैधता
इस विवाद को समझने में सुप्रीम कोर्ट का एस. कोदार (S. Kodar) मामला भी काफी महत्वपूर्ण है। इस पुराने फैसले में पांच जजों की पीठ ने अतिरिक्त बिक्री कर की वैधता को स्वीकार किया था।
उस मामले में अदालत ने माना था कि केवल अतिरिक्त कर लगाए जाने से कर की मूल प्रकृति नहीं बदल जाती। यदि कर का संबंध बिक्री कर से है और उसकी गणना भी उसी आधार पर की जाती है तो उसे बिक्री कर का ही हिस्सा माना जा सकता है।
इसका मतलब यह है कि बिक्री कर के ऊपर अतिरिक्त कर लगाए जाने मात्र से वह कोई नया और पूरी तरह अलग कर नहीं बन जाता।
इसके बाद बिहार सरचार्ज मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने बिक्री कर पर लगाए गए सरचार्ज को वैध माना था। इन फैसलों से राज्यों के अतिरिक्त कर लगाने के अधिकार को समर्थन मिला था।
हालांकि, बाद में इंडिया सीमेंट्स मामले में खनन रॉयल्टी पर लगाए गए सेस को लेकर अलग कानूनी व्याख्या सामने आई। इस फैसले का हवाला देकर याचिकाकर्ताओं ने अतिरिक्त बिक्री कर की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए थे।
अलग-अलग मामलों में सामने आई कानूनी व्याख्याओं के कारण यह आवश्यक हो गया था कि सुप्रीम कोर्ट की बड़ी संविधान पीठ इस मुद्दे पर स्पष्ट स्थिति निर्धारित करे। अब सात जजों की पीठ के फैसले से इस पुराने विवाद की संवैधानिक व्याख्या सामने आ गई है।
GST लागू होने के बाद क्यों बदल गई इस मामले की प्रासंगिकता?
इस सुनवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू वस्तु एवं सेवा कर यानी GST लागू होना भी रहा। भारत में 1 जुलाई 2017 से जीएसटी व्यवस्था लागू की गई थी। इसके बाद देश में अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में व्यापक बदलाव आया।
जीएसटी लागू होने के बाद केंद्र और राज्यों के अप्रत्यक्ष करों की व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन हुआ। कई पुराने बिक्री कर कानूनों की जगह नई कर व्यवस्था ने ले ली। ऐसे में पुराने कानूनों के तहत लगाए जाने वाले अतिरिक्त बिक्री कर और सरचार्ज से जुड़े विवादों की व्यावहारिक प्रासंगिकता भी काफी हद तक बदल गई।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया था कि जीएसटी लागू होने के बाद इस तरह के अधिकांश विवाद अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि ऐसे बहुत कम मामले अब लंबित हैं।
अदालत ने भी इस बात पर ध्यान दिया कि जिन कानूनों के तहत विवादित अतिरिक्त कर लगाए गए थे, उनकी जगह अब नए कानून लागू हो चुके हैं। इसलिए मूल संदर्भ में उठाया गया प्रश्न काफी हद तक अकादमिक हो गया है।
इसका अर्थ यह है कि अदालत के सामने मौजूद संवैधानिक प्रश्न का महत्व अपनी जगह बना हुआ था, लेकिन पुराने कानूनों के तहत इसके व्यावहारिक प्रभाव सीमित हो चुके थे।
टैक्स का नाम बदलने से उसकी प्रकृति नहीं बदलती: सुप्रीम कोर्ट
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह भी है कि किसी कर का नाम देखकर उसकी संवैधानिक वैधता तय नहीं की जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि अतिरिक्त कर, सरचार्ज और सेस जैसे अलग-अलग नाम होने के बावजूद उनकी वास्तविक प्रकृति और गणना का आधार देखना जरूरी है।
उदाहरण के तौर पर यदि किसी कर की गणना बिक्री कर की मूल देय राशि के प्रतिशत के रूप में की जा रही है तो केवल उसे सरचार्ज या सेस नाम दे देने से वह बिक्री कर से अलग नहीं हो जाएगा।
इसके विपरीत, किसी दूसरे प्रकार के कर की संवैधानिक वैधता का परीक्षण उसके वास्तविक स्वरूप, उद्देश्य और संबंधित संवैधानिक प्रावधान के आधार पर किया जाएगा।
इसलिए इस फैसले को सभी प्रकार के सेस या सरचार्ज के लिए सामान्य अनुमति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह फैसला विशेष रूप से बिक्री कर की देय राशि के प्रतिशत के रूप में लगाए जाने वाले अतिरिक्त कर से जुड़े संवैधानिक विवाद पर है।
राज्यों के लिए फैसले का क्या है महत्व?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को राज्यों के कराधिकार के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह संवैधानिक सिद्धांत स्पष्ट होता है कि राज्य सूची में दिए गए कराधिकारों की व्याख्या करते समय किसी कर के वास्तविक स्वरूप को महत्व दिया जाएगा।
राज्यों को वस्तुओं की बिक्री और खरीद पर कर लगाने का अधिकार प्राप्त है। ऐसे में बिक्री कर पर आधारित अतिरिक्त कर को भी उसी अधिकार क्षेत्र का हिस्सा माना जा सकता है, बशर्ते वह निर्धारित संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरता हो।
हालांकि, जीएसटी लागू होने के बाद सामान्य वस्तुओं की बिक्री पर पुराने बिक्री कर कानूनों की व्यवस्था में बड़ा बदलाव आ चुका है। इसलिए इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि राज्य सरकारें अब जीएसटी के ऊपर अपनी मर्जी से कोई भी अतिरिक्त बिक्री कर लगा सकती हैं। जीएसटी व्यवस्था और राज्यों के कराधिकार से जुड़े संवैधानिक प्रावधान अलग-अलग कानूनी ढांचे के तहत काम करते हैं।
कारोबारियों और आम जनता पर क्या होगा असर?
इस फैसले के बाद कारोबारियों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अब उन्हें अतिरिक्त टैक्स देना पड़ेगा? इसका जवाब सीधे तौर पर हां नहीं है।
यह फैसला मुख्य रूप से पुराने बिक्री कर कानूनों के तहत अतिरिक्त कर लगाने की संवैधानिक वैधता से संबंधित है। जीएसटी लागू होने के बाद मौजूदा कर व्यवस्था पहले से अलग है। इसलिए इस निर्णय को वर्तमान जीएसटी दरों में तत्काल वृद्धि या कारोबारियों पर नया टैक्स लगाने के आदेश के रूप में नहीं समझना चाहिए।
इसका महत्व मुख्य रूप से संवैधानिक व्याख्या और पुराने कर विवादों के निपटारे से जुड़ा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारें अपने संवैधानिक अधिकारों के अंतर्गत किस प्रकार के अतिरिक्त बिक्री कर लगा सकती हैं।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की संविधान पीठ का यह फैसला केंद्र और राज्यों के बीच कराधिकारों की संवैधानिक सीमा को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। करीब 27 वर्षों से चले आ रहे विवाद में अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि बिक्री कर की देय राशि के प्रतिशत के आधार पर लगाए गए अतिरिक्त कर का स्वरूप भी बिक्री कर का ही होगा। साथ ही अदालत ने यह संदेश भी दिया है कि किसी कर की वैधता उसके नाम से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक प्रकृति और आधार से तय होगी।
