नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर देश की राजनीति में विवाद लगातार गहराता जा रहा है। चुनाव आयोग के भीतर फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज कराई गई आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई और गिरफ्तारी तक की मांग उठाई है। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने भी गिरफ्तारी की मांग की है।
लेकिन इस राजनीतिक मांग के साथ एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल भी सामने आया है—क्या मौजूदा कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके आधिकारिक कामकाज से जुड़े किसी मामले में गिरफ्तार किया जा सकता है?
इस सवाल का जवाब समझने के लिए Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 की धारा 16 को देखना जरूरी है। यह कानून 28 दिसंबर 2023 को अधिनियमित हुआ और 2 फरवरी 2024 से लागू हुआ। इसकी धारा 16 मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के लिए आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े मामलों में विशेष कानूनी सुरक्षा का प्रावधान करती है।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
23 सितंबर 2026 को द इंडियन एक्सप्रेस की एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और निर्देशों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराईं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने आरोप लगाया कि कुछ फैसले या आदेश उनकी जानकारी अथवा आवश्यक सहमति के बिना लिए गए।
इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता नाम हटाने, चुनावी डेटा और चुनाव आयोग की डिजिटल व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस्तेमाल की गई प्रक्रिया को “अनधिकृत” या “अवैध” बताया। हालांकि इन आरोपों और आपत्तियों पर चुनाव आयोग की ओर से रिपोर्ट में विस्तृत प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं कराई गई थी।
यहां यह समझना भी जरूरी है कि चुनाव आयोग तीन सदस्यों वाली संवैधानिक संस्था है और कानून में उसके कामकाज के लिए बहुमत का प्रावधान मौजूद है। 2023 के कानून की धारा 18 के अनुसार, आयोग का कामकाज जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए और यदि सदस्यों में मतभेद हो तो मामला बहुमत की राय के अनुसार तय किया जाता है।
फिर विपक्ष गिरफ्तारी की मांग क्यों कर रहा है?
रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। अरविंद केजरीवाल ने सार्वजनिक रूप से ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी और हाल के चुनावों को रद्द करने जैसी मांगें उठाईं।
हालांकि, किसी राजनीतिक नेता की गिरफ्तारी की मांग और उसके कानूनी रूप से लागू होने की स्थिति दो अलग-अलग बातें हैं। किसी संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के लिए संबंधित कानून और संवैधानिक प्रावधानों को देखना आवश्यक होता है।
यहीं पर 2023 के कानून की धारा 16 महत्वपूर्ण हो जाती है।
क्या कहती है धारा 16?
सरकार द्वारा बनाए गए 2023 के कानून में धारा 16 का शीर्षक है—“Protection of Chief Election Commissioner and other Election Commissioners”।
इस धारा के अनुसार, किसी मौजूदा या पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त अथवा चुनाव आयुक्त के खिलाफ उस काम, कृत्य या कथन के संबंध में कोई सिविल या क्रिमिनल कार्यवाही अदालत में शुरू या जारी नहीं रखी जा सकती, यदि वह कार्य उस व्यक्ति द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन के दौरान किया गया हो या आधिकारिक कर्तव्य निभाने का दावा करते हुए किया गया हो।
यानी कानून का फोकस आधिकारिक कार्यों से जुड़ी न्यायिक कार्यवाही पर है।
इसे सीधे तौर पर यह कहना कि “CEC को किसी भी परिस्थिति में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता”, कानून के शब्दों से आगे निकल जाना होगा। धारा 16 में “arrest” शब्द अलग से नहीं लिखा गया है। कानून मुख्य रूप से यह कहता है कि निर्धारित परिस्थितियों में अदालत किसी सिविल या आपराधिक कार्यवाही को entertain या continue नहीं करेगी। इसीलिए गिरफ्तारी के सवाल को धारा 16 के वास्तविक शब्दों और उसके न्यायिक अर्थ के संदर्भ में समझना जरूरी है।
सुरक्षा सिर्फ आधिकारिक काम से जुड़े मामलों में है
धारा 16 की सबसे महत्वपूर्ण सीमा यही है कि सुरक्षा हर प्रकार के व्यक्तिगत कृत्य के लिए नहीं लिखी गई है। इसमें स्पष्ट रूप से आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के दौरान किए गए “act, thing or word” की बात की गई है।
इसका अर्थ यह है कि यदि किसी विवादित निर्णय या कार्रवाई को CEC या EC ने अपने संवैधानिक/आधिकारिक कार्य के हिस्से के रूप में किया है, तो उस पर धारा 16 लागू होने का सवाल उठ सकता है। लेकिन किसी ऐसे कथित कृत्य को केवल इसलिए आधिकारिक कार्य नहीं माना जा सकता कि वह व्यक्ति चुनाव आयुक्त के पद पर है। किसी विशेष मामले में धारा 16 लागू होती है या नहीं, यह संबंधित तथ्यों और न्यायिक व्याख्या पर निर्भर करेगा।
2023 के कानून में नियुक्ति व्यवस्था भी बदली
CEC और EC की नियुक्ति से जुड़ा 2023 का कानून केवल सुरक्षा प्रावधान के कारण चर्चा में नहीं है। नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर भी इस कानून पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
2023 के कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने Anoop Baranwal मामले में संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की व्यवस्था लागू की थी।
2023 का कानून बनने के बाद मुख्य न्यायाधीश चयन समिति के सदस्य नहीं रहे। इसी बदलाव को लेकर याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक चुनौती दी है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
23 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ में इस मुद्दे पर मतभेद सामने आया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बड़ी पीठ के पास भेजे जाने के सवाल पर अलग-अलग राय दी। इसके बाद मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा गया, ताकि बड़ी पीठ/संविधान पीठ के गठन पर निर्णय हो सके।
संविधान पीठ में कम से कम पांच न्यायाधीश होते हैं। इसलिए अब इस मामले में आगे की सुनवाई बड़ी पीठ के गठन और उसके बाद होने वाली न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
क्या चुनाव आयोग अकेले CEC चलाते हैं?
यह सवाल भी मौजूदा विवाद में महत्वपूर्ण है। कानून के अनुसार चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संस्था है। तीन सदस्यों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद होने की स्थिति में बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में भी 2023 के कानून की धारा 18 का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि आयोग का काम जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होना चाहिए और मतभेद की स्थिति में बहुमत की राय लागू होती है।
इसलिए केवल यह तथ्य कि दो आयुक्तों ने किसी फैसले पर आपत्ति दर्ज कराई, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि आयोग का निर्णय कानूनी रूप से अवैध हो गया। इसके लिए यह देखना होगा कि संबंधित निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिया गया, क्या वैधानिक अधिकार का इस्तेमाल हुआ और क्या निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया।
धारा 16 पर आगे क्या सवाल उठ सकते हैं?
मौजूदा विवाद में असली कानूनी प्रश्न यह है कि “official duty or function” की सीमा कितनी व्यापक है। यदि किसी निर्णय को आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा माना जाता है तो धारा 16 सुरक्षा प्रदान कर सकती है। लेकिन यदि किसी कार्रवाई को आधिकारिक कार्य की सीमा से बाहर माना जाता है, तो कानूनी स्थिति अलग हो सकती है।
इसके अलावा 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता पर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। बड़ी पीठ यह देख सकती है कि नियुक्ति प्रक्रिया, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और अन्य संबंधित प्रावधान संविधान की मूल संरचना तथा संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप हैं या नहीं। अभी इस पर अंतिम न्यायिक फैसला नहीं आया है।
गिरफ्तारी की मांग बनाम कानूनी प्रक्रिया
इस पूरे विवाद में एक बात स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है—राजनीतिक मांग अपने आप में गिरफ्तारी का कानूनी आधार नहीं बनती। किसी संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के लिए कानून के तहत वैध आधार और निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया जरूरी होती है।
फिलहाल उपलब्ध कानून में धारा 16 मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े कार्यों के संबंध में सिविल और क्रिमिनल कार्यवाही से विशेष सुरक्षा देती है। लेकिन इसे हर परिस्थिति में “पूर्ण गिरफ्तारी से छूट” कहना सही नहीं होगा, क्योंकि धारा 16 के शब्द मुख्य रूप से न्यायालय द्वारा सिविल या क्रिमिनल proceedings को entertain या continue करने पर केंद्रित हैं।
अब इस पूरे विवाद की अगली बड़ी कड़ी सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ की सुनवाई होगी। वहां 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, नियुक्ति प्रक्रिया और कानून में दी गई सुरक्षा जैसे सवालों पर महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या सामने आ सकती है। तब तक किसी आरोप या राजनीतिक मांग को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष मानना उचित नहीं होगा।
