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चुनाव आयोग के अंदर ही उठे सवाल! दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने में 14 बार जताई आपत्ति, SIR और वोटर लिस्ट पर घमासान

The Hill India News
Last updated: September 23, 2026 5:18 am
The Hill India News
Published: September 23, 2026
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नई दिल्ली: देशभर में मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर पहले से जारी राजनीतिक बहस के बीच चुनाव आयोग के भीतर से सामने आई एक रिपोर्ट ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, चुनावी डेटा की सुरक्षा तथा आयोग के आईटी सिस्टम के संचालन से जुड़ी थीं।

मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा दो चुनाव आयुक्त होते हैं। आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर वर्तमान में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त तथा सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

10 महीने में 14 बार दर्ज हुई आपत्ति

इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के मुताबिक, संधू और जोशी ने नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 मौकों पर लिखित रूप से अपनी आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से एक दिन चार अलग-अलग आपत्तियां दर्ज की गई थीं। दोनों आयुक्तों की शिकायतों का एक प्रमुख हिस्सा यह था कि आयोग के नाम से लिए जा रहे कुछ फैसलों और जारी किए जा रहे आदेशों के बारे में उन्हें पर्याप्त जानकारी या परामर्श नहीं दिया गया।

इन आपत्तियों का दायरा केवल किसी एक प्रशासनिक आदेश तक सीमित नहीं बताया गया है। इनमें नए मतदाताओं का पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाना और नाम बहाल करना, SIR प्रक्रिया के दौरान अपील, चुनावी रोल के डिजिटल डेटाबेस की सुरक्षा और आईटी सिस्टम के नियंत्रण जैसे मुद्दे शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने मतदाता सूची के डेटा को दिल्ली में अधिक केंद्रीकृत किए जाने पर भी सवाल उठाए।

सबसे बड़ा विवाद Form-6 को लेकर

पूरे विवाद में Form-6 का मामला खास तौर पर चर्चा में है। Form-6 वह वैधानिक फॉर्म है, जिसके जरिए कोई पात्र व्यक्ति मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन करता है।

रिपोर्ट के अनुसार, SIR से संबंधित प्रक्रिया के दौरान Form-6 में एक नया घोषणा-पत्र जोड़ा गया। इसमें आवेदक को यह बताने के विकल्प दिए गए कि उसका नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में था या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम उस सूची में था या इनमें से किसी का भी नाम नहीं था।

विवेक जोशी ने 16 मई को इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा था कि Form-6 और Form-8 वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित फॉर्म हैं और इनमें बदलाव के लिए संबंधित नियमों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। रिपोर्ट के मुताबिक, सुखबीर सिंह संधू ने 19 मई को जोशी की इस आपत्ति से सहमति जताई।

इसके बाद भी ऑनलाइन Form-6 में यह बदलाव दिखाई दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, 13 अगस्त को संधू ने फिर इस मुद्दे को उठाया और इसे हटाने की मांग की। उनकी चिंता यह थी कि इस तरह की अतिरिक्त जानकारी खासकर पहली बार वोट देने वाले युवाओं के लिए परेशानी पैदा कर सकती है।

वोटर डेटा के केंद्रीकरण पर भी सवाल

दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां केवल नए मतदाता फॉर्म तक सीमित नहीं थीं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनावी रोल के डिजिटल डेटाबेस और उसे संचालित करने वाले आईटी सिस्टम को लेकर भी सवाल उठाए गए।

रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने चिंता जताई कि चुनावी रोल से जुड़े कुछ तकनीकी अधिकार दिल्ली स्थित केंद्रीय स्तर पर अधिक केंद्रित हो रहे हैं। उनका सवाल था कि क्या इससे जमीनी स्तर पर काम करने वाले Electoral Registration Officers (EROs) और अन्य वैधानिक अधिकारियों की भूमिका और अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

मई 2026 में विवेक जोशी ने कथित तौर पर चुनावी रोल डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीकरण को लेकर स्वतंत्र ऑडिट की आवश्यकता बताई। रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें किसी IIT विशेषज्ञ को शामिल करने का सुझाव भी दिया गया था। संधू ने बाद में इस ऑडिट के प्रस्ताव का समर्थन किया।

गोवा में 97 मतदाताओं का मामला भी उठा

रिपोर्ट में गोवा का एक मामला भी सामने आया है। इसके मुताबिक, कुछ मतदाताओं की जानकारी में कथित “logical discrepancies” मिलने के बाद Electoral Registration Officers ने जांच की। रिपोर्ट के अनुसार, 97 मतदाताओं को अधिकारियों ने पात्र पाया, लेकिन सॉफ्टवेयर में उनकी स्थिति को समय पर अपडेट करने की सुविधा नहीं होने के कारण उनके नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सके।

यही मामला चुनावी प्रक्रिया में तकनीकी सिस्टम और वैधानिक अधिकारियों के अधिकारों के बीच तालमेल का सवाल उठाता है। अगर कोई अधिकारी किसी मतदाता को नियमों के तहत पात्र मानता है, तो उस निर्णय को डिजिटल सिस्टम में दर्ज करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है—यह सवाल भी इस विवाद का हिस्सा बना है।

कैबिनेट सचिव तक पहुंचा मामला

विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कथित तौर पर कुछ प्रशासनिक और आईटी से जुड़े मामलों को लेकर कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को भी अलग-अलग पत्र लिखे।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, जुलाई के अंत में चुनाव आयोग के भीतर कार्य-विभाजन से जुड़े एक आदेश को लेकर दोनों आयुक्तों ने आपत्ति जताई। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों ने अलग-अलग पत्रों के जरिए कैबिनेट सचिव को अपनी चिंताओं से अवगत कराया। बाद में दोनों आयुक्तों ने उस कार्य-विभाजन आदेश को हटाने की कार्रवाई भी की और पहले की व्यवस्था जारी रखने को कहा।

यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे विवाद केवल मतदाता सूची की तकनीकी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आयोग के अंदर काम के बंटवारे और निर्णय लेने की प्रक्रिया तक पहुंच गया।

चुनाव आयोग का पक्ष क्या है?

इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया में चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने कहा है कि आयोग में रोजाना बड़ी संख्या में आदेश जारी होते हैं और नियमों के अनुसार जहां सदस्यों के बीच मतभेद हो, वहां बहुमत के आधार पर फैसला लिया जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ observations जरूर रखे थे, लेकिन उन्होंने किसी फैसले पर औपचारिक असहमति दर्ज नहीं की थी।

यानी, एक तरफ रिपोर्ट में दोनों आयुक्तों द्वारा बार-बार लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात सामने आई है, जबकि आयोग से जुड़े सूत्र इन आपत्तियों को अंतिम रूप से फैसलों पर असहमति या आयोग में किसी संवैधानिक गतिरोध के रूप में नहीं देखते। यह अंतर इस पूरे विवाद को समझने में महत्वपूर्ण है।

SIR के बीच क्यों बढ़ी चिंता?

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब चुनाव आयोग की Special Intensive Revision यानी SIR प्रक्रिया देश के कई हिस्सों में चल रही है। यह प्रक्रिया जून 2025 में बिहार से शुरू हुई थी और बाद में अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ाई गई। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट वोटर रोल से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए थे। हालांकि, ड्राफ्ट सूची से नाम हटना अंतिम रूप से मतदान के अधिकार के समाप्त होने के बराबर नहीं है, क्योंकि प्रक्रिया में दावे और आपत्तियां दर्ज कराने के प्रावधान होते हैं।

इसीलिए नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और नाम बहाल करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और वैधानिक प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का महत्व बढ़ जाता है।

कांग्रेस और शिवसेना ने साधा निशाना

रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि यदि रिपोर्ट में सामने आई बातें सही हैं, तो यह चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और संस्थागत विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। उन्होंने आयोग के कामकाज और निर्णयों की वैधानिकता पर भी सवाल उठाए।

कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा CEC के बीच हुए पत्राचार को सार्वजनिक करने की मांग की। वहीं शिवसेना सांसद संजय राउत ने भी इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया दी और ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए।

इन नेताओं के आरोप राजनीतिक दावे हैं; इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग से नहीं हुई है। इसलिए इन्हें आरोप और राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

असल सवाल अब निर्णय प्रक्रिया पर

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर फैसले किस तरह लिए जा रहे हैं और सभी सदस्यों को किस स्तर तक निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाता है।

कानून के तहत आयोग के कामकाज में जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति का प्रयास किया जाता है और मतभेद होने पर बहुमत की व्यवस्था है। लेकिन वर्तमान विवाद में दोनों चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियां इस बात पर केंद्रित बताई गई हैं कि कुछ मामलों में उन्हें फैसले या प्रशासनिक कदमों की जानकारी ही पर्याप्त रूप से नहीं मिली।

यही वजह है कि यह मामला केवल कांग्रेस बनाम चुनाव आयोग या सरकार बनाम विपक्ष का राजनीतिक विवाद नहीं रह जाता। इसके केंद्र में चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची की विश्वसनीयता, डिजिटल सिस्टम की भूमिका और संवैधानिक संस्था के भीतर निर्णय लेने की पारदर्शिता जैसे सवाल हैं।

फिलहाल, सामने आई रिपोर्ट और चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों के पक्ष में अंतर मौजूद है। ऐसे में पूरे मामले की अंतिम तस्वीर संबंधित पत्राचार, आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड और आगे आने वाले स्पष्टीकरणों से ही स्पष्ट होगी। खास तौर पर यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 14 आपत्तियों में से कितनी केवल सुझाव या observations थीं और किन मामलों में औपचारिक निर्णय प्रक्रिया पर वास्तविक मतभेद दर्ज हुआ था।

मतदाता सूची किसी भी चुनाव की बुनियादी नींव होती है। इसलिए इस विवाद का सबसे अहम पहलू यही है कि पात्र मतदाता का नाम सही तरीके से दर्ज हो, अपात्र नामों पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो और पूरी प्रक्रिया में आयोग के भीतर तथा जनता के सामने पर्याप्त पारदर्शिता बनी रहे।

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