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क्या बदल जाएगा दुनिया का नक्शा? संयुक्त राष्ट्र में आज ऐतिहासिक वोटिंग, अफ्रीका के असली आकार को लेकर उठी बड़ी बहस

The Hill India News
Last updated: September 4, 2026 9:55 am
The Hill India News
Published: September 4, 2026
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नई दिल्ली। दुनिया को हम जिस नक्शे के जरिए बचपन से देखते और समझते आए हैं, क्या वही नक्शा दुनिया की वास्तविक तस्वीर नहीं दिखाता? क्या नक्शे पर दिखाई देने वाले देशों और महाद्वीपों का आकार हमारी सोच को भी प्रभावित करता है? इन सवालों के बीच शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक बेहद महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर वोटिंग होने जा रही है। प्रस्ताव का उद्देश्य दुनिया में लंबे समय से इस्तेमाल किए जा रहे पारंपरिक मर्केटर नक्शे के विकल्प को बढ़ावा देना है, ताकि दुनिया के महाद्वीपों और देशों का आकार उनकी वास्तविक भौगोलिक स्थिति के अधिक करीब दिखाई दे।

Contents
500 साल पुराना मर्केटर नक्शा आज भी क्यों है इतना लोकप्रिय?अफ्रीका और ग्रीनलैंड का उदाहरण समझिए‘Correct the Map’ अभियान ने बढ़ाई बहसक्या नक्शों में भी दिखाई देती है उपनिवेशवादी सोच?स्कूलों से लेकर मोबाइल और कंप्यूटर तक असरक्या मर्केटर नक्शा पूरी तरह गलत है?दुनिया का नक्शा बदलेगा या सिर्फ नजरिया?

यह मुद्दा केवल नक्शे को बदलने या नया नक्शा अपनाने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे भूगोल, इतिहास, शिक्षा, तकनीक और यहां तक कि औपनिवेशिक सोच को लेकर भी एक बड़ी बहस छिड़ी हुई है। प्रस्ताव को अफ्रीकी देश टोगो ने आगे बढ़ाया है और अफ्रीकी संघ के 55 सदस्य देशों सहित कई देशों ने इसका समर्थन किया है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस तरह के प्रस्ताव आम तौर पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते, लेकिन प्रस्ताव के पारित होने की स्थिति में दुनिया में नक्शों को देखने और इस्तेमाल करने के तरीके पर इसका प्रतीकात्मक और व्यावहारिक असर पड़ सकता है।

500 साल पुराना मर्केटर नक्शा आज भी क्यों है इतना लोकप्रिय?

मर्केटर नक्शे का इतिहास करीब 500 साल पुराना है। इसे 1569 में फ्लेमिश नक्शानवीस जेरार्डस मर्केटर ने तैयार किया था। उस समय इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया के समुद्री रास्तों को समझने और नाविकों को दिशा तय करने में मदद करना था। समुद्री यात्राओं के लिए यह नक्शा बेहद उपयोगी साबित हुआ, क्योंकि इसमें दिशा और समुद्री मार्गों को इस तरह प्रस्तुत किया गया कि नाविकों के लिए यात्रा की योजना बनाना आसान हो गया।

समस्या यह है कि पृथ्वी गोलाकार है, जबकि नक्शा सपाट होता है। गोल पृथ्वी की सतह को सपाट कागज पर उतारने के लिए किसी न किसी प्रकार का भौगोलिक विकृति पैदा होना लगभग तय है। मर्केटर प्रक्षेपण में जैसे-जैसे कोई स्थान भूमध्य रेखा से दूर ध्रुवों की ओर जाता है, उसका आकार नक्शे पर वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना में काफी बड़ा दिखाई देने लगता है।

यही कारण है कि आज इस्तेमाल होने वाले कई मर्केटर नक्शों में यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ग्रीनलैंड जैसे उत्तरी गोलार्ध के इलाके अपने वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना में काफी बड़े दिखाई देते हैं, जबकि भूमध्य रेखा के आसपास स्थित अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे विशाल भूभाग अपेक्षाकृत छोटे नजर आते हैं।

अफ्रीका और ग्रीनलैंड का उदाहरण समझिए

मर्केटर नक्शे की सबसे ज्यादा चर्चा होने वाली मिसाल अफ्रीका और ग्रीनलैंड की है। नक्शे पर दोनों का आकार लगभग एक जैसा दिखाई दे सकता है। लेकिन वास्तविकता बिल्कुल अलग है। अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना अधिक है।

यानी जिस अफ्रीकी महाद्वीप में दर्जनों देश बसे हुए हैं और जो दुनिया के सबसे बड़े महाद्वीपों में शामिल है, वह पारंपरिक नक्शे पर अपनी वास्तविक विशालता से काफी छोटा दिखाई देता है। दूसरी तरफ ग्रीनलैंड, जो भौगोलिक रूप से विशाल जरूर है लेकिन अफ्रीका के मुकाबले बहुत छोटा है, नक्शे पर जरूरत से कहीं बड़ा नजर आता है।

यही अंतर इस बहस का सबसे बड़ा आधार बन गया है। समर्थकों का कहना है कि अगर नक्शे का उद्देश्य दुनिया को समझाना है तो लोगों को देशों और महाद्वीपों के आकार की वास्तविक तस्वीर भी दिखाई जानी चाहिए।

‘Correct the Map’ अभियान ने बढ़ाई बहस

मर्केटर नक्शे को लेकर पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जागरूकता अभियान भी चलाए गए हैं। #CorrectTheMap नाम से चल रहे अभियान का उद्देश्य लोगों को नक्शों में मौजूद क्षेत्रफल संबंधी विकृतियों के बारे में जागरूक करना है।

अभियान से जुड़े लोगों का तर्क है कि अफ्रीका का वास्तविक आकार इतना बड़ा है कि अगर अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मैक्सिको और यूरोप के बड़े हिस्से को एक साथ रखा जाए, तब भी अफ्रीका के भीतर काफी जगह बच सकती है। इसके बावजूद दुनिया के पारंपरिक नक्शे में अफ्रीका अपेक्षाकृत छोटा दिखाई देता है।

अभियान ने नक्शों को केवल भौगोलिक जानकारी का माध्यम मानने के बजाय उन्हें लोगों की सोच को प्रभावित करने वाला साधन भी बताया है। रिपोर्टों के अनुसार इस अभियान को हजारों लोगों का समर्थन मिल चुका है और अफ्रीकी संघ ने भी इसके पक्ष में आवाज उठाई है।

क्या नक्शों में भी दिखाई देती है उपनिवेशवादी सोच?

इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प और संवेदनशील पहलू है—‘कार्टोग्राफिक कॉलोनियलिज्म’, यानी नक्शों के जरिए उपनिवेशवादी नजरिए के प्रभाव की चर्चा।

इतिहास और भूगोल के कई जानकारों का तर्क है कि नक्शे कभी भी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होते। नक्शा बनाने वाला व्यक्ति यह तय करता है कि दुनिया को किस तरह प्रस्तुत किया जाए, किस चीज को प्रमुखता दी जाए और किस तरह की भौगोलिक जानकारी लोगों के सामने रखी जाए।

मर्केटर नक्शा उस दौर में तैयार किया गया था जब यूरोपीय समुद्री शक्तियां दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तेजी से विस्तार कर रही थीं। हालांकि मर्केटर प्रक्षेपण को सीधे तौर पर औपनिवेशिक प्रचार का उपकरण कहना इतिहास और मानचित्र-विज्ञान की जटिलताओं को सरल बना देना होगा, लेकिन आलोचकों का कहना है कि समय के साथ इसका व्यापक इस्तेमाल दुनिया को देखने के एक ऐसे नजरिए को मजबूत करता रहा, जिसमें उत्तरी गोलार्ध के देश नक्शे पर अधिक प्रभावशाली दिखाई देते हैं।

विशेष रूप से अफ्रीका और ग्लोबल साउथ के अन्य हिस्सों के आकार के छोटे दिखाई देने को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।

स्कूलों से लेकर मोबाइल और कंप्यूटर तक असर

अगर संयुक्त राष्ट्र महासभा का प्रस्ताव पारित होता है तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि अगले दिन से दुनिया के सभी नक्शे बदल जाएंगे। संयुक्त राष्ट्र का ऐसा प्रस्ताव आम तौर पर देशों और संस्थाओं पर सीधे कानूनी रूप से लागू नहीं होता। फिर भी यह बहस दुनिया के नक्शों को लेकर नई दिशा तय कर सकती है।

आज नक्शों का इस्तेमाल केवल स्कूल की भूगोल की किताबों तक सीमित नहीं है। मोबाइल फोन, कंप्यूटर, डिजिटल मैप, ऑनलाइन शिक्षा, सरकारी दस्तावेज, मौसम की जानकारी, विमानन, समुद्री परिवहन और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के कामकाज में अलग-अलग प्रकार के मानचित्रों का इस्तेमाल होता है।

ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या भविष्य में क्षेत्रफल को सही तरीके से दिखाने वाले नक्शों को शिक्षा और डिजिटल तकनीक में अधिक महत्व दिया जाना चाहिए?

क्या मर्केटर नक्शा पूरी तरह गलत है?

यह समझना भी जरूरी है कि मर्केटर नक्शा पूरी तरह ‘गलत’ नहीं है। इसे मूल रूप से एक खास उद्देश्य के लिए बनाया गया था और समुद्री नेविगेशन के क्षेत्र में इसकी उपयोगिता ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रही है।

समस्या तब पैदा होती है जब इस नक्शे को दुनिया के देशों और महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए ऐसे अन्य मानचित्र प्रक्षेपण उपलब्ध हैं जो क्षेत्रफल को ज्यादा सही तरीके से प्रदर्शित करते हैं।

यानी बहस इस बात पर नहीं है कि मर्केटर नक्शा बेकार है, बल्कि सवाल यह है कि क्या एक ऐसे नक्शे को दुनिया की सामान्य तस्वीर के रूप में लगातार इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जिसमें क्षेत्रफल की इतनी बड़ी विकृति मौजूद है।

दुनिया का नक्शा बदलेगा या सिर्फ नजरिया?

संयुक्त राष्ट्र में होने वाली वोटिंग को इसी व्यापक बहस के संदर्भ में देखा जा रहा है। प्रस्ताव पारित होने की स्थिति में दुनिया का नक्शा तत्काल और पूरी तरह बदल जाएगा, ऐसा कहना सही नहीं होगा। लेकिन इससे नक्शों को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चा जरूर तेज हो सकती है।

अफ्रीकी देशों के लिए यह मुद्दा केवल तकनीकी या भौगोलिक सुधार का विषय नहीं है। इसके साथ महाद्वीप की वास्तविक विशालता, वैश्विक पहचान और लंबे समय से चले आ रहे पश्चिम-केंद्रित नजरिए को चुनौती देने का सवाल भी जुड़ा है।

एक नक्शा दुनिया को छोटा-बड़ा नहीं करता, लेकिन वह यह जरूर तय कर सकता है कि दुनिया को देखने वाला व्यक्ति उसे किस तरह समझे। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र में होने वाली यह वोटिंग केवल एक नक्शे के भविष्य का फैसला नहीं मानी जा रही, बल्कि दुनिया को दुनिया की वास्तविक भौगोलिक तस्वीर में देखने की कोशिश के रूप में भी देखी जा रही है।

अगर यह पहल आगे बढ़ती है तो आने वाले वर्षों में स्कूलों की किताबों, डिजिटल मैप और वैश्विक शिक्षा सामग्री में दुनिया को दिखाने के तरीके पर इसका असर देखने को मिल सकता है। ऐसे में शुक्रवार की वोटिंग का महत्व केवल संयुक्त राष्ट्र के सभागार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह सवाल भी दुनिया के सामने रखेगी कि हम जिस नक्शे को देखकर दुनिया को समझते हैं, क्या वह वास्तव में दुनिया की सही तस्वीर है?

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