देहरादून: उत्तराखंड में नर्सिंग भर्ती परीक्षा को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। हाल ही में आयोजित नर्सिंग भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और नौकरी दिलाने के नाम पर बड़े पैमाने पर पैसों के लेन-देन के आरोपों ने बेरोजगार युवाओं की चिंता बढ़ा दी है। अब इस मामले में नर्सिंग एकता मंच और बेरोजगार संघ फ्रंटफुट पर आ गए हैं और सरकार से पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
आंदोलनकारियों ने सरकार को तीन दिन का अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि यदि निर्धारित समय के भीतर मामले की जांच को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो नर्सिंग अभ्यर्थी, वरिष्ठ अभ्यर्थी और विभिन्न संगठनों के सदस्य मिलकर बड़े आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे। संगठनों की मांग है कि भर्ती प्रक्रिया और कथित पैसों के लेन-देन के आरोपों की जांच एसटीएफ या एसआईटी जैसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए, ताकि पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सके।
हालांकि, यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि भर्ती में अनियमितता और पैसों के लेन-देन से जुड़े आरोप फिलहाल आंदोलनकारियों के दावों पर आधारित हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। मामले में किसी व्यक्ति, अधिकारी या भर्ती प्रक्रिया की संलिप्तता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
25 जून, 25 जुलाई और 26 जुलाई की परीक्षाओं पर उठे सवाल
नर्सिंग भर्ती को लेकर विवाद उस समय और बढ़ गया, जब नर्सिंग एकता मंच और बेरोजगार संघ ने संयुक्त रूप से भर्ती परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठाए। आंदोलनकारियों का कहना है कि 25 जून, 25 जुलाई और 26 जुलाई को आयोजित नर्सिंग भर्ती परीक्षाओं को लेकर पहले से ही अभ्यर्थियों के बीच कई तरह की आशंकाएं थीं।
नर्सिंग एकता मंच के अध्यक्ष नवल पुंडीर का कहना है कि संगठन लंबे समय से वर्षवार भर्ती की मांग को लेकर आंदोलन कर रहा है। उनका आरोप है कि बार-बार अपनी मांगों और शिकायतों को सरकार तथा संबंधित विभागों के सामने रखने के बावजूद उनका संतोषजनक समाधान नहीं किया गया।
आंदोलनकारी अभ्यर्थियों का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे, लेकिन उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। अब कथित लेन-देन से जुड़े आरोप सामने आने के बाद मामला और गंभीर हो गया है।
32 लाख की मांग और 35 लाख के कथित लेन-देन का दावा
बेरोजगार संघ से जुड़े राम कंडवाल और नर्सिंग एकता मंच के अध्यक्ष नवल पुंडीर ने संयुक्त रूप से दावा किया है कि उनके पास कुछ ऐसे साक्ष्य आए हैं, जिनसे नौकरी दिलाने के नाम पर कथित रूप से बड़े पैमाने पर पैसों के लेन-देन की बात सामने आती है।
आंदोलनकारियों के अनुसार, चारू चंद्र जोशी नाम के एक व्यक्ति पर एक महिला अभ्यर्थी से नौकरी दिलाने के नाम पर करीब 32 लाख रुपये की मांग करने का आरोप लगाया गया है। अभ्यर्थियों का दावा है कि कथित रूप से रकम अलग-अलग खातों के माध्यम से भेजी गई और कुल लेन-देन लगभग 35 लाख रुपये तक का बताया जा रहा है।
आंदोलनकारियों ने यह भी आरोप लगाया है कि संबंधित महिला अभ्यर्थी ने कथित भुगतान की व्यवस्था करने के लिए अपना सोना और अन्य सामान तक गिरवी रखा। यदि जांच में इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह मामला न केवल भर्ती प्रक्रिया बल्कि बेरोजगार युवाओं की मजबूरी का भी गंभीर उदाहरण बन सकता है।
हालांकि, इस पूरे प्रकरण में यह ध्यान रखना जरूरी है कि अभी तक इन आरोपों की किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी या सरकारी जांच में पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए संबंधित व्यक्तियों या किसी भी संस्था को दोषी ठहराने से पहले आधिकारिक जांच के निष्कर्ष का इंतजार करना आवश्यक होगा।
क्या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क है?
नर्सिंग एकता मंच ने सबसे बड़ा सवाल यह उठाया है कि यदि किसी एक अभ्यर्थी से नौकरी दिलाने के नाम पर लाखों रुपये की कथित मांग की गई, तो क्या यह किसी एक व्यक्ति का मामला है या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क सक्रिय है?
आंदोलनकारियों का कहना है कि इस एंगल से भी मामले की गहराई से जांच होनी चाहिए। उनकी मांग है कि जांच केवल कथित लेन-देन तक सीमित न रहे, बल्कि यह भी पता लगाया जाए कि भर्ती प्रक्रिया से जुड़े किसी व्यक्ति, अधिकारी या अन्य माध्यम की इसमें कोई भूमिका तो नहीं थी।
बेरोजगार संघ का कहना है कि युवाओं के भविष्य से जुड़ी भर्ती परीक्षाओं में किसी भी प्रकार की अनियमितता का संदेह भी गंभीर चिंता का विषय है। ऐसे मामलों में केवल सामान्य जांच के बजाय एक स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की जरूरत है, ताकि जांच निष्पक्ष हो और अभ्यर्थियों का भरोसा कायम रहे।
पहले भी सरकार को दी गई थीं शिकायतें
आंदोलनकारियों के अनुसार, नर्सिंग भर्ती को लेकर उनकी आशंकाएं नई नहीं हैं। संगठन का दावा है कि उन्होंने भर्ती परीक्षा से पहले और उसके दौरान भी सरकार तथा संबंधित अधिकारियों को अपनी चिंताओं से अवगत कराया था।
उनका आरोप है कि कुछ मुद्दों पर उन्हें लिखित आश्वासन भी मिला था, लेकिन बाद में उन शिकायतों और मांगों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। इसके बावजूद भर्ती परीक्षा आयोजित कर दी गई।
अभ्यर्थियों ने करीब दो हजार उम्मीदवारों द्वारा आवेदन नहीं किए जाने या भर्ती प्रक्रिया से जुड़े अन्य मुद्दों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इन बिंदुओं पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
अब संगठनों की मांग है कि भर्ती से जुड़े सभी विवादित बिंदुओं की एक साथ जांच हो और सरकार स्पष्ट करे कि शिकायतों के आधार पर अब तक क्या कार्रवाई की गई है।
STF या SIT जांच की मांग
नर्सिंग एकता मंच और बेरोजगार संघ ने प्रदेश सरकार और स्वास्थ्य विभाग से मांग की है कि पूरे मामले की जांच के लिए स्पेशल टास्क फोर्स यानी STF या विशेष जांच दल यानी SIT का गठन किया जाए।
उनका कहना है कि यदि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है तो स्वतंत्र जांच से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और अभ्यर्थियों के बीच फैली आशंकाएं भी खत्म हो जाएंगी। वहीं यदि जांच में किसी तरह की गड़बड़ी सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
आंदोलनकारियों ने यह भी मांग की है कि जांच पूरी होने तक भर्ती परीक्षा और आगे की प्रक्रिया पर आवश्यक निर्णय लिया जाए। उन्होंने परीक्षा को निरस्त करने पर विचार करने की भी मांग उठाई है, हालांकि इस संबंध में अंतिम निर्णय सरकार और जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर ही लिया जा सकता है।
तीन दिन का अल्टीमेटम, नहीं हुई कार्रवाई तो बड़ा आंदोलन
नर्सिंग एकता मंच और बेरोजगार संघ ने सरकार को तीन दिन का समय दिया है। संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि इस अवधि के भीतर जांच को लेकर कोई ठोस और स्पष्ट कार्रवाई नहीं की गई, तो आंदोलन को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाया जाएगा।
आंदोलनकारियों का कहना है कि नर्सिंग अभ्यर्थी, वरिष्ठ अभ्यर्थी और अन्य समर्थनकारी संगठन एकजुट होकर सड़कों पर उतर सकते हैं। इससे देहरादून समेत प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी भर्ती प्रक्रिया के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज होने की संभावना है।
उत्तराखंड में बेरोजगारी और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े मुद्दे पहले से ही युवाओं के लिए बेहद संवेदनशील रहे हैं। ऐसे में नर्सिंग भर्ती से जुड़े कथित लेन-देन के आरोपों ने युवाओं के बीच नई चिंता पैदा कर दी है।
स्वास्थ्य मंत्री से भी अलग जांच टीम बनाने की मांग
आंदोलनकारियों ने स्वास्थ्य मंत्री से भी मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए अलग जांच टीम गठित की जाए। उनका कहना है कि भर्ती परीक्षाओं में कथित रूप से सक्रिय बिचौलियों और ऐसे तत्वों पर सख्त नजर रखना सरकार की जिम्मेदारी है।
संगठनों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति नौकरी दिलाने का झांसा देकर बेरोजगार युवाओं से पैसे वसूलने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही यह भी जांचा जाना चाहिए कि क्या वह व्यक्ति केवल युवाओं को ठगने का प्रयास कर रहा था या वास्तव में उसके पास भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी किसी प्रकार की पहुंच या जानकारी थी।
यही कारण है कि आंदोलनकारी मामले की निष्पक्ष और गहन जांच की मांग कर रहे हैं।
युवाओं के भविष्य से जुड़ा है मामला
नर्सिंग भर्ती का मामला हजारों युवाओं के भविष्य से जुड़ा हुआ है। लंबे समय तक तैयारी करने वाले अभ्यर्थी भर्ती परीक्षा को अपने करियर का महत्वपूर्ण अवसर मानते हैं। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया को लेकर किसी भी प्रकार की अनियमितता या पैसों के लेन-देन का आरोप सामने आने से उम्मीदवारों के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं।
अभ्यर्थियों का कहना है कि वे केवल एक निष्पक्ष और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया चाहते हैं, जिसमें चयन योग्यता और परीक्षा के आधार पर हो। यदि भर्ती प्रक्रिया को लेकर उठ रहे आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है, तो इससे वास्तविक स्थिति सामने आ सकेगी और निर्दोष अभ्यर्थियों का विश्वास भी बना रहेगा।
जांच के बाद ही सामने आएगी पूरी सच्चाई
फिलहाल नर्सिंग भर्ती को लेकर राजनीतिक और सामाजिक दबाव बढ़ता नजर आ रहा है। बेरोजगार संघ और नर्सिंग एकता मंच के तीन दिन के अल्टीमेटम के बाद सरकार की प्रतिक्रिया पर सभी की नजरें टिकी हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 32 लाख रुपये की कथित मांग, करीब 35 लाख रुपये के संभावित लेन-देन और भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं से जुड़े आरोपों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए मामले की निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है।
जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित लेन-देन के पीछे वास्तविकता क्या है, संबंधित व्यक्ति की भूमिका क्या थी और क्या भर्ती प्रक्रिया से जुड़े किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की कोई संलिप्तता थी।
कुल मिलाकर, उत्तराखंड की नर्सिंग भर्ती का मामला अब केवल अभ्यर्थियों की शिकायत तक सीमित नहीं रहा है। बेरोजगार संघ और नर्सिंग एकता मंच के खुलकर सामने आने, एसटीएफ या एसआईटी जांच की मांग और बड़े आंदोलन की चेतावनी ने इस विवाद को और गंभीर बना दिया है। अब सरकार के अगले कदम और संभावित जांच से ही तय होगा कि यह मामला शांत होता है या आने वाले दिनों में उत्तराखंड में बेरोजगार युवाओं का एक और बड़ा आंदोलन देखने को मिलता है।
