नैनीताल/हरिद्वार: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने देवभूमि के हरिद्वार जिले के अंतर्गत आने वाले भगवानपुर क्षेत्र में किन्नर समाज के दो गुटों के बीच पारंपरिक कार्यक्षेत्र (जजमानी) को लेकर उपजे गंभीर विवाद पर कड़ा रुख अपनाया है. मामले की संवेदनशीलता और जान-माल के खतरे की आशंका को देखते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने स्थानीय पुलिस को याचिकाकर्ता किन्नर पक्ष को तत्काल और पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित नहीं होनी चाहिए और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए पुलिस मुस्तैद रहे.
हाईकोर्ट का सख्त रुख: SHO भगवानपुर को मिले त्वरित आदेश
मामले की सुनवाई उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ती आलोक कुमार वर्मा (या संबंधित एकलपीठ) की पीठ के समक्ष हुई. याचिकाकर्ताओं की दलीलों और उनके जीवन पर बने खतरे के दावों को गंभीरता से सुनते हुए एकलपीठ ने एसएचओ (SHO) भगवानपुर, जिला हरिद्वार को सीधे निर्देश जारी किए.
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि पुलिस प्रशासन तुरंत याचिकाकर्ताओं को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करे और यह सुनिश्चित करे कि विपक्षी गुट द्वारा उन्हें किसी भी प्रकार की शारीरिक, मानसिक या आर्थिक क्षति न पहुंचाई जाए. इसके साथ ही, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए अदालत ने विपक्षी पक्ष को भी अपनी बात रखने का मौका दिया है. यदि विपक्षीगणों को इस सुरक्षा आदेश या कार्यक्षेत्र को लेकर कोई आपत्ति है, तो वे इसे अदालत के समक्ष आधिकारिक तौर पर दर्ज करा सकते हैं.
क्या है पूरा विवाद? ‘सपना बनाम अंजलि’ गुट की कानूनी लड़ाई
अदालती दस्तावेजों और मामले के विवरण के अनुसार, यह पूरी कानूनी लड़ाई किन्नर सपना और उनके सहयोगियों द्वारा दायर की गई सुरक्षा याचिका के बाद शुरू हुई. याचिकाकर्ताओं ने अपनी अर्जी में विपक्षी गुट के प्रमुख सदस्यों—अंजलि कुमार, मोना किन्नर, कैनात किन्नर, सोनम किन्नर और शादाब का स्पष्ट रूप से नाम लेते हुए आरोप लगाया है कि इन लोगों से उनकी जान और माल को सीधा खतरा बना हुआ है.
याचिका में दावा किया गया है कि पूर्व में दोनों पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण तरीके से कार्यक्षेत्रों (पारंपरिक बधाई और जजमानी के इलाकों) का लिखित या मौखिक बंटवारा हुआ था. दोनों पक्ष अपने-अपने तय दायरे में काम कर रहे थे. लेकिन, पिछले कुछ समय से विपक्षी गुट द्वारा स्थापित नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है. याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि विपक्षी उनके तय कार्यक्षेत्र को अपना बताकर लगातार अतिक्रमण कर रहे हैं, उन्हें क्षेत्र में काम करने से रोक रहे हैं और विरोध करने पर उनके साथ गाली-गलौज व दुर्व्यवहार किया जा रहा है.
आशंका और दावे: कभी भी घट सकती है अप्रिय घटना
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष अपनी जान का डर जताते हुए कहा कि जमीनी स्तर पर तनाव इस कदर बढ़ चुका है कि दोनों पक्षों के बीच कभी भी कोई बड़ी और अप्रिय हिंसक घटना घटित हो सकती है. इसी तात्कालिक खतरे (Imminent Threat) को देखते हुए उन्होंने माननीय न्यायालय की शरण ली और सुरक्षा की गुहार लगाई.
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से एक और महत्वपूर्ण तर्क पेश किया गया. उन्होंने अदालत को बताया कि विपक्षी गुट को पूर्व में ही किसी अन्य मामले या इसी विवाद के संदर्भ में कोर्ट से सुरक्षा मिली हुई है. समानता के अधिकार और सुरक्षा के समान अवसर का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जब एक पक्ष सुरक्षित है, तो दूसरे पक्ष को भी उसी तर्ज पर पुलिस कवर मिलना चाहिए, ताकि शक्ति संतुलन बना रहे और कोई भी पक्ष कमजोर न पड़े.
विपक्षी गुट की दलील: ‘आरोप बेबुनियाद, हम समझौते का कर रहे पालन’
दूसरी ओर, न्यायालय में उपस्थित विपक्षी गुट के कानूनी प्रतिनिधियों ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया. विपक्ष की तरफ से दलील दी गई कि उनके द्वारा याचिकाकर्ताओं को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाया जा रहा है और न ही उनकी ऐसी कोई मंशा है.
विपक्षी पक्ष ने स्वीकार किया कि कार्यक्षेत्र के बंटवारे को लेकर दोनों गुटों के बीच एक समझौता हुआ था, लेकिन उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वे आज भी उस समझौते की शर्तों का पूरी तरह पालन कर रहे हैं और याचिकाकर्ताओं के अधिकार क्षेत्र वाले इलाकों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप या अतिक्रमण नहीं कर रहे हैं. विपक्ष के अनुसार, उन पर लगाए गए डराने-धमाने के आरोप निराधार हैं.
अदालत ने तय की अगली तारीख, प्रशासन अलर्ट
दोनों पक्षों की प्रारंभिक दलीलें सुनने के बाद, अदालत ने अंतरिम राहत के तौर पर सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने का आदेश तो दे दिया है, लेकिन मामले के स्थायी समाधान और दोनों पक्षों के साक्ष्यों की जांच के लिए विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता जताई है. उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने इस संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई के लिए 27 जुलाई की तिथि नियत की है. तब तक के लिए भगवानपुर पुलिस को क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनाए रखने और दोनों पक्षों की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण हरिद्वार जिले में किन्नर समाज के भीतर का यह विवाद अब पूरी तरह कानूनी रूप ले चुका है, और पूरे क्षेत्र की निगाहें अब 27 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं.
