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उत्तराखंड में वन मंत्री के पैतृक गांव में महिला पर गुलदार का जानलेवा हमला, सुलगते सवालों के बीच पहाड़ों में बढ़ा खौफ

The Hill India News
Last updated: May 25, 2026 1:14 am
The Hill India News
Published: May 25, 2026
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पौड़ी गढ़वाल। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में मानव और हिंसक वन्यजीवों के बीच का संघर्ष अब एक अत्यंत भयावह और चिंताजनक मोड़ पर पहुंच चुका है। राज्य के सुदूरवर्ती क्षेत्रों से लेकर जिला मुख्यालयों तक फैले इस गंभीर संकट की ताजा बानगी पौड़ी गढ़वाल जिले में देखने को मिली है। एक बेहद चौंकाने वाले और प्रशासनिक दावों की पोल खोलने वाले घटनाक्रम के तहत, सूबे के कैबिनेट वन मंत्री सुबोध उनियाल के पैतृक गांव ओंणी में घात लगाकर बैठे एक हिंसक गुलदार ने एक स्थानीय महिला पर जानलेवा हमला कर उसे लहुलुहान कर दिया। इस Pauri Leopard Attack की गूंज न केवल स्थानीय स्तर पर सुनाई दे रही है, बल्कि इसने देहरादून के सत्ता गलियारों में भी हड़कंप मचा दिया है। गनीमत यह रही कि घटना के वक्त आस-पास के खेतों में अन्य ग्रामीण भी मौजूद थे, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए भारी शोर मचाया और महिला को मौत के मुंह से बाहर खींच निकाला। इस दुस्साहसिक हमले के बाद से संपूर्ण जनपद में स्थानीय जनता का आक्रोश चरम पर है और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

Contents
झाड़ियों में छिपे गुलदार ने अचानक किया गर्दन पर वारश्रीनगर बेस अस्पताल में आपातकालीन उपचार, स्थिति गंभीरग्रामीणों का फूट पड़ा गुस्सा: “सिर्फ कागजों पर हो रही है गश्त”कमंद गांव की त्रासदी को भूले नहीं हैं लोग: स्थायी समाधान की दरकार

झाड़ियों में छिपे गुलदार ने अचानक किया गर्दन पर वार

घटना के संबंध में प्राप्त विस्तृत और चश्मदीदों के विवरण के अनुसार, ओंणी गांव की निवासी विनीता देवी (उम्र लगभग 42 वर्ष) रोजाना की तरह अपने घरेलू और कृषि संबंधी दैनिक कार्यों के सिलसिले में गांव की सीमा से सटे एक खेत की तरफ गई थीं। उन्हें इस बात का रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि घने खरपतवार और झाड़ियों के बीच एक आदमखोर प्रवृत्ति का गुलदार पहले से ही उनकी टोह में बैठा हुआ था। जैसे ही विनीता देवी काम में व्यस्त हुईं, गुलदार ने बिजली की रफ्तार से उन पर छलांग लगा दी। गुलदार का मुख्य निशाना महिला की गर्दन और गला था, जो कि इस हिंसक जीव का स्वाभाविक हमलावर पैटर्न माना जाता है।

गुलदार के चंगुल में फंसने के बावजूद विनीता देवी ने अदम्य साहस का परिचय दिया और अपनी पूरी ताकत से चीखना-चिल्लाना शुरू किया। महिला की चीख-पुकार सुनकर पास के खेतों में काम कर रहे ग्रामीण लाठी-डंडों के साथ घटना स्थल की ओर दौड़े। ग्रामीणों की भारी संख्या और उनके आक्रामक रुख को देखकर गुलदार सहम गया और अपने शिकार को वहीं छोड़कर घने जंगलों की तरफ भाग खड़ा हुआ। यदि ग्रामीणों ने मौके पर पहुंचने में चंद सेकंड की भी देरी की होती, तो यह घटना एक बेहद दर्दनाक त्रासदी में बदल सकती थी।

श्रीनगर बेस अस्पताल में आपातकालीन उपचार, स्थिति गंभीर

गुलदार के इस बर्बर हमले में विनीता देवी के गले, कंधे और पीठ पर गहरे जख्म आए हैं। विशेष रूप से गले पर आए नाखूनों और दांतों के गहरे निशानों के कारण अत्यधिक रक्तस्राव हुआ है। घटना के तुरंत बाद पूरे गांव में कोहराम मच गया और अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया। ग्रामीणों ने बिना समय गंवाए लहूलुहान महिला को स्थानीय स्तर पर प्राथमिक राहत देने की कोशिश की और तुरंत वन विभाग तथा आपातकालीन एम्बुलेंस सेवा को सूचित किया।

गंभीर स्थिति को देखते हुए परिजनों और ग्रामीणों ने तत्काल विनीता देवी को उच्च स्तरीय चिकित्सा केंद्र, श्रीनगर बेस अस्पताल उत्तराखंड पहुंचाया। अस्पताल के सर्जिकल वार्ड में डॉक्टरों की एक विशेष टीम उनके उपचार में जुटी हुई है। हालांकि डॉक्टरों के अनुसार महिला की स्थिति फिलहाल खतरे से बाहर लेकिन स्थिर बनी हुई है, परंतु अगले 48 घंटे उनके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वन्यजीवों के नाखूनों और दांतों के घावों से इंफेक्शन (सेप्टिक) फैलने का खतरा सबसे अधिक रहता है।

ग्रामीणों का फूट पड़ा गुस्सा: “सिर्फ कागजों पर हो रही है गश्त”

इस घटना ने वन मंत्री के अपने ही गृह क्षेत्र में वन विभाग के सुरक्षा तंत्र की पोल खोलकर रख दी है, जिससे स्थानीय जनता का सब्र का बांध टूट गया है। ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि पौड़ी नगर और उसके आस-पास के दर्जनों गांवों में पिछले कई महीनों से गुलदार का आतंक पौड़ी में लगातार चरम पर है। शाम ढलते ही लोग अपने घरों में कैद होने को मजबूर हैं, बच्चों का स्कूल जाना दूभर हो चुका है और पशुपालक अपने मवेशियों को चराने के लिए जंगलों में जाने से कतरा रहे हैं।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि वन विभाग को बार-बार लिखित और मौखिक रूप से आगाह करने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। ग्रामीणों ने उग्र चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि वन विभाग पौड़ी गश्त को रात के समय सक्रिय नहीं करता और प्रभावित इलाके में तत्काल प्रभाव से शिकारी पिंजरा (Trap Cage) नहीं लगाया जाता, तो वे जिला मुख्यालय का घेराव करेंगे और उग्र आंदोलन के लिए विवश होंगे।

डीएफओ (DFO) का आधिकारिक बयान: “मैं खुद अपनी पूरी टीम और वन्यजीव विशेषज्ञों के साथ मौके पर पहुंचा हूं। घटना स्थल का गहन निरीक्षण किया गया है और साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। क्षेत्र में हमारी टीमें लगातार मुस्तैद हैं। हमने उच्च अधिकारियों को पिंजरा लगाने की अनुमति के लिए प्रस्ताव भेजा है। स्थानीय निवासियों से अपील है कि वे अकेले जंगलों की तरफ न जाएं और सुबह-शाम विशेष सतर्कता बरतें।” > — महातिम यादव, डीएफओ, पौड़ी गढ़वाल

कमंद गांव की त्रासदी को भूले नहीं हैं लोग: स्थायी समाधान की दरकार

पहाड़ी जनपदों में फैले इस आतंक की जड़ें काफी गहरी हैं। गौरतलब है कि कुछ ही समय पहले पौड़ी के ही कमंद गांव में एक गुलदार ने एक ग्रामीण को अपना निवाला बना लिया था, जिसके बाद हफ्तों तक इलाके में दहशत रही थी। उस समय भी प्रशासन ने बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन धरातल पर स्थितियां जस की तस बनी हुई हैं। सांख्यिकी आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तराखंड मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में पिछले कुछ वर्षों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों का कम होना, दावानल (जंगलों की आग) के कारण प्राकृतिक आवासों का नष्ट होना और वन्यजीवों के पारंपरिक भोजन चक्र में आई गड़बड़ी के कारण ये हिंसक जीव अब मानव बस्तियों का रुख कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सरकार और वन विभाग सिर्फ एक घटना के बाद दूसरी घटना का इंतजार करते रहेंगे? वन मंत्री के पैतृक गांव में हुए इस Pauri Leopard Attack ने अब नीति निर्माताओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जब सरकार के सबसे कद्दावर मंत्रियों के गृह क्षेत्र सुरक्षित नहीं हैं, तो आम जनता की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा। अब समय आ गया है कि केवल तात्कालिक मुआवजे या पिंजरे लगाने के बजाय, इस गंभीर संकट का कोई दीर्घकालिक और वैज्ञानिक समाधान निकाला जाए ताकि पहाड़ों में बची-कुची आबादी सुरक्षित महसूस कर सके।

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