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दिल्लीफीचर्ड

दिल्ली-एनसीआर में 3 दिन चक्का जाम का ऐलान: ग्रीन टैक्स और 6 मांगों को लेकर ट्रांसपोर्टरों का बड़ा आंदोलन, आपूर्ति व्यवस्था पर संकट की आशंका

The Hill India News
Last updated: May 19, 2026 3:49 am
The Hill India News
Published: May 19, 2026
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दिल्ली-एनसीआर में परिवहन व्यवस्था एक बड़े संकट की ओर बढ़ती दिख रही है। ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (AIMTC) सहित विभिन्न ट्रांसपोर्ट संगठनों ने 21 से 23 मई तक तीन दिन के चक्का जाम का ऐलान किया है। ट्रांसपोर्टरों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर तुरंत विचार नहीं किया गया तो यह आंदोलन अनिश्चितकालीन चक्का जाम में भी बदल सकता है। इस घोषणा से दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में माल ढुलाई व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है, जिससे आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई चेन पर भी असर पड़ सकता है।

Contents
ट्रांसपोर्टरों की मुख्य 6 मांगेंसंभावित असर और चिंता

ट्रांसपोर्ट यूनियनों का कहना है कि हाल ही में लागू किए गए पर्यावरण मुआवजा शुल्क (ECC) यानी ग्रीन टैक्स के कारण उनका व्यवसाय गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। उनका आरोप है कि टैक्स का बोझ अत्यधिक बढ़ गया है और इससे ट्रक ऑपरेटरों की लागत असहनीय स्तर तक पहुंच गई है। ट्रांसपोर्टरों का दावा है कि पहले जहां प्रति चक्कर 2000 रुपये तक टैक्स था, वहीं अब इसे बढ़ाकर 4000 रुपये तक कर दिया गया है। इसके अलावा हर साल इसमें 5 प्रतिशत की वृद्धि का भी प्रावधान है, जिससे भविष्य में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

ट्रांसपोर्टर्स का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ग्रीन टैक्स केवल उन वाहनों पर लागू होना चाहिए जो दिल्ली को ट्रांजिट रूट की तरह उपयोग करते हैं, लेकिन वर्तमान में इसे सभी भारी वाहनों पर लागू कर दिया गया है। उनका आरोप है कि यह निर्णय सीएक्यूएम (Commission for Air Quality Management) और दिल्ली सरकार द्वारा संयुक्त रूप से लिया गया है, जो उनके हितों के खिलाफ है। इसी वजह से उन्होंने तीन दिन तक सभी ट्रकों को खड़ा करने का निर्णय लिया है।

इस आंदोलन से जुड़ी जानकारी देते हुए AIMTC के प्रतिनिधियों ने बताया कि दिल्ली-एनसीआर में लाखों ट्रक चलते हैं और यह पूरा क्षेत्र देश की लॉजिस्टिक लाइफलाइन माना जाता है। दूध, सब्जी, फल, दवा, पानी और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर ही निर्भर है। ऐसे में यदि ट्रक संचालन पूरी तरह ठप हो जाता है तो आम जनता को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। कई उद्योगों की सप्लाई चेन रुकने की आशंका है, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ेगा।

ट्रांसपोर्टरों की मुख्य 6 मांगें

ट्रांसपोर्ट यूनियनों ने सरकार के सामने कुल 6 प्रमुख मांगें रखी हैं, जिन्हें पूरा किए बिना आंदोलन वापस लेने से इनकार किया गया है।

पहली मांग यह है कि दिल्ली में प्रवेश करने वाले माल ढुलाई वाहनों पर लगाए गए ECC यानी ग्रीन टैक्स को तुरंत वापस लिया जाए। ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि यह टैक्स पहले से ही आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे ट्रक ऑपरेटरों के लिए अतिरिक्त बोझ बन गया है।

दूसरी मांग में कहा गया है कि ग्रीन टैक्स केवल उन्हीं वाहनों पर लागू किया जाए जो दिल्ली को ट्रांजिट रूट के रूप में इस्तेमाल करते हैं, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में संकेत दिया गया था। ट्रांसपोर्टरों का आरोप है कि वर्तमान नीति में सभी वाहनों को शामिल कर लिया गया है, जो अनुचित है।

तीसरी मांग में BS-4 कमर्शियल वाहनों पर लगाए गए प्रतिबंध को वापस लेने की बात कही गई है। ट्रांसपोर्ट यूनियन का कहना है कि 1 नवंबर से लागू इस प्रतिबंध से हजारों वाहन मालिकों को नुकसान हुआ है। इसके साथ ही उन्होंने सवाल उठाया है कि डीजल से चलने वाले यात्री वाहनों पर समान रूप से प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया, जबकि वे भी प्रदूषण में योगदान देते हैं।

चौथी मांग BS-6 वाहनों को ग्रीन टैक्स से पूरी तरह छूट देने की है। ट्रांसपोर्टर्स का कहना है कि ये वाहन पहले से ही आधुनिक उत्सर्जन मानकों का पालन करते हैं और पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाते हैं, इसलिए उन पर अतिरिक्त टैक्स लगाना अनुचित है।

पांचवीं मांग में आवश्यक वस्तुओं और खाली वाहनों को दिल्ली में लोडिंग और अनलोडिंग के लिए आने पर ग्रीन टैक्स से छूट देने की बात कही गई है। उनका तर्क है कि इससे जरूरी सामान की आपूर्ति बाधित नहीं होगी और सप्लाई चेन सुचारू बनी रहेगी।

छठी और अंतिम मांग दिल्ली नगर निगम (MCD) के तहत बॉर्डर पर लगे सभी टोल बैरियर को हटाने की है। ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप इन बैरियरों की आवश्यकता नहीं है और ये केवल अतिरिक्त आर्थिक दबाव पैदा कर रहे हैं।

संभावित असर और चिंता

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह चक्का जाम तय समय पर लागू होता है तो इसका असर केवल ट्रांसपोर्ट सेक्टर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे दिल्ली-एनसीआर की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देगा। बाजारों में सामान की कमी, कीमतों में वृद्धि और उद्योगों की उत्पादन क्षमता पर असर पड़ सकता है। खासकर छोटे व्यापारियों और दैनिक उपभोग वस्तुओं की सप्लाई पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ने की संभावना है।

सरकारी स्तर पर फिलहाल इस मुद्दे को लेकर बातचीत की बात सामने आई है, लेकिन ट्रांसपोर्ट यूनियन अपने रुख पर अडिग दिखाई दे रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक लिखित आश्वासन और ठोस समाधान नहीं मिलता, तब तक आंदोलन वापस नहीं लिया जाएगा।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर दिल्ली-एनसीआर की परिवहन नीति और पर्यावरण नियमों के बीच संतुलन को लेकर बहस छेड़ दी है। एक तरफ सरकार प्रदूषण नियंत्रण को लेकर सख्त कदम उठा रही है, वहीं ट्रांसपोर्टर्स इसे अपने व्यवसाय के लिए खतरा बता रहे हैं। अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या कोई बीच का समाधान निकल पाता है या नहीं।

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