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कन्याकुमारी से कश्मीर तक दौड़ रहा इंसानियत का संदेश: कुष्ठ रोग के कलंक को मिटाने निकले ऑस्ट्रेलियाई फिजियोथेरेपिस्ट ओम सतीजा

आज के दौर में जहां लोग अपने करियर, आराम और निजी जिंदगी में व्यस्त रहते हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो समाज के लिए कुछ बड़ा करने का सपना देखते हैं। ऐसे ही एक युवा हैं 23 वर्षीय ऑस्ट्रेलियाई फिजियोथेरेपिस्ट Om Satija, जिन्होंने कुष्ठ रोग को लेकर फैली गलतफहमियों और सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए एक अनोखा मिशन शुरू किया है। ओम सतीजा कन्याकुमारी से जम्मू-कश्मीर तक करीब 4700 किलोमीटर की अल्ट्रा मैराथन दौड़ रहे हैं। उनका उद्देश्य कोई रिकॉर्ड बनाना नहीं, बल्कि लोगों के दिलों और सोच को बदलना है।

26 जनवरी को कन्याकुमारी से शुरू हुई यह यात्रा अब देश के कई राज्यों से गुजर चुकी है। ओम हर दिन 50 से 60 किलोमीटर तक दौड़ते हैं। इस दौरान वे गांवों, कस्बों, स्कूलों और कॉलेजों में रुककर लोगों को कुष्ठ रोग के बारे में जागरूक करते हैं। उनका कहना है कि कुष्ठ रोग कोई अभिशाप नहीं बल्कि एक सामान्य बीमारी है, जिसका इलाज संभव है। समाज में फैली अज्ञानता और डर ही इस बीमारी से जुड़ा सबसे बड़ा संकट है।

ऋषिकेश की एक घटना ने बदल दी जिंदगी

ओम सतीजा बताते हैं कि इस मिशन की शुरुआत आज से करीब 12 साल पहले हुई थी। उस समय वे अपने पिता के साथ आध्यात्मिक यात्रा पर ऋषिकेश आए थे। एक ठंडी सुबह वे जरूरतमंद लोगों को कंबल बांट रहे थे। तभी उनकी मुलाकात एक कुष्ठ रोगी से हुई। ओम ने देखा कि लोग उस व्यक्ति के पास जाने से डर रहे थे। कोई उसे छूना तो दूर, उसकी ओर देखना भी नहीं चाहता था।

यह दृश्य ओम के मन में हमेशा के लिए बस गया। उन्होंने महसूस किया कि बीमारी से ज्यादा खतरनाक समाज का भेदभाव है। उसी समय उन्होंने तय कर लिया था कि एक दिन वे कुष्ठ रोगियों के सम्मान और अधिकारों के लिए काम करेंगे।

वर्षों बाद जब वे अपनी पढ़ाई के दौरान जन स्वास्थ्य पर रिसर्च कर रहे थे, तब उन्हें पूर्व ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट कप्तान Steve Waugh के बारे में पता चला। स्टीव वॉ ने कोलकाता में कुष्ठ रोगियों के लिए लंबे समय तक काम किया था। ओम कहते हैं कि यदि एक क्रिकेटर अपने प्रभाव का इस्तेमाल समाज के लिए कर सकता है, तो वे भी अपनी क्षमता के अनुसार कुछ कर सकते हैं। यही सोच उनकी इस अल्ट्रा मैराथन का आधार बनी।

आसान नहीं रहा सफर

कन्याकुमारी से कश्मीर तक का यह सफर बेहद कठिन रहा है। भारत के अलग-अलग राज्यों का मौसम, सड़कें और परिस्थितियां लगातार बदलती रहीं। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की उमस भरी गर्मी में दौड़ना किसी चुनौती से कम नहीं था। इसके बाद पश्चिम बंगाल की भीषण गर्मी और पंजाब की तेज लू ने उनकी परीक्षा ली। अब वे हिमालयी इलाकों की कठिन चढ़ाइयों की ओर बढ़ रहे हैं।

ओम बताते हैं कि कई बार शरीर जवाब देने लगता है, लेकिन उनका उद्देश्य उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता है। उनके पास कोई बड़ा सहायक दल नहीं है। न कोई विशेष तामझाम और न ही आलीशान सुविधाएं। सिर्फ एक बैग, पुराने जूते और लोगों तक पहुंचाने के लिए एक जरूरी संदेश।

उनका हर कदम समाज से यह कहता है कि कुष्ठ रोगियों को दया नहीं, सम्मान चाहिए। बीमारी को छिपाने से नहीं, इलाज करवाने से समाधान मिलेगा।

लोगों तक पहुंचा रहे हैं जागरूकता का संदेश

इस यात्रा के दौरान ओम जहां भी पहुंचते हैं, वहां लोगों से संवाद जरूर करते हैं। स्कूलों में छात्रों से बात करते हैं, गांवों में चौपाल लगाते हैं और कॉलेजों में युवाओं को जागरूक करते हैं। वे लोगों को बताते हैं कि कुष्ठ रोग बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है, यह छूने से नहीं फैलती। समय पर इलाज मिलने पर यह पूरी तरह ठीक हो सकती है।

भारत सरकार की ओर से सरकारी अस्पतालों में इसका मुफ्त इलाज उपलब्ध है। बावजूद इसके आज भी कई लोग डर और शर्म के कारण बीमारी को छिपाते हैं। यही कारण है कि बीमारी गंभीर रूप ले लेती है।

ओम का कहना है कि समाज में अब भी यह धारणा बनी हुई है कि कुष्ठ रोग पिछले जन्म के पापों का परिणाम है। वे लोगों को समझाते हैं कि यह सिर्फ एक मेडिकल कंडीशन है, न कि कोई श्राप। जब लोग उनकी बातें सुनते हैं, तो उनमें बदलाव दिखाई देता है। कई छात्र जागरूकता फैलाने की शपथ लेते हैं और स्थानीय लोग कुछ किलोमीटर तक उनके साथ दौड़कर समर्थन भी जताते हैं।

पंजाब में युवाओं ने उनके साथ दौड़ लगाई, झांसी में शिक्षकों ने स्कूलों में जागरूकता अभियान शुरू किया, नागपुर के चाय विक्रेताओं ने उनके मिशन की चर्चा ग्राहकों तक पहुंचाई, जबकि उधमपुर में साइकिल सवारों के एक समूह ने उनके साथ सफर तय किया। इस तरह ओम की दौड़ अब सिर्फ उनकी व्यक्तिगत यात्रा नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक बदलाव का अभियान बनती जा रही है।

भारत में अब भी बड़ी चुनौती है कुष्ठ रोग

भारत ने पिछले वर्षों में कुष्ठ रोग नियंत्रण में काफी प्रगति की है, लेकिन यह समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। वर्ष 2024-25 में देश में कुष्ठ रोग के 27,428 नए मामले सामने आए। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, सही दवाओं और इलाज से यह बीमारी 6 से 12 महीनों में पूरी तरह ठीक हो सकती है।

इसके बावजूद समाज में फैले डर और भेदभाव के कारण कई मरीज इलाज से दूर रहते हैं। कुष्ठ रोगियों को नौकरी, शिक्षा और सामाजिक जीवन में कई तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है। यही कारण है कि जागरूकता अभियान बेहद जरूरी हैं।

ओम सतीजा का मानना है कि बीमारी से लड़ना आसान है, लेकिन सामाजिक कलंक को मिटाना ज्यादा कठिन है। इसलिए उन्होंने दौड़ को अपना माध्यम बनाया। वे चाहते हैं कि लोग कुष्ठ रोगियों को अलग नजर से देखना बंद करें और उन्हें समान सम्मान दें।

लाल चौक तक पहुंचेगा इंसानियत का संदेश

ओम सतीजा की मंजिल जम्मू-कश्मीर का ऐतिहासिक लाल चौक है। जब वे वहां पहुंचेंगे, तब शायद कोई विश्व रिकॉर्ड नहीं टूटेगा, लेकिन समाज में फैली एक पुरानी सोच जरूर टूट सकती है। उनका मिशन यही है कि लोग समझें — कुष्ठ रोग छूने से नहीं फैलता, बल्कि अज्ञानता से फैलता है।

उनकी यह यात्रा केवल एक अल्ट्रा मैराथन नहीं, बल्कि मानवता, संवेदनशीलता और सामाजिक जागरूकता का प्रतीक बन चुकी है। आज जब दुनिया में लोग छोटी-छोटी बातों पर एक-दूसरे से दूरी बना लेते हैं, तब ओम सतीजा का यह संदेश बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि बीमारी से नहीं, भेदभाव से लड़ने की जरूरत है।

कन्याकुमारी से कश्मीर तक दौड़ता यह युवा हर कदम पर यही बता रहा है कि इंसानियत की सबसे बड़ी पहचान करुणा और सम्मान है।

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