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नेपाल में चीफ जस्टिस नियुक्ति पर बवाल: क्या PM बालेन शाह तोड़ रहे हैं 70 साल पुरानी परंपरा?

नेपाल में नए मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) की नियुक्ति को लेकर बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह उर्फ बालेन शाह की अगुवाई वाली संवैधानिक परिषद ने सुप्रीम कोर्ट के चौथे सबसे वरिष्ठ जज मनोज कुमार शर्मा को देश का अगला चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश कर दी है। इस फैसले ने नेपाल की राजनीति और न्यायपालिका में हलचल मचा दी है, क्योंकि करीब 70 वर्षों से चली आ रही वरिष्ठता (सीनियरिटी) की परंपरा को इस नियुक्ति में नजरअंदाज किया गया है।

काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, परिषद ने सपना प्रधान मल्ला, कुमार रेग्मी और हरि प्रसाद फुयाल जैसे वरिष्ठ जजों को पीछे छोड़ते हुए मनोज कुमार शर्मा का नाम आगे बढ़ाया। यह फैसला इसलिए भी ज्यादा विवादित बन गया क्योंकि इन तीनों जजों को शर्मा से अधिक अनुभवी और वरिष्ठ माना जाता है। संवैधानिक परिषद के छह सदस्यों में से दो सदस्यों ने इस सिफारिश का खुलकर विरोध किया और लिखित रूप में अपनी आपत्ति भी दर्ज कराई।

दरअसल, मार्च में पूर्व मुख्य न्यायाधीश प्रकाश मान सिंह राउत के रिटायर होने के बाद सपना प्रधान मल्ला कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में जिम्मेदारी संभाल रही थीं। ऐसे में माना जा रहा था कि वरिष्ठता के आधार पर वही अगली चीफ जस्टिस बनेंगी। लेकिन प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अचानक मनोज कुमार शर्मा का नाम प्रस्तावित कर सबको चौंका दिया।

बैठक में मौजूद सूत्रों के अनुसार, इस फैसले को लेकर परिषद के भीतर तीखी बहस हुई। विरोध करने वाले सदस्यों का कहना था कि यह फैसला न्यायपालिका की स्थापित परंपरा और निष्पक्षता के खिलाफ है। उनका मानना है कि यदि वरिष्ठता की व्यवस्था को बिना किसी ठोस कारण के तोड़ा गया, तो भविष्य में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।

हालांकि प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि केवल परंपरा के आधार पर नियुक्तियां नहीं होनी चाहिए। उनके मुताबिक, किसी भी जज की नियुक्ति में योग्यता, विशेषज्ञता और न्याय देने की क्षमता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि “सीनियरिटी महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि व्यक्ति में नेतृत्व और न्यायिक क्षमता कितनी है।”

बालेन शाह के इस तर्क को लेकर नेपाल के कानूनी विशेषज्ञों और संवैधानिक जानकारों के बीच भी बहस छिड़ गई है। काठमांडू यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ के प्रोफेसर बिपिन अधिकारी ने कहा कि संविधान में कहीं भी यह अनिवार्य नहीं लिखा कि सबसे वरिष्ठ जज ही चीफ जस्टिस बनेगा, लेकिन दशकों से चली आ रही परंपरा को तोड़ने के लिए बेहद मजबूत और पारदर्शी कारण होने चाहिए।

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार बिना स्पष्ट आधार के जूनियर जज को आगे बढ़ाती है, तो इससे न्यायपालिका पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है। उनका कहना था कि ऐसी स्थिति में जजों के मन में यह डर बैठ सकता है कि यदि उन्होंने सरकार के खिलाफ फैसला दिया तो उनका प्रमोशन रुक सकता है। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

नेपाल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पहले भी कई बार सवालों के घेरे में रही है। ऐसे में यह नया विवाद और अधिक संवेदनशील माना जा रहा है। विपक्षी दलों और कई कानूनी संगठनों ने भी इस फैसले पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि सरकार अपनी पसंद के जजों को आगे बढ़ाने लगेगी तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर हो सकती है।

वहीं बालेन शाह समर्थकों का कहना है कि देश को पारंपरिक सोच से बाहर निकलकर योग्य और सक्षम नेतृत्व को बढ़ावा देना चाहिए। उनके अनुसार केवल वरिष्ठता के आधार पर शीर्ष पद देना हमेशा सही नहीं होता। समर्थकों का दावा है कि मनोज कुमार शर्मा एक सक्षम और अनुभवी जज हैं, जिनकी न्यायिक समझ बेहतर मानी जाती है।

अब इस नियुक्ति को लेकर नेपाल की राजनीति में तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में संसद, न्यायपालिका और राजनीतिक दलों के बीच इस मुद्दे पर टकराव और तेज हो सकता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह फैसला न्यायपालिका में सुधार की दिशा में उठाया गया कदम है या फिर सरकार की बढ़ती दखलअंदाजी का संकेत?

नेपाल में चीफ जस्टिस की नियुक्ति को लेकर उठा यह विवाद सिर्फ एक व्यक्ति की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की न्यायिक स्वतंत्रता, संवैधानिक परंपराओं और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से भी जुड़ा हुआ मामला बन चुका है।

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