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ईरान पर दबाव बनाने की अमेरिकी रणनीति फेल? होर्मुज संकट के बीच अब समझौते की राह पर बढ़ सकते हैं दोनों देश

मिडिल ईस्ट में कई हफ्तों से जारी तनाव और सैन्य टकराव के बीच अब अमेरिका और ईरान के रिश्तों में एक नया मोड़ आता दिखाई दे रहा है। लगातार बढ़ते संघर्ष, होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट और अमेरिकी सैन्य रणनीतियों के अपेक्षित परिणाम न मिलने के बाद अब दोनों देशों के बीच युद्ध खत्म करने को लेकर समझौते की संभावनाएं मजबूत होती नजर आ रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी संकेत दिए हैं कि ईरान के साथ डील होना “बहुत संभव” है। वहीं रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान भी अमेरिका के शांति प्रस्ताव पर जल्द जवाब दे सकता है।

अमेरिका ने शुरुआत में इजरायल के साथ मिलकर 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ अभियान शुरू किया था। वॉशिंगटन का दावा था कि उसका मुख्य उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है। हालांकि ईरान लगातार यह कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह परमाणु बम बनाने की कोशिश नहीं कर रहा। इसके बावजूद अमेरिका ने ईरान पर लगातार दबाव बढ़ाने की नीति अपनाई।

अमेरिका ने पहले सैन्य ताकत का इस्तेमाल किया और फिर खाड़ी क्षेत्र में ईरान के बंदरगाहों के आसपास नौसैनिक घेराबंदी शुरू की। इसका मकसद होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान के प्रभाव को कमजोर करना था। होर्मुज दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई होती है। यदि इस मार्ग में बाधा आती है तो पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार पर असर पड़ सकता है।

लेकिन अमेरिकी नौसैनिक घेराबंदी से भी हालात में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। ईरान ने अपनी रणनीतिक पकड़ बनाए रखी और कई बार चेतावनी दी कि यदि उस पर दबाव बढ़ाया गया तो वह होर्मुज मार्ग में जहाजों की आवाजाही को प्रभावित कर सकता है। इसी बीच अमेरिका ने “प्रोजेक्ट फ्रीडम” नाम की नई योजना शुरू की। इस योजना का उद्देश्य उन जहाजों को सुरक्षा देना था जो होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने में खतरा महसूस कर रहे थे।

हालांकि समुद्री मामलों के विशेषज्ञों का मानना था कि जब तक ईरान के पास जहाजों को निशाना बनाने या खतरा पैदा करने की क्षमता मौजूद है, तब तक ऐसी किसी भी योजना की सफलता मुश्किल होगी। यही वजह रही कि “प्रोजेक्ट फ्रीडम” भी जमीन पर प्रभावी साबित नहीं हो सका। अब खबरें हैं कि ट्रंप प्रशासन ने फिलहाल इस योजना को रोक दिया है।

इन परिस्थितियों में अमेरिका के सामने अब केवल सैन्य दबाव की रणनीति बची नहीं दिख रही। लंबे समय तक युद्ध जारी रहने से खाड़ी क्षेत्र में आर्थिक नुकसान बढ़ रहा है। तेल सप्लाई प्रभावित होने का खतरा बना हुआ है और वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि अब दोनों देशों पर किसी न किसी समझौते तक पहुंचने का दबाव भी बढ़ रहा है।

CNN की रिपोर्ट के अनुसार, एक क्षेत्रीय सूत्र ने दावा किया है कि ईरान गुरुवार को अमेरिका के शांति प्रस्ताव पर अपना जवाब मध्यस्थ देशों को सौंप सकता है। बताया जा रहा है कि तेहरान इस प्रस्ताव की गंभीरता से समीक्षा कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक दोनों पक्ष अब युद्ध समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।

दूसरी तरफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि पिछले 24 घंटों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत काफी सकारात्मक रही है। ट्रंप ने कहा कि उन्हें लगता है कि समझौता होने की संभावना काफी ज्यादा है। यह बयान ऐसे समय आया है जब कुछ दिनों पहले तक दोनों देशों के बीच हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए थे।

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान दोनों ही अब इस संघर्ष को लंबा नहीं खींचना चाहते। अमेरिका के लिए यह युद्ध आर्थिक और रणनीतिक चुनौती बनता जा रहा है, जबकि ईरान भी लगातार प्रतिबंधों और सैन्य दबाव का सामना कर रहा है। ऐसे में यदि दोनों पक्ष अपनी शर्तों में थोड़ी नरमी दिखाते हैं तो मिडिल ईस्ट में लंबे समय से जारी इस संकट का समाधान निकल सकता है।

अब पूरी दुनिया की नजरें ईरान के संभावित जवाब और आने वाले दिनों में होने वाली बातचीत पर टिकी हुई हैं। यदि समझौता होता है तो इससे न केवल खाड़ी क्षेत्र में शांति बहाल हो सकती है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार को भी बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

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