
पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय तक वामपंथ, क्षेत्रीय अस्मिता और धर्मनिरपेक्ष राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन अब राज्य की सियासत तेजी से नए मोड़ की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। भवानीपुर में जीत के बाद बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी के बयानों ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में बंगाल की राजनीति पहले जैसी नहीं रहने वाली। जिस तरह उन्होंने खुलकर हिंदू और मुस्लिम वोटों का जिक्र किया, उसने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या बंगाल भी उत्तर प्रदेश और असम की तरह हिंदुत्व आधारित राजनीति की नई प्रयोगशाला बनने जा रहा है?
भवानीपुर में जीत का प्रमाण पत्र लेने के बाद सुवेंदु अधिकारी ने सार्वजनिक मंच से कहा कि उन्हें मुस्लिम बहुल वार्डों से समर्थन नहीं मिला, जबकि हिंदू बहुल इलाकों ने उन्हें जीत दिलाई। बंगाल की राजनीति में इस तरह का बयान असामान्य माना जाता है, क्योंकि यहां के नेता आमतौर पर धर्म के आधार पर वोटों का खुला विश्लेषण करने से बचते रहे हैं। लेकिन सुवेंदु ने न केवल ऐसा किया, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि अब उनकी राजनीति खुलकर हिंदुत्व और हिंदू वोटों के इर्द-गिर्द घूमेगी।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि बीजेपी की बंगाल रणनीति का बड़ा संकेत है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम में हिमंता बिस्वा सरमा जिस तरह हिंदुत्व और बहुसंख्यक राजनीति के जरिए मजबूत जनाधार तैयार करने में सफल रहे, उसी मॉडल को अब बंगाल में लागू करने की कोशिश दिखाई दे रही है। सुवेंदु अधिकारी खुद को उसी राजनीतिक धारा का चेहरा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
दरअसल, पिछले कुछ महीनों में सुवेंदु अधिकारी के भाषणों और राजनीतिक गतिविधियों में बड़ा बदलाव देखा गया है। पहले जहां बीजेपी बंगाल में “सबका साथ, सबका विकास” के नारे के साथ आगे बढ़ती दिखाई देती थी, वहीं अब सुवेंदु खुलकर “जो हमारे साथ, हम उनके साथ” की राजनीति की बात कर रहे हैं। जुलाई 2024 में बीजेपी की राज्य कार्यकारिणी बैठक में उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि अब पार्टी को उन्हीं लोगों के हितों की राजनीति करनी चाहिए जो बीजेपी के साथ खड़े हैं। इस बयान को बीजेपी की पारंपरिक लाइन से अलग माना गया।
सुवेंदु अधिकारी के राजनीतिक तेवरों में योगी आदित्यनाथ की शैली की झलक भी लगातार दिखाई देती है। कुछ सप्ताह पहले एक चुनावी मंच पर उन्होंने योगी आदित्यनाथ के सामने साष्टांग दंडवत कर उनका आशीर्वाद लिया था। यह तस्वीर और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। बीजेपी समर्थकों ने इसे हिंदुत्व की एकजुटता का प्रतीक बताया, जबकि विपक्ष ने इसे बंगाल में धार्मिक ध्रुवीकरण की शुरुआत करार दिया।
इसी के साथ सुवेंदु लगातार “70 बनाम 30” का राजनीतिक गणित भी सामने रख रहे हैं। उनका इशारा साफ तौर पर राज्य की हिंदू और मुस्लिम आबादी की ओर माना जा रहा है। उनका कहना है कि यदि 70 प्रतिशत हिंदू मतदाता एकजुट हो जाएं, तो बंगाल की राजनीति से तुष्टिकरण की राजनीति समाप्त हो सकती है। यह बयान सीधे तौर पर योगी आदित्यनाथ के चर्चित “80 बनाम 20” वाले राजनीतिक फॉर्मूले की याद दिलाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बीजेपी बंगाल में अब पूरी तरह पहचान आधारित राजनीति पर दांव लगाने की तैयारी में है। पार्टी को लगता है कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति करती रही है और इसका जवाब हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण से दिया जा सकता है। यही वजह है कि सुवेंदु अधिकारी लगातार “सनातन”, “हिंदू अस्मिता” और “सांस्कृतिक पहचान” जैसे मुद्दों को प्रमुखता दे रहे हैं।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीति से भी सुवेंदु अधिकारी काफी प्रभावित नजर आते हैं। हिमंता ने असम में अवैध घुसपैठ, जनसंख्या संतुलन और सांस्कृतिक पहचान को बड़े मुद्दों के रूप में स्थापित किया था। उसी तरह सुवेंदु भी बंगाल में सीमा सुरक्षा, बांग्लादेशी घुसपैठ और हिंदू सुरक्षा जैसे मुद्दों को लगातार उठा रहे हैं। उनका प्रयास है कि बंगाल में बीजेपी सिर्फ एक विपक्षी दल न रहकर हिंदू मतदाताओं की सबसे बड़ी राजनीतिक आवाज बने।
हालांकि, विपक्ष इसे बेहद खतरनाक राजनीतिक प्रयोग बता रहा है। तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी जानबूझकर बंगाल की सामाजिक संरचना को बांटने की कोशिश कर रही है। टीएमसी नेताओं का कहना है कि बंगाल हमेशा से सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक सौहार्द की भूमि रहा है और यहां धर्म आधारित राजनीति ज्यादा समय तक सफल नहीं हो सकती। ममता बनर्जी भी कई बार सार्वजनिक मंचों से कह चुकी हैं कि बंगाल में नफरत की राजनीति को जगह नहीं दी जाएगी।
लेकिन राजनीतिक सच्चाई यह भी है कि पिछले कुछ वर्षों में बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है। बीजेपी, जो कभी राज्य में बेहद कमजोर मानी जाती थी, अब मुख्य विपक्षी दल बन चुकी है। 2021 विधानसभा चुनाव में पार्टी ने बड़ी संख्या में सीटें जीतकर यह दिखा दिया था कि बंगाल में उसका आधार तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में सुवेंदु अधिकारी जैसे नेता बीजेपी के लिए सबसे अहम चेहरा बनकर उभरे हैं।
सुवेंदु की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे बंगाल की जमीनी राजनीति को अच्छी तरह समझते हैं। कभी ममता बनर्जी के करीबी रहे सुवेंदु ने नंदीग्राम आंदोलन से अपनी पहचान बनाई थी। लेकिन बीजेपी में आने के बाद उन्होंने खुद को पूरी तरह हिंदुत्व राजनीति के साथ जोड़ लिया। अब वे बंगाल में बीजेपी के सबसे आक्रामक नेता माने जाते हैं।
आने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह साफ है कि बंगाल की राजनीति अब पहले से कहीं ज्यादा ध्रुवीकृत होने वाली है। एक तरफ ममता बनर्जी अपनी धर्मनिरपेक्ष और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति को मजबूत करने में जुटी हैं, वहीं दूसरी तरफ सुवेंदु अधिकारी हिंदुत्व और हिंदू एकजुटता को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बंगाल की जनता किस राजनीतिक रास्ते को चुनती है। लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि सुवेंदु अधिकारी के हालिया बयानों और रणनीति ने बंगाल की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत जरूर कर दी है।



