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उत्तराखंड कृषि समाचार: चमोली को सीड हब के रूप में विकसित करने की तैयारी, पारंपरिक खेती को मिलेगी नई उड़ान

देहरादून: उत्तराखंड में कृषि क्षेत्र को नई दिशा देने और किसानों की आय में वृद्धि के लिए एक बड़ा और महत्वाकांक्षी कदम उठाया गया है। पहाड़ों की पारंपरिक खेती को मजबूत करने और कृषि आधारित आजीविका को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, राज्य सरकार ने चमोली जिले को ‘सीड हब’ (Seed Hub) के रूप में विकसित करने की योजना पर काम शुरू कर दिया है। ग्रामीण विकास विभाग की इस पहल का मुख्य फोकस बीजों की गुणवत्ता में सुधार करना, फसलों की उत्पादकता बढ़ाना और मिलेट्स (मोटे अनाज) को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँचाना है।

बीज प्रबंधन और विविधता की चुनौती का समाधान

पहाड़ी राज्यों में लंबे समय से संगठित बीज भंडारण और वितरण प्रणाली का अभाव रहा है। इसके कारण किसान अक्सर सीमित विकल्पों के साथ खेती करने को मजबूर होते हैं, जिससे न केवल फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है, बल्कि पारंपरिक बीजों की विविधता भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

इसी चुनौती से निपटने के लिए राज्य सरकार ने एक संगठित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया है। ग्राम्य विकास विभाग के सचिव, धीराज गर्ब्याल के अनुसार, इस योजना के माध्यम से पारंपरिक कृषि पद्धतियों और आधुनिक तकनीकों के बीच एक बेहतरीन संतुलन स्थापित करने की कोशिश की जा रही है।


“सीड हब परियोजना के तहत पारंपरिक बीजों को संरक्षित करने के साथ-साथ उनका अंतर-जिला वैज्ञानिक आदान-प्रदान किया जाएगा, जिससे बीजों की अनुकूलन क्षमता और उत्पादकता में सुधार होगा।”


कैसे काम करेगा सीड हब?

इस पूरी योजना के केंद्र में चमोली जिले को रखा गया है, जहाँ पारंपरिक फसलों का उत्पादन पहले से ही उच्च गुणवत्ता का माना जाता है। इस परियोजना के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • बीजों का परस्पर आदान-प्रदान: चमोली से उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का संग्रह कर उन्हें रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा और बागेश्वर जैसे अन्य पर्वतीय जिलों में भेजा जाएगा।

  • समुदाय की भागीदारी: परियोजना से करीब 1,000 ग्रामीण परिवारों को सीधे तौर पर जोड़ा जाएगा, जो स्थानीय बीजों को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।

  • पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण: पहाड़ों में सदियों से चली आ रही बीज संरक्षण की परंपरा को आधुनिक रूप देकर पुनर्जीवित किया जा रहा है।

मिलेट्स (मोटे अनाज) पर विशेष जोर

इस पहल की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें मिलेट्स पर विशेष जोर दिया गया है। उत्तराखंड के पारंपरिक मोटे अनाज जैसे लाल चावल, पहाड़ी राजमा, चोलाई और रामदाना पोषण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

हाल के वर्षों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के बीच मिलेट्स की माँग देश और विदेश दोनों में तेजी से बढ़ी है। इसे ध्यान में रखते हुए, सरकार की योजना इन उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार करने और ग्लोबल मार्केट तक पहुँचाने की है।

सतत कृषि और आर्थिक समृद्धि

बीजों का विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में परीक्षण करने से उनकी गुणवत्ता और सहनशीलता में सुधार होता है। यह परियोजना न केवल कृषि उत्पादन को बढ़ावा देगी, बल्कि किसानों को खेती के अधिक टिकाऊ और लाभदायक विकल्प भी प्रदान करेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रयास पूरी सफलता के साथ लागू होता है, तो उत्तराखंड के पारंपरिक मिलेट्स उत्पाद वैश्विक स्तर पर अपनी एक नई पहचान बना सकेंगे।

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