
ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार मंच बना है पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के हालिया पाकिस्तान दौरे ने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। जहां एक ओर उम्मीद जताई जा रही थी कि इस्लामाबाद में दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर कोई अहम प्रगति हो सकती है, वहीं दूसरी ओर ईरान ने बातचीत से पहले ही अपने रुख को स्पष्ट करते हुए इन उम्मीदों पर लगभग विराम लगा दिया है।
ईरान ने साफ शब्दों में कह दिया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम उसकी संप्रभुता का हिस्सा है और इस पर किसी भी तरह की चर्चा पाकिस्तान की धरती पर नहीं की जाएगी। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रमुख इब्राहिम अजीजी ने यह स्पष्ट किया कि विदेश मंत्री का यह दौरा केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से है, न कि किसी परमाणु समझौते की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए। उन्होंने कहा कि ‘न्यूक्लियर’ मुद्दा ईरान के लिए ‘रेड लाइन’ है, जिसे पार करने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका लगातार ईरान पर दबाव बना रहा है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के लिए बातचीत करे। अमेरिका का मानना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा को खतरा हो सकता है। इसी कारण उसने ईरान पर कई आर्थिक प्रतिबंध भी लगा रखे हैं और यह स्पष्ट कर दिया है कि जब तक परमाणु मुद्दे पर ठोस बातचीत नहीं होती, तब तक इन प्रतिबंधों में कोई राहत नहीं दी जाएगी।
अब सवाल यह उठता है कि जब ईरान पहले ही इस मुद्दे को बातचीत से बाहर कर चुका है, तो इस्लामाबाद में होने वाली यह कूटनीतिक गतिविधि कितनी सार्थक साबित होगी? विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देश अपने-अपने रुख पर अड़े रहते हैं, तो यह वार्ता महज एक औपचारिक मुलाकात बनकर रह जाएगी, जिसका कोई ठोस परिणाम निकलना मुश्किल है।
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका भी अहम हो जाती है। पाकिस्तान लंबे समय से क्षेत्रीय कूटनीति में एक मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में इस्लामाबाद में हो रही यह बातचीत उसके लिए एक अवसर भी है और चुनौती भी। यदि वह किसी तरह दोनों पक्षों के बीच संवाद की राह खोलने में सफल होता है, तो यह उसकी कूटनीतिक जीत मानी जाएगी। लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह कार्य आसान नहीं लगता।
ईरान का यह सख्त रुख उसकी आंतरिक राजनीति और रणनीतिक सोच को भी दर्शाता है। ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को राष्ट्रीय गौरव और सुरक्षा से जोड़कर देखता है। वहीं अमेरिका इसे संभावित खतरे के रूप में देखता है। यही मूलभूत अंतर दोनों देशों के बीच किसी भी समझौते की राह में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस गतिरोध को लेकर चिंता बढ़ रही है। यदि यह तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर न केवल मध्य पूर्व बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। तेल की कीमतों से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक, कई स्तरों पर इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है।
फिलहाल, इस्लामाबाद में होने वाली यह कूटनीतिक कवायद उम्मीद और अनिश्चितता के बीच झूलती नजर आ रही है। एक ओर बातचीत के जरिए समाधान की उम्मीद है, तो दूसरी ओर दोनों देशों का अडिग रुख इस संभावना को कमजोर करता दिख रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या यह वार्ता किसी सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ेगी या फिर यह भी पिछले कई प्रयासों की तरह बेनतीजा साबित होगी।



