देहरादून: उत्तराखंड की विश्वप्रसिद्ध चारधाम यात्रा शुरू होने में अब गिनती के दिन शेष रह गए हैं, लेकिन धरातल पर तैयारियों को लेकर सियासत गरमाने लगी है। बदरीनाथ विधानसभा क्षेत्र से नवनिर्वाचित विधायक लखपत सिंह बुटोला ने यात्रा व्यवस्थाओं और बदरीनाथ मास्टर प्लान के कार्यों पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए सरकार की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा किया है। बुटोला का आरोप है कि सरकार न केवल स्थानीय जनप्रतिनिधियों की अनदेखी कर रही है, बल्कि निर्माण कार्यों में हो रही लापरवाही के कारण बदरीनाथ धाम के अस्तित्व और पौराणिक स्वरूप पर भी संकट मंडरा रहा है।
प्रधानमंत्री के ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ में लापरवाही का आरोप
विधायक लखपत सिंह बुटोला ने हाल ही में बदरीनाथ धाम का दौरा कर चल रहे निर्माण कार्यों का जायजा लिया। उन्होंने कहा कि 19 अप्रैल से यात्रा विधिवत रूप से शुरू होने वाली है, लेकिन मौके पर स्थिति बेहद चिंताजनक है। उन्होंने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की निगरानी में चल रहे ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ की गुणवत्ता पर सवाल उठाए।
बुटोला ने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो प्रोजेक्ट सीधे पीएमओ की निगरानी में हैं, वहां भी कार्यों की गुणवत्ता और समय सीमा को लेकर घोर लापरवाही बरती जा रही है। यात्रा शुरू होने में कुछ ही दिन बचे हैं और अभी भी मंदिर के चारों ओर खंडहर पसरा हुआ है। श्रद्धालुओं के पहले जत्थे के स्वागत के लिए जो तैयारियां होनी चाहिए थीं, वे कहीं नजर नहीं आ रही हैं।“
अलकनंदा की धारा मोड़ने से मंदिर को खतरा!
विधायक ने एक अत्यंत गंभीर तकनीकी और धार्मिक मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उनके अनुसार, मास्टर प्लान के तहत हो रहे निर्माण कार्यों की वजह से अलकनंदा नदी के नैसर्गिक प्रवाह के साथ छेड़छाड़ की गई है।
बुटोला ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा, “निर्माण कार्यों के चलते अलकनंदा नदी की चौड़ाई लगभग 1.5 किलोमीटर तक करीब 3 मीटर कम कर दी गई है। इसके कारण नदी की धारा का प्रवाह अब सीधे ब्रह्मकपाल और तप्त कुंड की ओर हो गया है। यदि इसे तुरंत ठीक नहीं किया गया, तो आने वाले समय में न केवल ब्रह्मकपाल और तप्त कुंड, बल्कि मुख्य बदरीनारायण मंदिर के अस्तित्व को भी गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।” उन्होंने चेतावनी दी कि प्रकृति के साथ इस तरह का खिलवाड़ भविष्य में किसी बड़ी आपदा को न्यौता दे सकता है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों की अनदेखी और ‘अधूरा’ सौंदर्यीकरण
चारधाम यात्रा तैयारियों को लेकर होने वाली समीक्षा बैठकों में स्थानीय विधायक को न बुलाए जाने पर बुटोला ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि स्थानीय जनप्रतिनिधि को प्रक्रिया से बाहर रखकर सरकार जमीनी हकीकत से मुंह मोड़ रही है।
“जब बैठकों में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यक्ति ही नहीं होगा, तो मूल समस्याओं का निस्तारण कैसे संभव है? बदरीनाथ प्राधिकरण ने मास्टर प्लान के नाम पर मंदिर के चारों ओर की पुरानी बसावट को तोड़कर उसे खंडहर बना दिया है। सौंदर्यकरण के नाम पर आज भी मंदिर जाने वाला पथ आधा-अधूरा है और देव डोलियों के पौराणिक रास्तों का निर्माण तो अभी शुरू तक नहीं हुआ है।”
श्रद्धालुओं की संख्या और ऑनलाइन पंजीकरण पर उठाई मांग
यात्रा को सुगम बनाने के सुझाव देते हुए लखपत बुटोला ने सरकार से चारधाम यात्रा तैयारियों के तहत श्रद्धालुओं की संख्या पर लगी सीमा को तुरंत हटाने की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि सनातन धर्म में भगवान के दर्शन के लिए संख्या का निर्धारण करने का कोई प्रावधान नहीं है।
उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:
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पंजीकरण पोर्टल: ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन पोर्टल को हमेशा के लिए खुला रखा जाना चाहिए ताकि देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालु बिना किसी बाधा के देवभूमि आ सकें।
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ग्रीन कार्ड की वैधता: चारधाम यात्रा पर चलने वाले वाहनों के चालकों को दिया जाने वाला ‘ग्रीन कार्ड’ कम से कम 6 माह की अवधि का होना चाहिए, ताकि उन्हें बार-बार की कागजी कार्यवाही से राहत मिल सके।
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स्थानीय हित: मास्टर प्लान के नाम पर जिन स्थानीय लोगों के रोजगार और घर प्रभावित हुए हैं, उन्हें उचित प्रबंधन और सम्मान मिलना चाहिए।
आस्था और व्यवस्था के बीच संतुलन की चुनौती
उत्तराखंड सरकार के लिए इस बार की यात्रा बड़ी चुनौती साबित होने वाली है। एक ओर रिकॉर्ड तोड़ श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है, तो दूसरी ओर विपक्ष और स्थानीय विधायक के इन आरोपों ने प्रशासनिक तैयारियों की पोल खोल दी है।
यदि विधायक बुटोला द्वारा उठाए गए मुद्दे—विशेषकर अलकनंदा नदी के प्रवाह और मंदिर की सुरक्षा—पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो यह केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक बड़ा सुरक्षा संकट बन सकता है। अब देखना यह होगा कि 19 अप्रैल से पहले सरकार इन ‘अधूरे’ कार्यों को कैसे पूर्ण करती है और विपक्ष के इन तीखे सवालों का क्या जवाब देती है।


