
गुवाहाटी/नई दिल्ली। चुनावी समर में बयानों की मर्यादा एक बार फिर तार-तार होती नजर आ रही है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के एक ताजा बयान ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। असम की एक चुनावी रैली में खरगे द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) की तुलना ‘जहरीले सांपों’ से किए जाने के बाद सत्तापक्ष हमलावर हो गया है। इस मामले में न केवल जुबानी जंग तेज हुई है, बल्कि कानूनी कार्रवाई का सिलसिला भी शुरू हो गया है।
असम भाजपा के नेता रंजीव कुमार शर्मा ने कांग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। भाजपा का आरोप है कि खरगे का यह बयान न केवल आपत्तिजनक है, बल्कि समाज में नफरत फैलाने और शांतिपूर्ण राजनीतिक माहौल को बिगाड़ने वाला है।
क्या था मल्लिकार्जुन खरगे का वो बयान, जिस पर मचा बवाल?
असम में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भाजपा और आरएसएस पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने एक धार्मिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा, “कुरान शरीफ में साफ लिखा है कि नमाज पढ़ते वक्त भी अगर कोई जहरीला सांप सामने आ जाए, तो नमाज छोड़ दो और पहले उस सांप को मार दो।”
खरगे ने आगे इस उपमा को राजनीति से जोड़ते हुए कहा, “आज आरएसएस और भाजपा वही सांप हैं। अगर आप इन्हें नहीं मारोगे (राजनीतिक रूप से हराना), तो आप बचोगे नहीं।” उनके इस बयान को भाजपा ने हिंसा के लिए उकसाने और धार्मिक भावनाओं का राजनीतिक इस्तेमाल करने के तौर पर पेश किया है।
भाजपा की कानूनी कार्रवाई: पुलिस स्टेशन तक पहुंचा मामला
कांग्रेस अध्यक्ष के इस संबोधन के कुछ ही घंटों बाद भाजपा सक्रिय हो गई। पार्टी के प्रदेश कार्यालय के पास स्थित पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराते हुए भाजपा नेताओं ने मांग की है कि चुनावी मंचों से इस तरह की भाषा का प्रयोग बंद होना चाहिए। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर लिया है और कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला ‘हेट स्पीच’ और आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के दायरे में आ सकता है।
गिरिराज सिंह का पलटवार: ‘दहशतगर्दों के लिए भारत में जगह नहीं’
खरगे के बयान पर केंद्रीय मंत्री और भाजपा के फायरब्रांड नेता गिरिराज सिंह ने जोरदार पलटवार किया है। आईएएनएस (IANS) से बातचीत में सिंह ने कहा, “जब तक इस देश में भाजपा और आरएसएस है, तब तक दहशतगर्दों और देशद्रोहियों के लिए भारत में कोई जगह नहीं है। खरगे जी का बयान उनकी हताशा और परेशानी को दर्शाता है।”
गिरिराज सिंह यहीं नहीं रुके, उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पर निजी हमला बोलते हुए कहा कि जिन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में देश को लूटा है, वे आज जनता को गुमराह करने के लिए इस तरह की भाषा का सहारा ले रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि खरगे ‘नमाज पढ़ने वालों’ के साथ रहते हैं, इसलिए उनकी सोच और भाषा भी वैसी ही हो गई है।
ममता बनर्जी पर भी साधा निशाना: पश्चिम बंगाल के हालात पर चिंता
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने अपने हमले के दायरे में केवल कांग्रेस को ही नहीं रखा, बल्कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी लपेटे में लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी राज्य में अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए भ्रम फैला रही हैं। उन्होंने कहा, “ममता जी को पता है कि जनता उनके साथ नहीं है, इसलिए वे बाहरी लोगों और घुसपैठियों के सहारे चुनाव जीतने का सपना देख रही हैं।”
सिंह ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल में आम जनता की समस्याओं को अनसुना किया जा रहा है और संवैधानिक संस्थाओं के काम में बाधा डाली जा रही है। उन्होंने मतदाताओं से अपील की कि वे ऐसी ताकतों को मुंहतोड़ जवाब दें जो तुष्टिकरण की राजनीति के दम पर सत्ता हथियाना चाहती हैं।
राजनीतिक विश्लेषण: क्यों जहरीले होते जा रहे हैं चुनावी बोल?
विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 के इस चुनावी दौर में मल्लिकार्जुन खरगे विवादित बयान भाजपा वाला मामला ध्रुवीकरण की राजनीति को और तेज कर सकता है। जहां कांग्रेस इसे एक ‘रूपक’ (Metaphor) बताकर अपना बचाव कर रही है, वहीं भाजपा इसे चुनावी मुद्दा बनाकर कांग्रेस को ‘हिंदू विरोधी’ और ‘हिंसा समर्थक’ साबित करने की कोशिश में है।
राष्ट्रीय स्तर के मीडिया हाउसों की रिपोर्टिंग के अनुसार, चुनाव आयोग भी इस मामले पर संज्ञान ले सकता है। सार्वजनिक मंचों से पशु-पक्षियों या कीड़े-मकौड़ों से राजनीतिक विरोधियों की तुलना करना पहले भी विवादों का कारण रहा है, लेकिन ‘सांप’ और ‘मारने’ जैसे शब्दों का प्रयोग मामले को अधिक गंभीर बना देता है।
लोकतंत्र में भाषा की मर्यादा का संकट
मल्लिकार्जुन खरगे का बयान और उस पर भाजपा की प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि भारतीय राजनीति में स्वस्थ बहस की जगह अब व्यक्तिगत और अपमानजनक टिप्पणियों ने ले ली है। मल्लिकार्जुन खरगे विवादित बयान भाजपा प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या चुनावी जीत के लिए नेताओं को भाषाई संयम खोने की अनुमति दी जा सकती है?
अब देखना होगा कि असम पुलिस की जांच और चुनाव आयोग का रुख इस मामले में क्या रहता है। क्या खरगे अपने बयान पर सफाई देंगे या भाजपा इस मुद्दे को गांव-गांव तक ले जाकर भुनाने में सफल होगी? फिलहाल, देश की निगाहें इन दोनों दिग्गज राजनीतिक दलों के अगले कदम पर टिकी हैं।



