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उत्तराखंड में लागू होगा गुजरात का ‘सहकारिता मॉडल’: अनाज भंडारण से लेकर बैंकिंग तक, बदल जाएगी पहाड़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था

The Hill India News
Last updated: February 18, 2026 1:52 pm
The Hill India News
Published: February 18, 2026
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गांधीनगर/देहरादून: उत्तराखंड की त्रिवेंद्रम-धामी सरकार अब राज्य के ग्रामीण अंचलों की तकदीर बदलने के लिए देश के सबसे सफल सहकारिता मॉडल (Cooperative Model) को अपनाने जा रही है। गुजरात के दौरे पर गए उत्तराखंड के सहकारिता मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने स्पष्ट किया है कि देवभूमि में अब ‘श्वेत क्रांति’ की जननी रहे गुजरात की तर्ज पर सहकारिता आंदोलन को नई धार दी जाएगी।

Contents
गांधीनगर में ‘सफलता के मंत्र’ की तलाशवैज्ञानिक अन्न भंडारण: बर्बादी पर लगेगी लगामबैंकिंग और डिजिटल विस्तार: बिचौलियों का अंतसहकारिता से समृद्धि: भविष्य की रूपरेखाचुनौतियां और संभावनाएं

इस रणनीतिक बदलाव का मुख्य उद्देश्य अनाज भंडारण, पारदर्शी क्रेडिट प्रणाली और डिजिटल बैंकिंग के जरिए राज्य के सीमांत किसानों की आय को दोगुना करना है।

गांधीनगर में ‘सफलता के मंत्र’ की तलाश

बुधवार को सहकारिता मंत्री धन सिंह रावत ने गुजरात के गांधीनगर में सहकारिता क्षेत्र से जुड़े विभिन्न शीर्ष संस्थानों का सघन दौरा किया। इस दौरान उन्होंने गुजरात मॉडल की बारीकियों को समझा, जिसने अमूल जैसे वैश्विक ब्रांड को जन्म दिया है। मंत्री ने अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय बैठक की और संस्थानों के कार्यकलापों, अत्याधुनिक अन्न भंडारण व्यवस्था, सुदृढ़ बैंकिंग प्रणाली और डिजिटल विस्तार के पहलुओं पर विस्तृत चर्चा की।

मंत्री रावत ने जोर देकर कहा कि उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन यदि गुजरात का सफल सहकारिता मॉडल यहाँ प्रभावी ढंग से लागू होता है, तो यह पलायन रोकने और स्थानीय रोजगार सृजन में मील का पत्थर साबित होगा।


वैज्ञानिक अन्न भंडारण: बर्बादी पर लगेगी लगाम

अपने प्रवास के दौरान धन सिंह रावत ने गांधीनगर स्थित सरढव सेवा सहकारी मंडली लिमिटेड के ‘पीएमश्री अन्न भंडारण केंद्र’ का सूक्ष्म निरीक्षण किया। पहाड़ में अक्सर भंडारण की कमी के कारण किसानों की फसल खराब हो जाती है, ऐसे में गुजरात की यह प्रणाली उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर हो सकती है।

“वैज्ञानिक एवं सुरक्षित भंडारण व्यवस्था न केवल किसानों की उपज को चूहों और नमी से बचाती है, बल्कि बाजार में सही दाम मिलने तक खाद्यान्न की गुणवत्ता को भी बरकरार रखती है। हम उत्तराखंड में इसी तरह की ‘साइंटिफिक स्टोरेज’ प्रणाली विकसित करेंगे।” — डॉ. धन सिंह रावत, सहकारिता मंत्री

बैंकिंग और डिजिटल विस्तार: बिचौलियों का अंत

उत्तराखंड सरकार का विशेष फोकस डिजिटल प्लेटफॉर्म और पारदर्शी क्रेडिट व्यवस्था पर है। धन सिंह रावत ने गांधीनगर जिला सहकारी संघ और जिला सहकारी ऋण समिति लिमिटेड का दौरा कर वहां की वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) योजनाओं की जानकारी ली।

गुजरात में सहकारी समितियां जिस तरह से पेपरलेस और डिजिटल मोड में काम कर रही हैं, उसे उत्तराखंड के सहकारी बैंकों और समितियों में भी लागू किया जाएगा। इससे न केवल भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी, बल्कि किसानों को बिना किसी देरी के ऋण (Credit) उपलब्ध हो सकेगा।


सहकारिता से समृद्धि: भविष्य की रूपरेखा

मंत्री ने गांधीनगर जिला सहकारी संघ के अध्यक्ष कोदरभाई आर. पटेल से मुलाकात कर भविष्य की कार्ययोजनाओं पर मंथन किया। इस चर्चा के दौरान उत्तराखंड में वर्तमान में संचालित योजनाओं और गुजरात की बेस्ट प्रैक्टिसेस के बीच एक सेतु बनाने पर सहमति बनी।

राज्य में होने वाले प्रमुख बदलाव:

  1. आधुनिक प्रबंधन प्रणाली: सहकारी संघों और समितियों में प्रोफेशनल मैनेजमेंट को बढ़ावा दिया जाएगा।

  2. पारदर्शी क्रेडिट व्यवस्था: ऋण वितरण की प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन और ट्रैक करने योग्य बनाया जाएगा।

  3. जागरूकता अभियान: केंद्र और राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को ‘जन-जन’ तक पहुँचाने के लिए ग्राम स्तर पर विशेष कैंप लगाए जाएंगे।

  4. सशक्त सहकारी बैंक: जिला सहकारी बैंकों को नई तकनीक से लैस किया जाएगा ताकि वे निजी बैंकों से प्रतिस्पर्धा कर सकें।

चुनौतियां और संभावनाएं

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में सहकारी ढाँचे को मजबूत करना आसान नहीं है। बिखरी हुई जोत और दुर्गम क्षेत्रों तक डिजिटल पहुंच सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। हालांकि, धन सिंह रावत का मानना है कि यदि गुजरात की तरह ‘सामूहिक शक्ति’ को आधार बनाया जाए, तो उत्तराखंड का सहकारिता विभाग राज्य की जीडीपी में बड़ा योगदान दे सकता है।

उत्तराखंड सरकार का यह कदम राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक ‘संजीवनी’ की तरह देखा जा रहा है। गुजरात सहकारिता मॉडल को अपनाने का निर्णय न केवल किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करेगा, बल्कि ‘सहकार से समृद्धि’ के संकल्प को भी धरातल पर उतारेगा। अब देखना यह होगा कि गांधीनगर से सीखी गई ये तकनीकें केदारखंड की वादियों में कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी ढंग से लागू होती हैं।

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