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कोटद्वार: “मोहम्मद दीपक” नाम की मिली ऐसी सजा 150 सदस्यों वाले जिम में बचा सन्नाटा, संचालक दाने-दाने को मोहताज!

कोटद्वार (उत्तराखंड)। देवभूमि उत्तराखंड के शांत माने जाने वाले शहर कोटद्वार में इन दिनों एक जिम संचालक की कहानी चर्चा और विवादों के केंद्र में है। दीपक कुमार, जिन्हें अब इलाके में ‘मोहम्मद दीपक’ के नाम से पहचाना जा रहा है, एक ऐसी सामाजिक और आर्थिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहे हैं, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। कभी जिस जिम में सुबह की पहली किरण के साथ युवाओं की भारी भीड़ उमड़ती थी, आज वहां सन्नाटा पसरा है। यह कहानी केवल एक व्यक्ति के संघर्ष की नहीं है, बल्कि यह वर्तमान समय में सोशल मीडिया की शक्ति और उसके खतरनाक दुष्प्रभावों का एक जीवंत उदाहरण भी है।

26 जनवरी: वह घटना जिसने सब कुछ बदल दिया

विवाद की जड़ें इस साल के गणतंत्र दिवस यानी 26 जनवरी से जुड़ी हैं। दीपक कुमार के अनुसार, उस दिन कोटद्वार में एक 70 वर्षीय बुजुर्ग मुस्लिम दुकानदार के साथ कुछ लोग कथित तौर पर अभद्रता कर रहे थे। विवाद का कारण दुकान के नाम के आगे लगा ‘बाबा’ शब्द था, जिसे हटाने का दबाव बनाया जा रहा था। दीपक, जो पास ही मौजूद थे, उन्होंने बुजुर्ग के समर्थन में आवाज उठाई।

इसी गहमागहमी के बीच जब भीड़ में से किसी ने दीपक से उनका नाम पूछा, तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया— “मेरा नाम मोहम्मद दीपक है।” यह वाक्य कैमरे में कैद हो गया और देखते ही देखते सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल गया। दीपक का यह बयान उनके लिए गले की फांस बन गया।

भीड़ से सन्नाटे तक: जिम कारोबार पर गहरा असर

दीपक कुमार कोटद्वार में एक आलीशान जिम चलाते हैं, जो एक किराये की इमारत की दूसरी मंजिल पर स्थित है। घटना से पहले की स्थिति और वर्तमान हालात के बीच का अंतर चौंकाने वाला है:

  1. सदस्यता में भारी गिरावट: दीपक बताते हैं कि विवाद से पहले उनके जिम में रोजाना करीब 150 लोग वर्कआउट करने आते थे। लेकिन वीडियो वायरल होने और उसके बाद हुए घटनाक्रम के बाद अब यह संख्या सिमटकर महज 12 से 15 रह गई है।

  2. आर्थिक बोझ: जिम का मासिक किराया 40,000 रुपये है। इसके अलावा, दीपक ने महज छह महीने पहले अपना घर बनाया है, जिसकी 16,000 रुपये की मासिक ईएमआई (EMI) उनके कंधों पर है।

  3. आय का एकमात्र स्रोत: जिम ही उनके परिवार के पालन-पोषण का एकमात्र जरिया है। सदस्यों के चले जाने से अब उनके सामने बैंक की किश्त और दुकान का किराया भरने का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

31 जनवरी की घटना और बढ़ता डर

दीपक के अनुसार, असल संकट 31 जनवरी को तब शुरू हुआ जब बजरंग दल के कुछ सदस्यों ने उनके जिम के बाहर प्रदर्शन किया। पुलिस की मुस्तैदी के कारण स्थिति नियंत्रण में रही, लेकिन उस दिन जिम के भीतर मौजूद महिला और पुरुष सदस्यों के मन में सुरक्षा को लेकर गहरा डर बैठ गया।

दीपक का दावा है कि प्रदर्शनकारी जिम के भीतर तक प्रवेश कर गए थे, जिससे वहां वर्कआउट कर रहे लोग सहम गए। इसी डर का नतीजा है कि पुराने सदस्यों ने जिम से दूरी बना ली है। लोग अब इस विवादित माहौल का हिस्सा नहीं बनना चाहते, जिसका सीधा खामियाजा दीपक को भुगतना पड़ रहा है।

परिवार और स्वास्थ्य पर पड़ा बुरा प्रभाव

यह केवल व्यापारिक नुकसान तक सीमित नहीं रहा। दीपक बताते हैं कि इस तनावपूर्ण माहौल का असर उनकी सेहत और उनके बच्चों की शिक्षा पर भी पड़ा है। विवाद के बाद दीपक की तबीयत बिगड़ गई और उनकी छोटी बेटी ने डर के मारे स्कूल जाना बंद कर दिया था। हालांकि, अब उसने दोबारा स्कूल जाना शुरू किया है, लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से दीपक स्वयं उसे स्कूल छोड़ने और लेने जाते हैं।

सामाजिक ताना-बाना और ‘नाम’ का विवाद

‘मोहम्मद दीपक’ नाम को लेकर सोशल मीडिया पर दो फाड़ देखने को मिल रहे हैं। जहां एक पक्ष इसे सांप्रदायिक सौहार्द और एकजुटता के प्रतीक के रूप में देख रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे संदिग्ध और उकसावे वाला बयान मान रहा है। दीपक का कहना है कि उन्होंने वह नाम केवल उस वक्त की परिस्थिति और अपनी भावना व्यक्त करने के लिए लिया था, लेकिन इसे गलत तरीके से पेश कर उनका बहिष्कार किया जा रहा है।

उम्मीद की किरण अभी बाकी है

इतने बड़े आर्थिक और मानसिक आघात के बावजूद दीपक कुमार ने हार नहीं मानी है। उन्हें उम्मीद है कि कोटद्वार के लोग जल्द ही सच्चाई को समझेंगे और उनके जिम में दोबारा वही रौनक लौटेगी। वह कहते हैं, “समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। मैंने कुछ गलत नहीं किया, बस एक बुजुर्ग की मदद की थी। मुझे भरोसा है कि मेरे पुराने सदस्य वापस आएंगे।”

कोटद्वार की यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे एक छोटा सा वीडियो क्लिप किसी का बना-बनाया साम्राज्य ढहा सकता है। ‘मोहम्मद दीपक’ उर्फ दीपक कुमार आज एक ऐसे दोराहे पर खड़े हैं जहां एक तरफ उनका गिरता कारोबार है और दूसरी तरफ अपनी पहचान और सिद्धांतों को बचाने की लड़ाई। क्या समाज उन्हें दोबारा उसी खुले दिल से अपनाएगा? यह सवाल फिलहाल कोटद्वार की हवाओं में तैर रहा है।

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