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सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा और धमकियों पर DGP को कारण बताओ नोटिस, ममता बनर्जी के भाषणों पर उठे सवाल

The Hill India News
Last updated: February 10, 2026 2:06 am
The Hill India News
Published: February 10, 2026
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नई दिल्ली: भारत के लोकतंत्र के प्रहरी, उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में चुनाव ड्यूटी के दौरान अधिकारियों को मिलने वाली धमकियों और हिंसा की खबरों पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्य की कानून-व्यवस्था और चुनावी निष्पक्षता पर गंभीर टिप्पणी करते हुए पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (DGP) को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही, अदालत ने चुनाव आयोग के आरोपों पर DGP को ‘कारण बताओ नोटिस’ भी जारी किया है।

Contents
सॉलिसिटर जनरल की तीखी दलीलें: मुख्यमंत्री पर गंभीर आरोपचुनाव आयोग की रिपोर्ट: जान हथेली पर रखकर काम कर रहे अधिकारीअदालत का आदेश और DGP की जिम्मेदारीलोकतंत्र की साख का सवाल

सॉलिसिटर जनरल की तीखी दलीलें: मुख्यमंत्री पर गंभीर आरोप

अदालत की यह कार्रवाई सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की उन दलीलों के बाद आई है, जिन्होंने चुनाव आयोग के हलफनामे का हवाला देते हुए राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया। सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में सीधे तौर पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भड़काऊ भाषण देने और भय का माहौल बनाने का आरोप लगाया है।

दलीलों के दौरान यह स्पष्ट किया गया कि राज्य में उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा भ्रामक जानकारी फैलाने से न केवल चुनावी प्रक्रिया बाधित हो रही है, बल्कि ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों के मनोबल पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। सॉलिसिटर जनरल ने जोर देकर कहा कि अन्य राज्यों की तुलना में पश्चिम बंगाल में डराने-धमकाने और बाधा उत्पन्न करने की घटनाएं कहीं अधिक हैं, जिससे एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की नींव हिल रही है।

चुनाव आयोग की रिपोर्ट: जान हथेली पर रखकर काम कर रहे अधिकारी

निर्वाचन आयोग (ECI) ने अदालत के समक्ष राज्य की भयावह स्थिति का ब्यौरा पेश किया है। आयोग की शिकायत के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  1. दस्तावेजों को नष्ट करना: राज्य के विभिन्न हिस्सों में बड़ी संख्या में ‘फॉर्म-7’ (नाम हटाने के लिए आवेदन) जलाए गए हैं। यह सीधे तौर पर मतदाता सूची में गड़बड़ी करने का प्रयास है।

  2. BLO के खिलाफ हिंसा: पंचायत भवनों में सुनवाई के लिए पहुंचे बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) के साथ मारपीट और हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं।

  3. असुरक्षा का भाव: आयोग ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन कर रहे अधिकारियों को अब अपनी जान का खतरा महसूस होने लगा है। बंगाल में ‘भय का वातावरण’ इस कदर व्याप्त है कि प्रशासनिक मशीनरी स्वतंत्र रूप से काम करने में असमर्थ दिख रही है।

अदालत का आदेश और DGP की जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों को लोकतंत्र के लिए ‘चिंताजनक’ माना है। पीठ ने DGP से पूछा है कि जब चुनाव आयोग के अधिकारियों को धमकियां दी जा रही थीं, तब पुलिस प्रशासन क्या कर रहा था? व्यक्तिगत हलफनामे के जरिए DGP को यह स्पष्ट करना होगा कि भविष्य में अधिकारियों की सुरक्षा और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

लोकतंत्र की साख का सवाल

पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का इतिहास पुराना रहा है, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं (ECI) के अधिकारियों का अपनी सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचना एक नई और गंभीर स्थिति को दर्शाता है। अब सबकी नजरें राज्य के DGP के जवाब और अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। क्या बंगाल में राजनीतिक प्रतिशोध की जगह लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता मिलेगी? यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।

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TAGGED:Bengal DGP show cause noticeElection Commission vs Mamata BanerjeeSupreme Court West Bengal election violence
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