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उत्तराखंड पुलिस: DGP दीपम सेठ ने 3 दरोगाओं को किया सस्पेंड, लापरवाह अफसरों और भ्रष्टाचार पर सीधा प्रहार

देहरादून: उत्तराखंड में बिगड़ती कानून व्यवस्था और हालिया जघन्य अपराधों पर पुलिस महानिदेशक (DGP) दीपम सेठ ने बेहद सख्त तेवर अपना लिए हैं। मंगलवार को सरदार पटेल भवन स्थित पुलिस मुख्यालय में आयोजित एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान डीजीपी ने कर्तव्यपालन में लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों पर ‘गाज’ गिराते हुए तीन उप-निरीक्षकों (SIs) को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।

इस मैराथन बैठक में डीजीपी ने स्पष्ट कर दिया कि देवभूमि की पुलिसिंग में अब ‘शिथिलता’ और ‘भ्रष्टाचार’ के लिए कोई जगह नहीं होगी। बैठक में मुख्यालय के आला अधिकारियों सहित दोनों रेंजों के आईजी और सभी जनपदों के कप्तान शामिल रहे।

लापरवाह दरोगाओं पर गिरी गाज: ऋषिकेश और भगवानपुर की घटनाओं पर एक्शन

डीजीपी ने हालिया आपराधिक घटनाओं की समीक्षा के दौरान पाया कि कुछ मामलों में पुलिस की शुरुआती प्रतिक्रिया बेहद कमजोर और लापरवाह थी। इसके परिणामस्वरूप निम्नलिखित कार्रवाई की गई:

  1. ऋषिकेश महिला हत्याकांड: एम्स चौकी प्रभारी SI साहिल वशिष्ट को निलंबित कर दिया गया है। ऋषिकेश में एक महिला की गोली मारकर हत्या के मामले में उनकी भूमिका पर सवाल उठे थे।

  2. देहरादून युवती हत्याकांड: कोतवाली नगर क्षेत्र के खुड़बुड़ा में हुए जघन्य हत्याकांड में लापरवाही बरतने पर चौकी प्रभारी SI प्रद्युम्न नेगी को सस्पेंड किया गया है।

    • इन दोनों संवेदनशील मामलों की जांच SP क्राइम विशाखा अशोक भदाणे को सौंपी गई है, जिन्हें 7 दिन के भीतर विस्तृत रिपोर्ट देनी होगी।

  3. हरिद्वार गोलीबारी कांड: भगवानपुर के चुड़ियाला में रविदास जयंती पर दो पक्षों के बीच हुए संघर्ष और गोलीबारी को न रोक पाने पर हल्का प्रभारी SI सूरत शर्मा को निलंबित कर दिया गया है। इसकी जांच SP क्राइम हरिद्वार जितेन्द्र मेहरा करेंगे।

लैंड फ्रॉड (Land Fraud) पर नए कड़े नियम: अब CO की रिपोर्ट अनिवार्य

ऊधमसिंहनगर के चर्चित सुखवन्त सिंह आत्महत्या प्रकरण का संज्ञान लेते हुए डीजीपी ने भूमि धोखाधड़ी के मामलों में पुलिस की कार्यप्रणाली को पूरी तरह बदल दिया है। अब लैंड फ्रॉड से जुड़ी किसी भी शिकायत पर सीधा मुकदमा दर्ज करने या हस्तक्षेप करने के बजाय एक पारदर्शी प्रक्रिया का पालन करना होगा:

  • क्षेत्राधिकारी (CO) की जांच: हर भूमि विवाद मामले की प्रारंभिक जांच अनिवार्य रूप से क्षेत्राधिकारी स्तर के अधिकारी द्वारा की जाएगी।

  • प्रकृति का निर्धारण: सीओ को समयबद्ध जांच कर यह स्पष्ट करना होगा कि मामला ‘सिविल’ (दीवानी) प्रकृति का है या ‘क्रिमिनल’ (फौजदारी)

  • सीधा हस्तक्षेप प्रतिबंधित: यदि मामला सिविल पाया जाता है, तो पुलिस उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी। निर्देशों के उल्लंघन पर कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।

भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’: विजिलेंस को खुली छूट

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ‘भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखंड‘ की नीति को आगे बढ़ाते हुए डीजीपी दीपम सेठ ने सतर्कता विभाग (Vigilance) को विशेष निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि पुलिस विभाग के भीतर काली भेड़ों (भ्रष्ट पुलिसकर्मियों) को चिन्हित किया जाए। भ्रष्ट आचरण में लिप्त कर्मियों के विरुद्ध सतर्कता विभाग को त्वरित और कठोर कार्रवाई करने की खुली छूट दी गई है।

“पुलिस की वर्दी पहनकर भ्रष्टाचार या भू-माफियाओं के साथ साठगांठ किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जो पुलिसकर्मी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा।” – दीपम सेठ, डीजीपी उत्तराखंड

बैठक में मौजूद रहे दिग्गजों की टीम

इस महत्वपूर्ण गोष्ठी में उत्तराखंड पुलिस के लगभग सभी वरिष्ठ रणनीतिकार मौजूद रहे, जिनमें:

  • अभिनव कुमार (महानिदेशक, अभिसूचना एवं सुरक्षा)

  • वी. मुरुगेशन (ADG विजिलेंस एवं अपराध)

  • ए.पी. अंशुमान (ADG प्रशासन)

  • रिधिम अग्रवाल (IG कुमाऊँ) और सदानन्द दाते (IG गढ़वाल)

  • साइबर एक्सपर्ट नीलेश आनन्द भरणे सहित अन्य अधिकारी।

सख्त पुलिसिंग की ओर बढ़ता उत्तराखंड

DGP की इस कार्रवाई ने महकमे में नीचे से ऊपर तक एक कड़ा संदेश भेज दिया है। तीन दरोगाओं का निलंबन और क्षेत्राधिकारी स्तर पर जांच की अनिवार्यता यह दर्शाती है कि पुलिस प्रशासन अब केवल एफआईआर दर्ज करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि गुणवत्तापूर्ण विवेचना और न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में गंभीर है।

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