नई दिल्ली: भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में ‘असाधारण’ और ‘अभूतपूर्व’ जैसे शब्दों का प्रयोग अक्सर किया जाता है, लेकिन वर्तमान बजट सत्र जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की खाई को और गहरा कर दिया है। संसद में मचे घमासान के बीच नेता प्रतिपक्ष (LoP) राहुल गांधी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक पत्र लिखकर सदन की कार्यप्रणाली और विपक्ष की आवाज को दबाने के कथित प्रयासों पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है।
राहुल गांधी ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि सदन में उन्हें बोलने से रोकना केवल एक तकनीकी बाधा नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र के मौलिक अधिकारों का हनन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर चर्चा को रोकने का एक संगठित प्रयास है।
संसद में भारी हंगामा: 8 सांसदों का निलंबन
मंगलवार को लोकसभा की कार्यवाही हंगामे की भेंट चढ़ गई। विवाद उस समय चरम पर पहुँच गया जब विपक्ष के सदस्यों ने स्पीकर के आसन की ओर कागज उछाले। इस अनुशासनहीनता पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पीकर ओम बिरला ने विपक्षी खेमे के 8 सांसदों को निलंबित कर दिया। इस हंगामे के चलते सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई और नेता प्रतिपक्ष के तौर पर राहुल गांधी अपना भाषण पूरा नहीं कर सके।


राहुल गांधी का पत्र: ‘संसदीय परंपराओं का हुआ चीरहरण’
कांग्रेस द्वारा सार्वजनिक किए गए इस पत्र में राहुल गांधी ने सीधे तौर पर स्पीकर की भूमिका और सरकार के दबाव पर सवाल उठाए हैं। पत्र के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
1. दस्तावेजों का सत्यापन और अधिकार: राहुल गांधी ने पत्र में उल्लेख किया कि सोमवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान जब उन्होंने एक मैगजीन का जिक्र करना चाहा, तो स्पीकर ने उन्हें दस्तावेज सत्यापित (Verify) करने का निर्देश दिया था। राहुल के अनुसार, उन्होंने नियमों के तहत दस्तावेज को सत्यापित कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद उन्हें भाषण जारी रखने की अनुमति नहीं मिली।
2. राष्ट्रीय सुरक्षा पर चर्चा से ‘डर’ रही सरकार? राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि उन्हें बोलने से रोकना एक “जानबूझकर की गई कोशिश” है। उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय सुरक्षा राष्ट्रपति के अभिभाषण का एक मुख्य हिस्सा था। इस पर चर्चा करना संसद की जिम्मेदारी है, लेकिन विपक्ष के नेता को इस अधिकार से वंचित किया जा रहा है।”
‘संसदीय इतिहास में पहली बार ऐसी स्थिति’
राहुल गांधी ने पत्र में इस बात पर जोर दिया कि भारतीय संसदीय इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब सरकार के इशारे पर स्पीकर ने विपक्ष के नेता को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने से रोका हो। उन्होंने इसे ‘लोकतंत्र पर एक धब्बा’ करार दिया है।
“सदन की स्थापित परंपराओं के अनुसार, एक बार जब सदस्य दस्तावेज की सामग्री की जिम्मेदारी ले लेता है, तो चेयर की भूमिका समाप्त हो जाती है और जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी होती है। आज इस प्रक्रिया का उल्लंघन किया गया है।” – राहुल गांधी, पत्र के अंश
कांग्रेस का कड़ा रुख और ‘एक्स’ (Twitter) पर वार
कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी के पत्र को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा करते हुए सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस का कहना है कि यह केवल एक सांसद को रोकने की बात नहीं है, बल्कि करोड़ों देशवासियों की आवाज को दबाने का प्रयास है जिन्होंने राहुल गांधी को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है।
राजनीतिक विशेषज्ञों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बजट सत्र में यह गतिरोध आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है। जहाँ सत्ता पक्ष विपक्ष पर सदन की कार्यवाही में बाधा डालने और अराजकता फैलाने का आरोप लगा रहा है, वहीं विपक्ष का तर्क है कि उनके पास जनता के मुद्दों को उठाने के लिए सदन ही एकमात्र मंच है, जिसे अब प्रतिबंधित किया जा रहा है।
क्या कहता है नियम 353 और 369?
संसदीय नियमों के तहत यदि कोई सदस्य किसी बाहरी दस्तावेज या रिपोर्ट का हवाला देता है, तो उसे उसकी सत्यता की पुष्टि करनी होती है। राहुल गांधी का दावा है कि उन्होंने इस प्रक्रिया का पालन किया है, जबकि सरकार की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि बिना ठोस सबूतों के सदन को गुमराह करने वाले दस्तावेजों की अनुमति नहीं दी जा सकती।
सदन के भीतर मर्यादा और अधिकारों की यह लड़ाई अब पत्रयुद्ध तक पहुँच गई है। राहुल गांधी का ओम बिरला को लिखा गया यह पत्र न केवल एक संवैधानिक शिकायत है, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है। अब सबकी नजरें स्पीकर के अगले कदम और इस पत्र के जवाब पर टिकी हैं। क्या संसद की गरिमा फिर से बहाल होगी या विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच यह टकराव भारतीय लोकतंत्र के लिए एक नई चुनौती पेश करेगा?



