नई दिल्ली/इस्लामाबाद: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का राग अलापने और भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर सवाल उठाने वाले पाकिस्तान को अब अपने ही घर के भीतर से सबसे बड़ी चुनौती मिली है। बलूचिस्तान के प्रमुख अलगाववादी नेता मीर यार ने पाकिस्तानी हुकूमत और वहां की सैन्य ताकतों के दोहरे मापदंडों की धज्जियां उड़ाते हुए बेहद तीखा हमला बोला है। मीर यार ने स्पष्ट कहा है कि जिस देश की सेना ने बलूचिस्तान में दर्जनों मस्जिदों को बमबारी कर जमींदोज किया हो, उसे भारत की प्रशासनिक नीतियों पर टिप्पणी करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
मस्जिद प्रोफाइलिंग: पाकिस्तान का प्रोपेगेंडा और भारत का तर्क
हाल ही में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर में मस्जिदों और उनके प्रबंधन समितियों की ‘प्रोफाइलिंग’ को लेकर आपत्ति जताई थी। पाकिस्तान का आरोप था कि धार्मिक पदाधिकारियों का विवरण और तस्वीरें एकत्र करना मुस्लिम समुदाय को ‘व्यवस्थित रूप से प्रताड़ित’ करने का हिस्सा है।
हालांकि, भारत सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षा और प्रशासनिक उद्देश्यों (Administrative Purposes) के लिए है। भारत ने जोर देकर कहा कि आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति के तहत संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखना किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाना नहीं है।
मीर यार का बड़ा दावा: “पाक सेना ने नष्ट कीं 40 मस्जिदें”
पाकिस्तान के इस ‘धार्मिक कार्ड’ पर पलटवार करते हुए बलूच नेता मीर यार ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान की सेना ने बलूचिस्तान में अब तक लगभग 40 मस्जिदों को निशाना बनाया है। मीर यार के अनुसार:
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सैन्य हमला: मस्जिदों पर सीधी बमबारी की गई और टैंकों व तोपों का इस्तेमाल किया गया।
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धार्मिक अपमान: सैन्य अभियानों के दौरान पवित्र कुरान को जलाने और इमामों के अपहरण की घटनाएं आम हैं।
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मानवाधिकार उल्लंघन: नागरिक क्षेत्रों में गोलाबारी कर धार्मिक स्थलों को नष्ट करना पाकिस्तानी सेना की कार्यशैली बन चुकी है।
मीर यार ने दो टूक शब्दों में कहा, “जो देश अपने ही नागरिकों के इबादतगाहों को मलबे में तब्दील कर देता है, उसका मानवाधिकारों की बात करना दुनिया का सबसे बड़ा पाखंड है।”
शहबाज शरीफ और जनरल असीम मुनीर सीधे निशाने पर
मीर यार ने केवल सेना ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व पर भी सीधा प्रहार किया। उन्होंने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को संबोधित करते हुए कहा कि उनके नेतृत्व में बलूचों की आवाज को कुचला जा रहा है। उन्होंने पाकिस्तान को एक ‘आतंकवादी राष्ट्र’ करार देते हुए कहा कि वहां हिंदू, सिख और ईसाई जैसे अल्पसंख्यकों का दमन एक संरचनात्मक समस्या (Structural Problem) है।
बलूच नेता के अनुसार, पाकिस्तान की सेना जिहादी चरमपंथियों को पालती है ताकि उनका इस्तेमाल अल्पसंख्यकों को डराने और जबरन धर्मांतरण कराने के लिए हथियार के रूप में किया जा सके।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की किरकिरी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मीर यार का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक कंगाली और वैश्विक अलग-थलग पड़ने की स्थिति से जूझ रहा है। भारत-पाकिस्तान कूटनीति के संदर्भ में यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह साबित करता है कि:
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चयनात्मक चिंता: पाकिस्तान की धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर चिंता केवल कश्मीर तक सीमित है, जबकि उसके अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में स्थिति भयावह है।
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बलूच समर्थन: बलूचिस्तान का नेतृत्व अब खुलकर भारत के सैद्धांतिक स्टैंड का समर्थन कर रहा है, जो पाकिस्तान के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका है।
बेनकाब हुआ इस्लामाबाद का ‘मस्जिद प्रोपेगेंडा’
मीर यार के इस साहसी बयान ने पाकिस्तान के उस ‘नैरेटिव’ की हवा निकाल दी है जिसे वह दशकों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने पेश करता रहा है। जम्मू-कश्मीर में मस्जिद प्रोफाइलिंग के मुद्दे को हवा देने की पाकिस्तान की कोशिश अब उसी के खिलाफ ‘बुमेरंग’ साबित हो रही है।
सच्चाई यह है कि नैतिकता का उपदेश वही दे सकता है जिसका अपना दामन साफ हो। बलूचिस्तान से उठी यह आवाज गवाही दे रही है कि पाकिस्तान की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है।



