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UP प्रयागराज: माघ मेले में ‘धर्म और सियासत’ का टकराव; शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने जताया जान का खतरा, गरमाई राजनीति

प्रयागराज। संगम की रेती पर अध्यात्म और आस्था का केंद्र रहने वाला प्रयागराज माघ मेला इस समय विवादों के अखाड़े में तब्दील हो गया है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और प्रशासन के बीच सात दिनों से चला आ रहा गतिरोध अब केवल धार्मिक मर्यादा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने एक गंभीर राजनीतिक और सुरक्षा संकट का रूप ले लिया है। शनिवार शाम स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिविर के बाहर हुए हंगामे और ‘बुलडोजर बाबा’ के नारों ने इस विवाद में घी डालने का काम किया है।

शंकराचार्य ने अपनी और अपने अनुयायियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनके शिविर के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी गई है और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए सीसीटीवी कैमरे इंस्टॉल किए जा रहे हैं।

शिविर के बाहर हंगामा और ‘आई लव बुलडोजर’ के नारे

शनिवार की शाम उस समय तनाव चरम पर पहुंच गया जब कुछ अराजक तत्वों ने शंकराचार्य के शिविर के बाहर नारेबाजी शुरू कर दी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, युवक “आई लव बुलडोजर बाबा” के नारे लगा रहे थे। देखते ही देखते स्थिति हाथापाई तक पहुंच गई। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने चेतावनी दी है कि यदि इन शरारती तत्वों पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो श्रद्धालुओं और शिविर की संपत्ति को बड़ा नुकसान हो सकता है।

इस घटना के बाद मेला प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए शिविर के आसपास दस सीसीटीवी कैमरे लगाने का निर्णय लिया है, ताकि हर संदिग्ध हलचल को रिकॉर्ड किया जा सके।


विवाद की जड़: मौनी अमावस्या का वो स्नान

इस पूरे विवाद की शुरुआत मौनी अमावस्या के अवसर पर हुई। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी पालकी के साथ संगम स्नान के लिए जाना चाहते थे, लेकिन सुरक्षा और प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए प्रशासन ने उन्हें रोक दिया। इसके विरोध में स्वामी जी त्रिवेणी मार्ग पर अपने शिविर के बाहर फुटपाथ पर ही धरने पर बैठ गए। उनकी मांग है कि प्रशासन के अधिकारी उनके और उनके ब्रह्मचारियों के साथ किए गए व्यवहार के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगें।


संत समाज में दो फाड़: समर्थन और विरोध के सुर

यह मुद्दा अब ‘संत बनाम संत’ की लड़ाई बनता जा रहा है।

  • स्वामी निश्चलानंद सरस्वती का समर्थन: पुरी गोवर्धन मठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने अविमुक्तेश्वरानंद का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि संतों के साथ मारपीट और ब्रह्मचारियों की चोटियां पकड़कर खींचना किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने प्रशासन की कार्यशैली पर कड़े सवाल उठाए हैं।

  • धीरेंद्र शास्त्री (बाबा बागेश्वर) की सलाह: पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने इस मामले में बीच का रास्ता निकालने की अपील की है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म का उपहास नहीं होना चाहिए और दोनों पक्षों को बैठकर समझौता कर लेना चाहिए।

  • जगद्गुरु परमहंस आचार्य का कड़ा प्रहार: दूसरी ओर, जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि स्वामी जी राजनीति से प्रेरित हैं और “इंडी” (I.N.D.I.A.) गठबंधन के इशारे पर सनातन को नुकसान पहुंचा रहे हैं। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि जो मोदी-योगी के नेतृत्व से खुश नहीं, वे सनातन विरोधी हैं।


सियासत की एंट्री: अखिलेश बनाम योगी सरकार

धर्म के इस मामले में राजनीतिक दलों की भागीदारी ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर राज्य की योगी सरकार को घेरा है। अखिलेश ने तीखा हमला बोलते हुए कहा:

“कालनेमि को याद करने वाले बताएं कि कलयुग के कालनेमि कौन हैं? कालनेमि ही इनका काल बनकर आएगा।”

वहीं, बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने धर्म में बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप पर चिंता जताई है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से कहा कि धार्मिक आयोजनों में राजनीतिक दखलअंदाजी सामाजिक संघर्ष का कारण बन रही है, जो देश के लिए शुभ संकेत नहीं है।


प्रशासन की चुनौती और ‘जीरो टॉलरेंस’

प्रयागराज प्रशासन के लिए यह स्थिति एक दोहरी चुनौती है। एक ओर लाखों की संख्या में श्रद्धालु मौनी अमावस्या के बाद भी स्नान के लिए आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एक बड़े धार्मिक गुरु का धरना जारी है। अधिकारियों का कहना है कि वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन माफी मांगने जैसी शर्तों पर फिलहाल कोई सहमति नहीं बन पाई है।

प्रयागराज का यह शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद विवाद अब केवल एक व्यक्ति या एक घटना तक सीमित नहीं है। यह आस्था, प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक विचारधाराओं के बीच का एक जटिल टकराव बन गया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस गतिरोध को कैसे समाप्त करता है और संत समाज की एकता पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।

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