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मौलाना महमूद मदनी ने सरकार व मीडिया की भाषा पर उठाए सवाल, “जुल्म होगा तो जिहाद भी होगा” — विवादित टिप्पणी ने बढ़ाया सियासी तापमान

The Hill India News
Last updated: November 29, 2025 1:59 pm
The Hill India News
Published: November 29, 2025
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भोपाल | 29 नवंबर: जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने ‘जिहाद’ शब्द को लेकर देश में चल रही राजनीतिक और सामाजिक बहस पर कड़ी आपत्ति जताई है। संगठन की राष्ट्रीय गवर्निंग बॉडी की भोपाल में आयोजित बैठक में उन्होंने आरोप लगाया कि इस्लाम के पवित्र सिद्धांतों को जानबूझकर नकारात्मक अर्थों में प्रचारित किया जा रहा है, जिससे मुस्लिम समुदाय को मानसिक, सामाजिक और धार्मिक रूप से ठेस पहुँच रही है।

Contents
“लव जिहाद से लेकर थूक जिहाद तक — शब्दों के जरिए धार्मिक अपमान”“जुल्म होगा तो जिहाद भी होगा” — विवादित टिप्पणी ने बढ़ाया सियासी तापमान“देश का माहौल संवेदनशील और चिंताजनक” — सामाजिक बहिष्कार का आरोपधार्मिक रूपांतरण बनाम ‘घर वापसी’: दोहरे रवैये का आरोपजमीयत का रुख: शांतिपूर्ण संघर्ष, कानूनी लड़ाई और संवाद की रणनीतिराजनीतिक प्रतिक्रिया की आहटनिष्कर्ष

मदनी ने कहा कि “जिहाद इस्लाम की एक आध्यात्मिक और नैतिक अवधारणा है, जिसे नफरत फैलाने वालों और इस्लाम विरोधी समूहों ने हिंसा और अतिवाद से जोड़ दिया है।” उन्होंने दावा किया कि यह बदलाव सोची-समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है और इसे रोकना आवश्यक है।


“लव जिहाद से लेकर थूक जिहाद तक — शब्दों के जरिए धार्मिक अपमान”

बैठक में अपने संबोधन के दौरान मौलाना मदनी ने सरकार व मीडिया पर भी आरोप लगाया कि कुछ ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोग ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जो न सिर्फ तथ्यहीन होते हैं बल्कि सामुदायिक तनाव को भी बढ़ावा देते हैं।

उन्होंने कहा:
“‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, ‘एजुकेशन जिहाद’ और ‘थूक जिहाद’ जैसे शब्दों का प्रयोग मुसलमानों को आहत करता है। ये शब्द धार्मिक भावनाओं का मज़ाक उड़ाने और पूरे समुदाय को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश हैं।”

मदनी ने यह भी कहा कि इन शब्दों को सामान्य राजनीतिक भाषा का हिस्सा बना दिया गया है, जिसके कारण सामाजिक दूरी और अविश्वास बढ़ रहा है।


“जुल्म होगा तो जिहाद भी होगा” — विवादित टिप्पणी ने बढ़ाया सियासी तापमान

अपने संबोधन के दौरान मौलाना महमूद मदनी ने एक विवादित बयान भी दिया। उन्होंने कहा:
“जब-जब जुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा।”

उनके इस बयान से राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है। कई राजनीतिक दल इसे परिस्थितियों पर आधारित आह्वान बता रहे हैं, जबकि विरोधी दल इसे भड़काऊ बयान करार दे रहे हैं। हालांकि मौलाना ने स्पष्ट किया कि उनका जिहाद से आशय अन्याय के खिलाफ वैचारिक और कानूनी संघर्ष है, न कि किसी प्रकार की हिंसा।


“देश का माहौल संवेदनशील और चिंताजनक” — सामाजिक बहिष्कार का आरोप

जमीयत प्रमुख ने कहा कि देश के हालात तेजी से बदल रहे हैं और मुस्लिम समुदाय अपने आप को कानूनी, सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर महसूस कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई सरकारी और प्रशासनिक कार्रवाइयाँ एकतरफा दिखती हैं।

उन्होंने कहा:
“मॉब लिंचिंग, बुलडोजर कार्रवाई, वक्फ संपत्तियों पर कब्ज़े की घटनाएँ और मदरसों को निशाना बनाना — यह सब मिलकर एक समुदाय को असुरक्षा की ओर धकेल रहा है। आज स्थिति यह है कि मुसलमान को सड़क पर भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं होता।”

मदनी ने कहा कि मुस्लिम समाज को अब “तैयार रहने की जरूरत” है—अपने अधिकारों के संरक्षण, सामाजिक संवाद और कानूनी रास्तों के लिए संगठित रूप से प्रयास करने के संदर्भ में।


धार्मिक रूपांतरण बनाम ‘घर वापसी’: दोहरे रवैये का आरोप

मौलाना महमूद मदनी ने धर्मांतरण से जुड़ी राजनीतिक बहस पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ समूह ‘घर वापसी’ के नाम पर एक विशेष धर्म को बढ़ावा देने का प्रयास करते हैं और इस पर कोई सवाल नहीं उठाया जाता।

उन्होंने कहा:
“जब किसी को ‘घर वापसी’ के नाम पर एक धर्म में शामिल किया जाता है तो इसे सामाजिक सेवा बताया जाता है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म बदलता है, तो उसे ‘जिहाद’ बता दिया जाता है। यह पूरी तरह से दोहरा मापदंड है।”

उन्होंने दावा किया कि ऐसे प्रयास देश में सामाजिक विभाजन को गहरा कर रहे हैं और सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए कि धार्मिक स्वतंत्रता एक मूल अधिकार है।


जमीयत का रुख: शांतिपूर्ण संघर्ष, कानूनी लड़ाई और संवाद की रणनीति

जमीयत उलेमा-ए-हिंद देश के सबसे पुराने इस्लामी संगठनों में से एक है। संगठन ने इस बैठक में कई प्रस्ताव पारित किए, जिनमें शामिल हैं:

  • मॉब लिंचिंग के खिलाफ सख्त कानून की मांग
  • मदरसों के खिलाफ चल रहे अभियानों की न्यायिक समीक्षा
  • वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा हेतु ठोस कदम
  • धार्मिक व सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संवाद
  • मुस्लिम समुदाय को कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक करना

मदनी ने कहा कि संगठन का उद्देश्य संघर्ष नहीं बल्कि संविधान के दायरे में न्याय की लड़ाई और सामाजिक सौहार्द को मजबूती देना है।


राजनीतिक प्रतिक्रिया की आहट

मदनी के बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ना तय माना जा रहा है। कई दल इसे अल्पसंख्यक समुदाय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व मान सकते हैं, जबकि विरोधी दल इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से जोड़ सकते हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति की बहस का केंद्र बन सकता है, खासकर ऐसे समय में जब देश में सांप्रदायिक मुद्दे अक्सर चुनावी विमर्श को प्रभावित करते हैं।


निष्कर्ष

मौलाना महमूद मदनी का संबोधन न केवल इस्लाम के सिद्धांतों की व्याख्या का प्रयास था, बल्कि देश में मुसलमानों की सामाजिक स्थिति को लेकर गहरी चिंता का भी संकेत था। ‘जिहाद’ शब्द को लेकर उन्होंने जिस तरह गलत व्याख्या और राजनीतिक उपयोग पर सवाल उठाए, उससे एक बार फिर धार्मिक भावनाओं और भाषा के प्रयोग को लेकर राष्ट्रीय बहस तेज हो सकती है।

साथ ही, ‘जुल्म के खिलाफ जिहाद’ वाले बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का भी अहम हिस्सा बनने वाला है।

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