
नई दिल्ली, 18 नवंबर: देश में वकीलों के सबसे बड़े प्रतिनिधिक निकाय—राज्य बार काउंसिलों—में लंबित चुनावों को लेकर उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। सुप्रीम कोर्ट ने 16 राज्यों में बार काउंसिल चुनावों की संपूर्ण प्रक्रिया की निगरानी हेतु अपने सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय पर्यवेक्षी समिति गठित करने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि बार काउंसिल चुनावों को ‘‘न्यायसंगत, निष्पक्ष और पूर्णतः पारदर्शी’’ तरीके से संपन्न कराया जाना अनिवार्य है।
कई चरणों में होंगे चुनाव, 2026 तक नए निर्वाचित निकाय
न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की तीन सदस्यीय पीठ ने निर्देश दिया कि संबंधित राज्य बार काउंसिलों में चुनाव कई चरणों में आयोजित किए जाएंगे। अदालत ने यह भी कहा कि हर राज्य बार काउंसिल में 31 मार्च 2026 तक नया निर्वाचित निकाय होना चाहिए, ताकि लंबे समय से लंबित प्रशासनिक प्रक्रियाओं को नियमित किया जा सके।
चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता
शीर्ष अदालत ने चुनावी प्रक्रिया की निगरानी हेतु समिति के गठन पर जोर देते हुए कहा कि वकीलों की संस्थाएं न्याय व्यवस्था की रीढ़ हैं और इन संगठनों में लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत बनाए रखना अनिवार्य है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि चुनावी गड़बड़ियों, विलंब और अनियमितताओं को रोकने के लिए एक स्वतंत्र पर्यवेक्षी तंत्र आवश्यक है।
समिति की भूमिका होगी विस्तृत
नई समिति के अधिकार क्षेत्र में शामिल होंगे—
- चुनाव की संपूर्ण प्रक्रिया की निगरानी
- समयबद्ध चुनाव कार्यक्रम तैयार कराना
- पारदर्शिता एवं निष्पक्षता सुनिश्चित करना
- किसी भी शिकायत या अनियमितता की समीक्षा
- राज्य बार काउंसिलों और चुनाव प्राधिकरणों को आवश्यक दिशा-निर्देश देना
अदालत ने स्पष्ट किया कि समिति का निर्णय सभी संबंधित राज्यों और चुनाव आयोजकों पर बाध्यकारी होगा।
क्यों आवश्यक हुआ यह हस्तक्षेप?
देश के कई राज्यों में बार काउंसिलों के चुनाव वर्षों से लंबित हैं या अनियमितताओं के आरोपों से घिरे हैं। कुछ राज्यों में कार्यकारिणी निर्वाचित न होने के कारण अधिवक्ता कल्याण योजनाओं सहित कई निर्णय प्रशासनिक स्तर पर अटके हुए थे। सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को “गंभीर” बताते हुए समयबद्ध समाधान का आदेश दिया।
कानूनी समुदाय में स्वागत
कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं और बार संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के इस कदम का स्वागत किया है और कहा कि इससे वकीलों के हितों से जुड़ी संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।



