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TMC में बगावत से बदलेगा सत्ता का समीकरण? परिसीमन और महिला आरक्षण बिल पर NDA की नजर, INDIA गठबंधन में बढ़ी हलचल

देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा उथल-पुथल देखने को मिल रहा है। पश्चिम बंगाल में चुनावी झटके के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। पहले विधायकों में नाराजगी की खबरें आईं और अब पार्टी के सांसदों में भी बगावत की चर्चा तेज हो गई है। राजनीतिक गलियारों में यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि टीएमसी के कई सांसद अलग गुट बनाकर खुद को असली तृणमूल कांग्रेस घोषित करने की तैयारी में हैं। यदि ऐसा होता है तो इसका सीधा असर संसद के नंबर गेम पर पड़ सकता है और सबसे बड़ा फायदा भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को मिल सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद के आगामी मानसून सत्र में केंद्र सरकार कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश करने की तैयारी कर रही है। इनमें महिला आरक्षण, परिसीमन (Delimitation) और एक देश-एक चुनाव जैसे मुद्दे शामिल बताए जा रहे हैं। इन विधेयकों को पारित कराने के लिए सरकार को दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। ऐसे में विपक्षी दलों में टूट-फूट और नए राजनीतिक समीकरण NDA के लिए अवसर बन सकते हैं।

टीएमसी में क्यों बढ़ रही है बगावत?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय से दबदबा रखने वाली टीएमसी के सामने अब संगठनात्मक चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। पार्टी के अंदर कई नेताओं के असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं। चर्चा है कि लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसदों में से लगभग 20 सांसद अलग गुट बनाने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। हालांकि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

यदि सांसदों का बड़ा समूह अलग होता है तो संसद में टीएमसी की ताकत घट जाएगी। इससे INDIA गठबंधन को भी झटका लग सकता है क्योंकि टीएमसी विपक्षी गठबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। दूसरी ओर NDA को अपनी संख्या बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।

परिसीमन और महिला आरक्षण बिल पर सरकार की नजर

केंद्र सरकार लंबे समय से महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों पर आगे बढ़ने की इच्छा जता रही है। पिछली बार जब इन विषयों से जुड़े संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव संसद में आए थे, तब सरकार आवश्यक संख्या जुटाने में सफल नहीं हो पाई थी। बताया जाता है कि उस समय लोकसभा में दो-तिहाई समर्थन से सरकार काफी पीछे रह गई थी।

अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। विपक्षी गठबंधन के कई घटक दलों के बीच मतभेद बढ़े हैं। कुछ क्षेत्रीय दल अलग राह पकड़ चुके हैं, जबकि कई दलों के भीतर भी असंतोष की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में NDA को उम्मीद है कि वह संसद में आवश्यक समर्थन जुटाने में पहले की तुलना में बेहतर स्थिति में हो सकता है।

लोकसभा में क्या है संख्या का गणित?

लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 543 है, लेकिन वर्तमान में तीन सीटें रिक्त बताई जा रही हैं। इस स्थिति में प्रभावी सदस्य संख्या 540 हो जाती है और संवैधानिक संशोधन पारित करने के लिए लगभग 360 सांसदों का समर्थन आवश्यक माना जाता है।

वर्तमान में NDA के पास करीब 293 सांसद हैं। यदि राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार टीएमसी के 20 सांसद और अन्य सहयोगी दलों का समर्थन NDA को मिलता है तो उसकी संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है। इसके अलावा कुछ छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि NDA की नजर उन क्षेत्रीय दलों पर भी है जो किसी बड़े गठबंधन का मजबूत हिस्सा नहीं हैं। दक्षिण भारत के कुछ छोटे दल, निर्दलीय सांसद और अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतें भविष्य के समीकरण तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

विपक्ष ने लगाए लोकतंत्र कमजोर करने के आरोप

विपक्षी दल NDA की इस संभावित रणनीति पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। समाजवादी पार्टी सहित कई विपक्षी दलों का आरोप है कि भाजपा राजनीतिक दलों में टूट पैदा कर अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

विपक्ष का कहना है कि परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए नहीं किया जाना चाहिए। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि यदि परिसीमन की प्रक्रिया को राजनीतिक हितों के अनुसार आगे बढ़ाया गया तो इससे देश के संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक संतुलन पर असर पड़ सकता है।

हालांकि भाजपा और NDA के नेताओं का कहना है कि संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत आवश्यक सुधार करना सरकार की जिम्मेदारी है और संसद में समर्थन जुटाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

राज्यसभा में भी आसान नहीं होगी राह

लोकसभा के मुकाबले राज्यसभा में NDA की चुनौती और अधिक कठिन मानी जा रही है। किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए राज्यसभा में भी दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होगा। ऐसे में केवल लोकसभा में संख्या बढ़ जाने से काम नहीं चलेगा।

राज्यसभा में विभिन्न क्षेत्रीय दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। हाल के दिनों में कुछ सांसदों के इस्तीफे और दलों के भीतर बदलते समीकरणों ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। आने वाले महीनों में यदि और राजनीतिक बदलाव होते हैं तो उनका असर संसद के ऊपरी सदन पर भी दिखाई दे सकता है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल टीएमसी में संभावित टूट और विपक्षी गठबंधन की स्थिति को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। यदि सांसदों का बड़ा वर्ग वास्तव में अलग होता है तो इससे राष्ट्रीय राजनीति का समीकरण बदल सकता है। दूसरी ओर विपक्ष भी अपनी एकजुटता बनाए रखने के लिए प्रयास तेज कर सकता है।

संसद का आगामी मानसून सत्र इसलिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसी दौरान यह साफ हो सकेगा कि NDA संवैधानिक संशोधन विधेयकों के लिए आवश्यक समर्थन जुटा पाता है या नहीं। साथ ही यह भी स्पष्ट होगा कि विपक्ष अपनी ताकत बचाने में कितना सफल रहता है।

देश की राजनीति फिलहाल संख्या, रणनीति और गठबंधनों के नए दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है, जहां हर सांसद और हर दल का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। आने वाले दिनों में होने वाले राजनीतिक घटनाक्रम तय करेंगे कि सत्ता पक्ष अपने बड़े विधायी एजेंडे को आगे बढ़ा पाता है या विपक्ष उसके सामने मजबूत चुनौती पेश करता है।

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